सारंग उपाध्‍याय

यह विकास के सपनों का आखिरी छोर नहीं है। भयावहता मेधा और बहुगुणा जैसों की कल्पनाओं में इससे भी व्यापक थी। इतनी विकराल और इतनी भीषण कि इसके लिये उनके भीतर की हलचल इसी प्रकृति का पूर्व संकेत थी। बाँधों की ऊँचाइयाँ देखकर और पहाड़ों के बीच धरती का सीना चीरकर सुरंगे बनाते देखने वाले उन तॊमाम लोगों के भीतर एक छटपटाहट होती थी। धरती के सीने पर लगने वाला एक एक वार उनके अपने कलेजों को चीर देता था।

नेता विधानसभा में जुमला कसते थे, यहाँ विकास की बात करो तो कहते हैं सुंदलाल बहुगुणा आ जायेगा। ज्ञान, विज्ञान, तकनीक, प्रकृति की परत भर है, उसके भीतर का सृजन हमने खोज निकाला है और अंहकार में बवरा गये हैं। हमें ऐसा लगता है मानो हमने समूचे ब्रह्माण्ड पर अपने आधिपत्य की दुदुंभी बजा दी है और अपना खम ठोंककर विकास के ब्रह्मास्त्र की अकड़ से उसे नंगी चुनौती दे रहे हैं।

ओह यह कैसा छल है। कैसा नशा, कैसा अभिमान है, ये कैसा सपना हमने आसपास बुन लिया है। पर उसके अन्दर का विनाश हमारे विकास के स्वप्नमय गुब्बारे में सुई की तरह ही है...

विवेक शून्य, लालच में अँधे, स्वा‍र्थ के कँगूरों पर अपनी प्रगति की पताका फहराने वाले, प्रकृति की शांत, सरल और मृदुल प्रेममयी धारा की कलाई मोड़ना चाहते हैं, उसकी छाती पर अपनी अमरता का ताण्डव करना चाहते हैं, उसे अपने पैरों तले रौंदकर दबाना चाहते हैं, लेकिन उसकी एक आहट से ही उसी की धरती की गोद में समा जाते हैं।

जीवन की सरल सरिता में अपने अहंकार का रोड़ा अटकाना, छीनकर, झपटकर, दूसरों का गला दबाकर, गला घोंटकर, मनुष्य मनुष्य का शोषण कर सकता है.. उसे मार सकता है, कुचल सकता है, अपना झूठा साम्राज्य स्थापित कर सकता है पर प्रकृति के अस्तित्व को मिटाकर अपने विकास के सपनों को पूरा करने की आज्ञा मिलने से रही।

ऊफ.. उनके भीतर त्रासदियों की कल्पना और भयावहता क्या होगी जो उसकी रक्षा के लिये अपना जीवन लगा गये और आखिरकार शरीर छोड़ गये। मन आहत.. है.. प्रकृति के विकराल रूप को देखकर.. और उससे भी ज्यादा चिन्तित कि किसके किये की सजा किसे मिल रही है... कर कौन रहा है और भुगत कौन रहा है... आह! मन विव्हल है, भावभीनी श्रद्धाञ्जलि अर्पित करता हूँ, उन सभी निर्दोष लोगों को, मासूम बच्चों और महिलाओं को जो असमय ही प्रकृति के क्रोध का भाजन बने और अकाल मृत्यु को प्राप्त हो गये...

हे! प्रकृति देवी प्रार्थना करता हूँ, उन मूर्खों के लिये जिनके मन में ऐसे विकास के सपने आकार ले रहे हैं, जिनकी नींव मानवता की मृत्यु् पर बनी है, जो तुझसे समन्वय, सामञ्जस्य और सहभागिता की अपेक्षा तुझसे टकराकर, तुम्हें दबाकर अपना अहंकार और स्वार्थ पूरा कर रहे हैं. हे! माँ उन्हें सीख दे, समझ दे, सृजन के रास्ते पर चलने की ताकि इस घटना को समझकर वे अपने भीतर आत्ममंथन कर सकें, और निर्दोष तेरे कोप का भाजन न बनें..!! केदारनाथ में असमय काल का ग्रास बने अपने भाई बहनों और सभी आत्मीयों को भावभीनी श्रद्धाञ्जलि..!!!