ये राजनीतिक - बोध और चेतना का रिग्रेशन -काल है
सत्यप्रकाश गुप्ता

चेतना वाह्य-वस्तुओं और हलचलों से बनती है और उन्हें प्रभावित भी करती है।
हमारी चेतना वाह्य-दुनिया के विभाजित होने से खंडित और न्यून हो गयी है और हम उनसे संचालित होते हैं, प्रभावित होते हैं।
सामूहिक चेतना आज ऐसी ही है। कारक कुछ भी हो सकते हैं।
निश्चित रूप से,राजनीति जनता के मानस को सबसे ज़्यादा उद्वेलित करती है। हमारी राजनीति ने जाति और धर्म को उत्प्रेरक की तरह इस्तेमाल किया है। जाति और धर्म की धार ज़रूर बढ़ी है और समाज हिंसक हुआ है। देश का आर्थिक सरोकार भी हाशिये पर चला गया है। राष्ट्र का विकास राष्ट्रवाद ने ले लिया है और राजनीति का विकास धर्म और जाति की तुष्टिकरण ने ले लिया है तो ऐसे विश्व -दृष्टिकोण से राजनीतिक और चेतना का बोध भद्द धरातल पर ही सम्भव है और वो ही हम देख पा रहे हैं।
एक प्रगतिशील राजनीतिक -बोध और चेतना देश की दुर्दशा और बदहाल जनता को एक नए और सुन्दर समाज के निर्माण के लिए परिस्थितियां भी तैयार करने में, राजनीतिक पार्टियां विफल रही हैं।
भाजपा के रात्रि-शिविर में भाजपा का सांसद नोटबंदी से होने वाले दुष्परिणाम जब गिना रहे थे, कुछ सांसादों ने कहा कि हमें जनता से डर लगता है , उनके सवालों का जवाब देना मुश्किल है, हमला हो सकता है।

भाजपा नेता और केंद्रीय मंत्री वैंकया नायडू ने नोट बंदी के लागू के पहले की तैयारी न होने की ओर आवाज़ ज़रूर उठाई लेकिन उनके सवाल को नहीं लिया गया।
अध्यक्ष महोदय अमित शाह ने कड़े शव्दों में कहा कि जनता में जाकर नोटबंदी के पक्ष में हवा बनाओ।
अमित शाह ने डांट लगाई की कोई भी प्रधानमंत्री के खिलाफ कुछ नहीं बोलेगा, मामला राष्ट्र के विकास का है मतलब राष्ट्रवाद से है।
नोटबंदी के बाद के मनुष्यों की आर्थिक बदहाली और समस्याओं को भाजपा के चिंतन-शिविर में इस तरह से दबा कर उसे राष्ट्रवाद से जोड़ा जाए तो प्रगतिशील राजनीतिक बोध और चेतना विकसित होने के बदले खंडित ही होगी तो फिर देश का विकास नहीं, देश में हाहाकार ही होगा।

हाहाकार से लोग परिचित हैं।
कांग्रेस पार्टी जनता के आर्थिक बदहाली के वक़्त मुसलमानों को 90 मिनट का नमाज़ पढ़ने का अवकाश मुहैया करवायेगी तो क्या प्रगतिशील राजनैतिक बोध और चेतना खंडित ही होगी। जनता और देश के आर्थिक सवालों के साथ उत्तराखंड की कांग्रेस सरकार ने क्रूर मज़ाक किया है।
खंडित चेतना और भद्द हो चली राजनीतिक बोध की आंधी में कांग्रेस पार्टी अपनी 60-70 सालों की उपलब्धियों को भी जनता के सामने ले जाने में विफल हो रही है।
आज की कांग्रेस के पास व्यापक राजनैतिक चिंतन का निर्माण इस प्रकार के धार्मिक-तुष्टिकरण से संभव नहीं है।

जाति और धार्मिक-तुष्टिकरण ने राजनैतिक बोध और चेतना के व्यापक मानवीय आधार को सीमित कर दिया है।
सामाजवादियों ने जाति और धर्म की तुष्टिकरण में मुफलिसी में चीत्कार करती विशाल जनता के राजनैतिक, सामाजिक और चेतनागत दृष्टि को खंडित किया है। समाजवाद का मज़ाक ज़्यादा उड़ाया गया।
वामपंथी सोच जो आर्थिक -हालातों में वर्ग की अवधारणा के व्यापक राजनीतिक तीक्ष्णता और प्रगतिशील चेतना के निर्माण में देश की जनता के साथ होते, वो भी छीन-भिन्न हो चुके हैं। "हम कही ख़त्म ना हो जाएँ" ...इसीलिए कहीं कांग्रेस तो कहीं समाजवादी, तो कहीं जयललिता की पार्टी के साथ गठबंधन।

वर्ग की अवधारणा का क्षरण तो होना ही था...
जनता आर्थिक और राजनैतिक मुद्द्दों पर अपनी सामहिक पृष्ठभूमि के साथ राजनीतिक निर्णय कर भाजपा, जद (यू), राजद,बसपा ,सपा , DMK ,AIDMK और तेलगु देशम आदि को मतदान करती है। कुछ लोग वाम पंथ और कांग्रेस को।
भाजपा की राजनीति इसमें सफल हुई है। कोई आर्थिक- विकास या रोज़गार की दशा-दिशा अब तय नहीं होने वाली है। ये जो करती है, अन्य राजनीतिक पार्टियां रियेक्ट करती हैं।
इस रिएक्शन का असर विपक्ष की राजनीतिक बोध और चेतना के रिग्रेशन या तिरोहण में हुआ है और होता रहेगा।