रद्द हो खुर्जा बिजली परियोजना
रद्द हो खुर्जा बिजली परियोजना
नई दिल्ली, 23 अक्तूबर। इंस्टिट्यूट फॉर एनर्जी इकोनॉमिक्स एंड फाइनेंसियल एनालिसिस (IEEFA) ने एक रिपोर्ट जारी कर खुर्जा बिजली परियोजना को रद्द करने की मांग की है।
IEEFA ऊर्जा और पर्यावरण से संबंधित वित्तीय और आर्थिक मुद्दों पर वैश्विक अनुसंधान और विश्लेषण करता है।
नई दिल्ली में आज जारी आईईईएफए की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि टिहरी हाइड्रो डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (टीएचडीसी) द्वारा उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर स्थित खुर्जा (Khurja Supercritical Thermal Power Plant in the Bulandshahr district of Uttar Pradesh) में प्रस्तावित 1320 मेगावॉट उत्पादन क्षमता के सुपरक्रिटिकल थर्मल पॉवर प्लांट में अब काफी देर हो चुकी है। यह बेहद पुराना हो चुका कारोबारी प्रस्ताव अब प्रदेश और प्रदेश में तेजी से बदल रही ऊर्जा बाजार सम्बन्धी आवश्यकताओं को पूरा करने के लायक नहीं बचा है।
कानूनी अड़चनों में उलझी पड़ी है यह परियोजना
रिपोर्ट में कहा गया है कि लगभग 12,676 करोड़ रुपये (1.8 अरब डॉलर) की अनुमानित लागत वाली इस परियोजना को क्षेत्र में बिजली की तेजी से बढ़ती मांग को पूरा करने तथा स्थानीय स्तर पर बिजली की किल्लत दूर करने के लिहाज से जरूरी बताया गया था। इस वक्त यह परियोजना कानूनी अड़चनों में उलझी पड़ी है, और अभी इस परियोजना के शुरू होने के कोई आसार भी नहीं दिखते। इसके अलावा पिछले 7 वर्षों के दौरान भारत के ऊर्जा बाजार में तेजी से हुए बदलावों से इस परियोजना को जारी रखने के औचित्य और उसकी वित्तीय व्यवहार्यता पर सवाल उठे हैं।
महंगी होगी खुर्जा में बनी बिजली
पिछले सात वर्षों के दौरान सौर तथा वायु ऊर्जा उत्पादन क्षेत्र ने भारतीय बिजली क्षेत्र को इन सस्ते तथा प्रदूषणमुक्त घरेलू ऊर्जा विकल्पों की तरफ झुका लिया है। खासतौर से हाल के कुछ वर्षों में अक्षय ऊर्जा की दरों में गिरावट आयी है और यह 25 सालों के शून्य अनुक्रमण में 3 रुपये प्रति यूनिट तक पहुंच गयी हैं। इसके विपरीत, सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी ऑफ इण्डिया के अनुमान के मुताबिक एक पुरानी तकनीक पर आधारित कोयला आधारित सुपर क्रिटिकल ऐसा पॉवर प्लांट, जिसकी वास्तविक उत्पादन क्षमता अधिकतम 60 प्रतिशत ही होगी, की स्तरित दर 4.39 रुपये प्रति यूनिट होगी।
हालांकि एक बात तय है कि खुर्जा बिजलीघर में विद्युत उत्पादन की लागत ज्यादा होगी। यह एक ऐसी परियोजना होगी, जिसमें इस्तेमाल के लिये कोयले को करीब 900 किलोमीटर दूर से लाना होगा। यानी ढुलाई के मद में काफी धन खर्च होगा।
इसके अलावा, परियोजना की शुरुआती लागत उस वक्त आंकी गयी थी, जब बाजार में कोयले के दामों में बढ़ोत्तरी नहीं हुई थी। नवम्बर 2016 से किये गये परियोजना के पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (ईआईए) के अनुसार यह बिजली संयंत्र अपनी 90 प्रतिशत क्षमता का इस्तेमाल कर सकेगा, वहीं देश की मौजूदा कोयला आधारित परियोजनाएं पिछले 2 वर्षों के दौरान औसतन 60 प्रतिशत क्षमता से कम ही उत्पादन कर सकी हैं।
इन तमाम आशावादी अनुमानों के बावजूद इस परियोजना के विकासकर्ताओं का अनुमान है कि इस पॉवर प्लांट से पैदा होने वाली बिजली की लागत 4.88 रुपये प्रति यूनिट होगी। यह सौर ऊर्जा के मुकाबले काफी ज्यादा है।
प्रति यूनिट 5.67 रुपये तक होगी खुर्जा बिजली परियोजना में बिजली की दर
आईईईएफए के अनुमान के मुताबिक, कोयले की ढुलाई की लागतों, कोयले की कीमतों में बढ़ोत्तरी और क्षमता से कम बिजली उत्पादन से होने वाले नुकसान के समायोजन को जोड़ लें तो खुर्जा बिजली परियोजना में प्रति यूनिट बिजली की दर 5.67 रुपये तक पहुंचेगी। इससे सस्ते तथा स्वच्छ ऊर्जा की तरफ तेजी से झुक रहे बाजार में इस परियोजना की व्यवहार्यता पर गम्भीर सवाल उठ खड़े हुए हैं। शून्य अनुक्रमण के साथ 3 रुपये प्रति यूनिट वाली अक्षय ऊर्जा के मुकाबले 5.67 रुपये प्रति यूनिट की वास्तविक दर वाला खुर्जा सुपरक्रिटिकल थर्मल पॉवर प्लांट, 25 वर्षों के दौरान मुख्य रूप से भारत के करदाताओं की गाढ़ी कमाई के 6946 करोड़ रुपये (10 अरब डॉलर) की सब्सिडी पर निर्भर होगा।
इन लागतों के अतिरिक्त इस परियोजना में अनेक गम्भीर कानूनी तथा पर्यावरण सम्बन्धी चुनौतियों से जूझने के कारण पहले ही देर हो रही है। इस परियोजना के लिये मध्य प्रदेश के अमेलिया कोल ब्लॉक से अब शायद ही कभी कोयला निकाला जा सके, क्योंकि पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने इसे ऐसा क्षेत्र माना है, जहां खनन कार्य नहीं हो सकता। इसके अलावा किसानों ने इस परियोजना के लिये अपनी जमीन लिये जाने को अदालत में चुनौती दे रखी है। वे समुचित मुआवजे की मांग की कानूनी लड़ाई को इलाहाबाद उच्च न्यायालय में लड़ रहे हैं।
खुर्जा बिजली परियोजना के साथ दिक्कतें
अधिक व्यापक रूप से देखें तो खुर्जा पॉवर प्लांट भी उसी खतरे से जूझ रहा है, जो इस वक्त भारत में ऐसी सभी प्रस्तावित बिजली परियोजनाओं पर मंडरा रहा है। उदाहरण के तौर पर भारत की सबसे बड़ी बिजली उत्पादक संस्था नेशनल थर्मल पॉवर कारपोरेशन (एनटीपीसी) ने इस साल अब तक कोयले से चलने वाली कुल 10.5 गीगावॉट उत्पादन क्षमता वाली प्रस्तावित इकाइयों के निर्माण का इरादा छोड़ दिया है। इनमें से ज्यादातर मामलों में खुद राज्य सरकारों ने ही परियोजनाओं के लिये ऊर्जा खरीद समझौतों को निरस्त करने की इच्छा व्यक्त की थी। सरकारों का मानना था कि बाजार में कोयला आधारित परियोजनाओं से उत्पादित बिजली की मांग घट रही है। इसके अलावा अक्षय ऊर्जा की कीमतों में लगातार हो रही गिरावट से राज्य सरकारों ने बिजली की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिये सौर तथा वायु ऊर्जा स्रोतों को तरजीह देना शुरू कर दिया है।
खुर्जा बिजली परियोजना के साथ एक और दिक्कत यह है कि इस कोयला आधारित परियोजना के 7.4 गीगावॉट क्षमता वाले हिस्से का निर्माण पहले ही शुरू हो चुका है। यह आईईईएफए द्वारा जतायी गयी आवश्यकता से कहीं ज्यादा है। भारत के अन्य हिस्सों की तरह उत्तर प्रदेश ने भी अगले 10 वर्षों के लिये अक्षय ऊर्जा उत्पादन के महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित कर रखे हैं। खासकर, यह राज्य वर्ष 2027/28 तक प्रदेश में 10.7 गीगावॉट सौर ऊर्जा क्षमता जोड़ना चाहता है। इसमें 4.3 गीगावॉट रूफटॉप सोलर की होगी। इससे प्रदेश के कुल बिजली उत्पादन में सौर ऊर्जा उत्पादन की हिस्सेदारी को बढ़ाकर 49 प्रतिशत किया जा सकेगा, जो इस वक्त महज 11 प्रतिशत ही है।
अगर राज्य सरकार सौर ऊर्जा सम्बन्धी अपने लक्ष्य हासिल करने में कामयाब रही तो कोयले से बनने वाली बिजली की मांग में उल्लेखनीय गिरावट आयेगी। अगर थर्मल पॉवर में जरूरत से ज्यादा नयी क्षमता को जोड़ा गया तो प्रदेश में कोयला आधारित बिजली परियोजनाओं का औसत उप इष्टतम क्षमता फैक्टर 63 प्रतिशत रह जाएगा।
अगर खुर्जा बिजली परियोजना का निर्माण किया गया तो इसमें और गिरावट आ सकती है तो परियोजना का अर्थशास्त्र और भी गड़बड़ हो जाएगा।
उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि भारत के अक्षय ऊर्जा सम्बन्धी लक्ष्यों तथा मुश्किल में पड़ी उनकी मौजूदा एवं प्रस्तावित कोयला आधारित बिजली परियोजनाओं के विवेकीकरण की उनकी इच्छा के लिहाज से भी खुर्जा ऊर्जा परियोजना बिल्कुल अनुकूल नहीं है।
रिपोर्ट के मुताबिक खुर्जा परियोजना उत्तर प्रदेश की बिजली वितरण कम्पनियों में हुए आमूल-चूल बदलावों के पैमानों पर भी खरी नहीं उतरती। वितरण कम्पनियां लगभग आधे दामों पर उपलब्ध किफायती बिजली परियोजनाओं को बढ़ावा देकर अपनी थोक ऊर्जा लागतों पर ध्यान केन्द्रित कर रही हैं।
भारत में अक्षय ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य
Target for renewable energy production in India
रिपोर्ट के मुताबिक भारत ने 275 गीगावॉट अक्षय ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य तय किया है। इससे यह निर्धारित होगा कि आने वाले समय में भारत का बिजली तंत्र किस प्रकार बदलने वाला है। इससे फ्लेक्सिबल पीक-आवर कैपेसिटी पर खास जोर दिया जाने लगेगा, ताकि सौर तथा वायु ऊर्जा स्रोतों से बिजली के उत्पादन में होने वाले उतार-चढ़ाव के प्रभाव को संतुलित किया जा सके और ग्रिड की स्थिरता को बनाये रखा जा सके। तेजी से उत्पादन बढ़ाने में नाकाम रहने वाली कोयला आधारित बिजली परियोजनाओं को और बढ़ाने से देश की आवश्यकताएं पूरी नहीं होंगी।
खुर्जा बिजली परियोजना पूरी तरह से राज्य द्वारा दिये गये अनुदानयुक्त वित्तपोषण पर आधारित है। इसे पॉवर फाइनेंस कॉरपोरेशन ने वित्तपोषित किया है, जो पहले से ही कोयला आधारित परियोजनाओं में अपनी अरबों रुपये की सम्पत्तियां फंसने के दबाव से गुजर रहा है। वर्ष 2017/18 के अंत तक इस कॉरपोरेशन की 31000 करोड़ रुपये (4.5 अरब डॉलर) की सम्पत्ति कोयला आधारित परियोजनाओं की मद में फंस चुकी है, जो उसके द्वारा दिये गये कुल कर्ज का 11 प्रतिशत है।
पॉवर फाइनेंस कॉरपोरेशन की मुश्किलें बढ़ेंगी कर्ज से
आईईईएफए का मानना है कि खुर्जा बिजलीघर के लिये 9000 करोड़ रुपये का और कर्ज देने से पॉवर फाइनेंस कॉरपोरेशन की मुश्किलें और बढ़ने ही वाली हैं।
आईएल और एफएस की नाकामी के बाद आईईईएफए का मानना है कि पॉवर फाइनेंस कॉरपोरेशन (पीएफसी) और भारत सरकार की बेहतर तरीके से सेवा हो सकेगी, बशर्ते पीएफसी अक्षय ऊर्जा परियोजना क्षेत्र में अपनी सहभागिता को बढ़ाने के अपने हालिया प्रयासों को जारी रखे। पिछले एक वर्ष के दौरान ही पीएफसी द्वारा अक्षय ऊर्जा क्षेत्र को दिये जाने वाले कर्ज में 260 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है। वर्ष 2016-17 में जहां यह 9000 करोड़ रुपये (1.3 अरब डॉलर) था, वहीं 2017/18 में यह 2500 करोड़ रुपये (370 अरब डॉलर) हो गया। पीएफसी ने अपने कुल वित्तपोषण का 20 प्रतिशत हिस्सा अक्षय ऊर्जा क्षेत्र को समर्पित करने का लक्ष्य रखा है, जो इस वक्त मात्र 3 प्रतिशत ही है। हमारा मानना है कि इसे इसी दिशा में जाना भी चाहिये।
रिपोर्ट में कहा गया है कि खुर्जा परियोजना टीएचडीसी की हाइड्रोइलेक्ट्रिसिटी सम्बन्धी मूल कार्यनिर्वाह क्षमताओं से लगातार दूर होती जा रही है। टीएचडीसी ने हाल के वर्षों में अक्षय ऊर्जा तथा भण्डारण परियोजनाओं पर ज्यादा ध्यान देना शुरू किया है। टीएचडीसी ने गुजरात में अब तक 113 मेगावॉट क्षमता की वायु ऊर्जा परियोजनाओं का निर्माण किया है। इनका निर्माण अनेक निविदाओं के आधार पर किया गया है। टीएचडीसी इस वक्त उत्तराखण्ड में 1 गीगावॉट क्षमता वाले टिहरी पम्प्ड हाइड्रो स्टोरेज का निर्माण कर रहा है। अक्षय ऊर्जा पर इस हद तक ध्यान दिये जाने के बीच खुर्जा परियोजना से इस कम्पनी की विस्तार सम्बन्धी योजनाओं को काफी खर्चीला आघात लगेगा।
अब कोई जरूरत नहीं रह गयी है खुर्जा बिजली परियोजना की
रिपोर्ट का कुल सार है कि बिजली की तात्कालिक किल्लत और बढ़ती मांग की पूर्ति के लिये शुरू में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा सहयोगप्राप्त खुर्जा बिजली परियोजना की अब कोई जरूरत नहीं रह गयी है। उत्तर भारत में ऊर्जा की पहुंच बढ़ाने और ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के बजाय यह परियोजना भारत के थर्मल पॉवर क्षेत्र तथा वित्त क्षेत्र के बोझ को और बढ़ाएगी। आईईईएफए की यह रिपोर्ट हमारे सामने 2028 तक के दशक के लिये उत्तर प्रदेश के ऊर्जा तंत्र का एक मॉडल पेश करती है।
रिपोर्ट में मांग की गई है कि काफी विलम्बित, अत्यधिक खर्चीली तथा अव्यवहारिक हो चुकी खुर्जा बिजली परियोजना को रद्द किया जाना चाहिये।
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