शाह आलम

अयोध्या। अपने पुश्तैनी घर से महज़ दस किलोमीटर की दूरी पर सरयू की गोद में बसा शहर है 'टांडा'। इस शहर की खासियत यह है कि मुगलिया सल्तनत से पहले अपने वजूद में आते ही यह कस्बा 'बुनकर नगरी' के तौर पर मशहूर हुआ। यहाँ की तहज़ीब मुझे बचपन से अपनी तरफ खींचती है। वजह किसी के घर चले जाइए 'खातिरदारी' का हिसाब नहीं। जितना घूमा इस मुक़ाबले का कोई शहर नही दिखा। आज भी यहाँ दो रुपए में पान, तीन रुपए में बढ़िया चाय दस-बारह मीटर की दूरी पर मिल ही जाती है।

यह वाहिद भाई की तस्वीर जो आप देख रहे हैं, रामनामी गमछे की छपाई कर रहे हैं। यह इनके तीन पीढ़ियों से चला आ रहा पुश्तैनी धंधा है। पूरे शहर में सिर्फ वाहिद भाई छापते हैं। इसकी छपाई का दाम सुनकर आप को ताज्जुब होगा, क्योंकि एक 'रामनामी' पूरे गमछे की छपाई सिर्फ एक रुपए है। इसके अलावा मैटीरियल का कोई खर्च नहीं। अफसोस.... यह शहर एक साल से सांप्रदायिक राजनीति की प्रयोगशाला बनता जा रहा है..... #TANDA, ABN

शाह आलम घुमक्कड़ी प्रवृत्ति के पत्रकार व डॉक्युमेंट्री निर्माता हैं। हस्तक्षेप टीम के सदस्य हैं।