राजसभा में गूंजी वह दुनिया की सबसे आपराधिक, अश्लील और वीभत्स हंसी थी
राजसभा में गूंजी वह दुनिया की सबसे आपराधिक, अश्लील और वीभत्स हंसी थी
राजसभा में गूंजी वह दुनिया की सबसे आपराधिक, अश्लील और वीभत्स हंसी थी, जिसमें वे सब मेजें थपथपाते हुए हंस रहे थे!
वे हंस रहे थे अपने उस राजा की शैतानी बर्बर मर्दाना कुंठा की तेल मालिश करते हुए, जिसकी हरेक हरकत की औकात एक ज़रख़रीद गुलाम से ज्यादा नहीं थी..!
वे सब हंस रहे थे अपनी दिमागी गुलामी की लाचारी के समंदर में ऊब-डूब करते हुए, जिसमें बजबजाते रह कर ही चारदिवारी के भीतर उनकी मर्दाना बादशाहत की कुर्सी कायम रहती है..!
वे हंस रहे थे अपनी बेहूदगी और बेवकूफी का इश्तिहार करते हुए कि देखो, हमारा दिमाग इंसानियत और जज्बातों के तराजू पर इतनी ही औकात रखता है कि कोई बलात्कारी, कोई कातिल, कोई लुटेरा, कोई चोर, कोई लुच्चा-लफंगा... अपने जमीर के बचे होने की मुनादी कर सके..!
वे सब हंस रहे थे उस औरत की खुली और खिलखिलाती हुई हंसी पर, जिस हंसी के खौफ़ से उनके मर्दाना पुरखे तक कांप जाते हैं..!
किसी औरत की हंसी कहीं उनकी मर्दाना बादशाहत के बरक्स अपनी रोशनी से कोई नई दुनिया न रच दे, इसलिए वे उस हंसी का कत्ल कर देने के खयाल से हंस रहे थे..!
मेजों की थपथपाहट के साथ उनकी बर्बर मर्दाना हंसी किसी औरत की 'नाक काट लेने' से कम नहीं था... किसी औरत को 'कच्चा निगल जाने' से कम नहीं था... जिसे आम जुबान में बलात्कार कहते हैं... जिसे आम जुबान में बलात्कार के बाद कत्ल कहते हैं..!
जी हां, वे राजसभा में उस औरत की हंसी पर अपनी बेहूदा शैतानी मर्दाना हंसी से हमला कर रहे थे, जिसे असल में सुरूपनखा के तौर पर जाना जाता है..!
और हां... वे जिस सुरूपनखा की हंसी पर हंस रहे थे... मैं उस सुरूपनखा से बेपनाह मुहब्बत करता हूं... क्योंकि अपनी खुली और खिलखिलाती हंसी से लबरेज और आजाद सुरूपनखा मेरी निगाह में इस समूचे कायनात की सबसे खूबसूरत औरत है..!
ओ मेरी अजीज़... मेरी जान सुरूपनखा... तुम्हें मेरी मुहब्बत का तहेदिल से सलाम पहुंचे कि मर्दाना शैतानों की दुनिया तुम्हारी आजाद खिलखिलाती हंसी से... यानी तुमसे आज भी खौफ़ खाती है..! तुम्हारी आजाद गूंजती हंसी पर मेरी हजार जान क़ुर्बान..!
(इस पोस्ट का ताल्लुक सुर्खियों में मौजूद किसी हंसी से नहीं है! यह निहायत निजी तस्वीर है!)
अरविंद शेष की एफबी टाइमलाइन से साभार


