तृतीय अरविन्द स्मृति संगोष्ठी का दूसरा दिन

लखनऊ, 23 जुलाई। न्यायमूर्ति राजिन्दर सच्चर ने कहा कि सरकार एक के बाद एक देश के बेशकीमती प्राकृतिक संसाधन देशी-विदेशी कम्पनियों के हवाले कर रही है और इसके लिए भारी संख्या में आदिवासियों और किसानों को उजाड़ा जा रहा है। इनका प्रतिरोध कर रही जनता को कुचलने के लिए सरकार उन इलाकों में सशस्त्र बलों को भेज रही है। माओवादी हिंसा को सरकार जनता के दमन के बहाने के तौर पर इस्तेमाल कर रही है।
श्री सच्चर ने आज यहां तीसरी अरविन्द स्मृति संगोष्ठी के दूसरे दिन कहा कि सरकार एक ओर जनता के विरुद्ध सेना का इस्तेमाल नहीं करने की बात करती है, तो दूसरी ओर छत्तीसगढ़ में 750 वर्ग किलोमीटर जंगल का इलाका सेना के ट्रेनिंग कैम्प के लिए सौंप दिया गया है। सरकार अपनी कार्रवाइयों से गृहयुद्ध की स्थिति पैदा कर रही है।
उन्होंने कहा कि आज देश में दमन है तो उसका प्रतिरोध भी है। गोलीकाण्डों और गिरफ्तारियों से लोग डरे नहीं हैं। श्री सच्चर ने कात्यायनी द्वारा प्रस्तुत आधार आलेख की चर्चा करते हुए कहा कि राजद्रोह के कानून और सशस्त्र बल विशेष अधिकार कानून को खत्म करने के सवाल पर देशव्यापी साझा आन्दोलन खड़ा किया जा सकता है। पीयूसीएल ने इस मुद्दे पर 10 लाख हस्ताक्षरों के साथ संसद के अगले सत्र के दौरान दिल्ली में विशाल प्रदर्शन करने की पहल की है। यहां से शुरुआज करके सभी काले कानूनों को खत्म करने के सवाल पर साझा मोर्चा बनाया जा सकता है।
इससे पहले कात्यायनी ने अपने आलेख में कहा कि देश भर में जनता पर होने वाले राजकीय दमन और राजकीय आतंक की घटनाओं को व्यापक जन-प्रतिरोध का मुद्दा तभी बनाया जा सकता है जब जनवादी अधिकार आन्दोलन को बुद्धिजीवियों के दायरे से बाहर निकालकर आम लोगों के बीच ले जाया जाये और उनके मुद्दों से जोड़ा जाये।
उन्होंने कहा कि आज हालत यह है कि संविधान और कानून कुछ भी कहे स्त्रियों, दलितों, अलपसंख्यकों के बर्बर दमन-उत्पीड़न की घटनाओं में बढ़ोत्तरी ही होती जा रही है। सामाजिक ताने-बाने में व्याप्त निरंकुशता और जनद्रोही मूल्यों-मान्यताओं-संस्थाओं के विरुद्ध संघर्ष भी जनवादी अधिकार आन्दोलन का अहम कार्यभार होना चाहिए।
कात्यायनी ने देशभर के जनवादी अधिकार संगठनों के न्यूनतम साझा कार्यक्रम के आधार पर व्यापक और मजबूत संयुक्त मोर्चा बनाने की जरूरत पर भी बल दिया।
नेपाल के प्रमुख मानवाधिकरकर्मी डाॅ. महेश मास्के ने कहा कि सत्ता की हिंसा ही जनता के संघर्षों को हिंसा का रास्ता अपनाने पर मजबूर करती है। उन्होंने नेपाल और भारत दोनों ही देशों में अधिक जनवादी संविधान की ज़रूरत की चर्चा करते हुए दोनों जगहों की अनेक समानताओं की भी चर्चा की।
आन्ध्र प्रदेश पीयूसीएल की अध्यक्ष जया विन्ध्यला ने व्यापक आधार वाले जनवादी अधिकार आन्दोलन की जरूरत का समर्थन करते हुए कहा कि इसके लिए सभी संगठनों के बीच विचार-विमर्श होना चाहिए।
लाॅयर्स फाॅर जस्टिस एण्ड डेमोक्रेटिक राइट्स, पंजाब के एन. के. जीत ने कहा कि पंजाब में जनान्दोलनों के दमन के लिए दो खतरनाक काले कानून लाये गये हैं। पंजाब सार्वजनिक सम्पत्ति क्षति निरोधक कानून के तहत प्रशासन की अनुमति के बिना धरना-प्रदर्शन करने पर 2 से 7 वर्ष तक की सजा हो सकती है।
एपीडीआर, पश्चिम बंगाल के उपाध्यक्ष प्रो. दीपांकर चक्रवर्ती ने अपना आलेख प्रस्तुत करते हुए कहा कि मानवाधिकार आन्दोलन को जनान्दोलनों के साथ करीबी रिश्ता बनाना होगा। पीयूडीआर, दिल्ली के परमजीत ने उदाहरणों के साथ बताया कि देश के अलग-अलग हिस्सों में राजद्रोह तथा अन्य काले कानूनों का जनान्दोलनों के खिलाफ किस प्रकार दुरुपयोग किया जा रहा है।
आईआईटी कानपुर के प्रो. राहुल वर्मन ने मजदूरों के बुनियादी अधिकारों के हनन का मुद्दा उठाये जाने की वकालत की।
सभी आलेखों तथा श्री सच्चर के विस्तृत वक्तव्य पर होने वाली चर्चा में ‘आह्वान’ के सम्पादक अभिनव, पीयूसीएल के उपाध्यक्ष चितरंजन सिंह, दिल्ली मेट्रो कामगार यूनियन के प्रेम प्रकाश, आन्ध्र प्रदेश पीयूसीएल के महासचिव डी. प्रकाश आदि ने भाग लिया।
आज के सत्र की अध्यक्षता डाॅ. महेश मास्के, सुश्री जया विन्ध्यला तथा अरविन्द स्मृति न्यास की मीनाक्षी ने की। दूसरे सत्र की अध्यक्षता वरिष्ठ कवि कपिलेश भोज, हरियाणा से आए कशमीर सिंह और पंजाबी पत्रिका प्रतिबद्ध के सम्पादक सुखविन्दर ने की। संचालन सत्यम ने किया।
संगोष्ठी के तीसरे दिन पहले सत्र में श्रीलंका, नेपाल और दक्षिण एशिया में जनवादी अधिकारों की स्थिति पर विशेष खण्ड होगा जिसमें श्रीलंका के प्रो. कलिंग ट्यूडर सिल्वा और नेपाल के महेश मास्के एवं मैरी डिशेन के आलेख प्रस्तुत किये जायेंगे।