राष्ट्रवाद के लिए युद्ध एक धंधा, नवाज से दोस्ती का हक अदा कर ही दिया मोदी ने ?
राष्ट्रवाद के लिए युद्ध एक धंधा, नवाज से दोस्ती का हक अदा कर ही दिया मोदी ने ?
राष्ट्रवाद के लिए युद्ध एक धंधा, नवाज से दोस्ती का हक अदा कर दिया मोदी ने ?
महेंद्र मिश्र
कुछ लोगों के लिए युद्ध एक धंधा है। इसलिए युद्धोन्माद उनकी जरूरत है।
‘सर्जिकल स्ट्राइक’ के बाद भावनाएं वैसे भी उबाल पर हैं।
राष्ट्रवाद की आड़ में चलने वाले इस खेल में ढेर सारी चीजों का वारा न्यारा हो रहा है। लेकिन उसकी न तो हमें खबर है। न ही आपको। इसमें बहुत कुछ पर्दे के पीछे है। तो कुछ चीजें सामने भी आ रही हैं। मसलन इस पूरे घटनाक्रम से अगर किन्हीं दो लोगों को सबसे ज्यादा फायदा होता दिख रहा है। तो वो पाक और भारत के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और नरेंद्र मोदी हैं। इसमें किसको ज्यादा हुआ। इसकी नाप तौल तो बाद में होगी। लेकिन प्रथम दृष्ट्या नवाज ज्यादा फायदे में दिख रहे हैं।
दरअसल सरहदी तनाव के पहले पाकिस्तान अपने घर में ही आतंकियों से जूझ रहा था। कोई हफ्ता शायद ही ऐसा बीता हो, जब वहां कोई बड़ा आतंकी विस्फोट नहीं हुआ हो। वह कोई मस्जिद हो या कि अस्पताल या फिर इबादतगाह। हर सार्वजनिक स्थान आतंकियों के निशाने पर था। लेकिन सरहद पर तनाव के इस एक महीने में कोई विस्फोट सुनाई दिया? या कहीं कोई आतंकी हमला हुआ? उल्टे सारा घरेलू संकट सरहद पर शिफ्ट हो गया।
नवाज शरीफ और पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान को भी इस संकट से निजात मिल गई।
शरीफ के लिए इससे बड़ी राहत की बात कोई दूसरी हो सकती थी?
पाक पीएम के लिए दूसरा सबसे बड़ा संकट पनामा पेपर्स घोटाले में उनके समेत परिवारी सदस्यों का नाम आना था। शरीफ इस मामले में चौतरफा घिरे हुए थे। और इमरान खान से लेकर विपक्षी पार्टी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के निशाने पर थे। लेकिन विपक्ष के इस चक्रव्यूह से निकलने के लिए शायद उन्हें भी इसी तरह के किसी ब्रह्मास्त्र की तलाश थी। जिसको सरहदी तनाव ने मुहैया करा दिया।
ऐसे में मोदी साहब कितने ही बड़े पाकिस्तान के दुश्मन दिख रहे हों, चाहे अनचाहे उन्होंने शरीफ के साथ दोस्ती का अपना फर्ज पूरा कर दिया है।
शरीफ को इससे जो राहत मिली है वह शायद ही कोई और दे पाता। इसके लिए शरीफ खुले तौर पर न सही लेकिन अंदर ही अंदर जरूर मोदी जी को मुबारकबाद दे रहे होंगे। अब उनके सामने कम से कम तात्कालिक तौर पर आतंकी विस्फोट जैसी कोई अंदरूनी समस्या नहीं है। न ही भ्रष्टाचार पर उनकी कोई घेरेबंदी है। अलबत्ता भारत के खिलाफ युद्धोन्माद भड़काकर पूरी पाक जनता को अपने पीछे खड़ा कर लेने का मौका जरूर है।
यही बात मोदी जी के लिए भी उतनी ही सच है।
ढाई सालों के शासन का नतीजा ये था कि मोदी जी हर मोर्चे पर नाकाम दिख रहे थे। कुछ चुनावी वादों को उनके पार्टी अध्यक्ष ने जुमला करार दिया। तो कुछ को मंत्रिमंडल के सहयोगियों ने। अब न कुछ पूरा करने के लिए बचा था और न ही लोगों के पास पूछने के लिए कुछ बाकी था।
मोहभंग के इस दौर में मोदी की साख रसातल में गोते खा रही थी।
इस बीच उरी में आतंकी हमले में हमारे 19 जवान हलाक हो गए। मोदी जी के लिए यह आखिरी परीक्षा की घड़ी थी। यह आखिरी मोर्चा था।
मोदी साहब अगर इस पर भी मात खाते तो फिर उनके पास कुछ बचता नहीं। इसीलिए वह किसी भी कीमत पर इस बाजी को जीतना चाहते थे। उसी का नतीजा सर्जिकल स्ट्राइक (हालांकि इस भी दावे-प्रति दावे हो रहे हैं।) के तौर पर सामने आया। इसके पीछे भक्तों का एक दबाव भी काम कर रहा था।
दरअसल मोदी जी की राष्ट्रीय राजनीति की रेल अब सरहद और राष्ट्रवाद की इन्हीं दोनों पटरियों पर चलेगी।
गुजरात में अगर सांप्रदायिक उन्माद और आतंकवाद के खिलाफ एनकाउंटर उनकी राजनीति का चारा था। और उसकी आड़ में कारपोरेट की सेवा प्रमुख कार्यभार। तो केंद्रीय राजनीति में राष्ट्रवाद और पाकिस्तान के खिलाफ युद्धोन्माद उसका स्थान लेते दिख रहे हैं। और इन दोनों की आड़ में कारपोरेट की सेवा होगी।
यह अनायास नहीं है कि सरहदी हलचल के बीच ईपीएफ पर मिलने वाले ब्याज में कटौती कर दी गई। स्टील से जुड़ी एक पब्लिक सेक्टर कंपनी के 7 फीसदी शेयर के विनिवेश का रातों रात फैसला हो गया।
जनता युद्ध की अफीम के नशे में है और कारपोरेट पीछे से उसकी जेब काट रहा है। इसके अलावा कारपोरेट के इसी तरह के हजार फायदे कराए जाएंगे। जिसके बारे में हमें और आपको पता भी नहीं चलेगा।
राफेल सौदे में हेलीकाप्टरों की गैरतार्किक कीमतों पर जनता सवाल खड़ी करती उससे पहले ही सरहद गर्म हो गई।
अब सवाल खड़ा करने वालों से बड़ा देशद्रोही भला कौन होगा? इन दोनों शख्सियतों के बाद युद्ध और उसके उन्माद का किसी तीसरे को अगर कोई फायदा होगा। तो वो हथियार बनाने वाली कंपनियां, उसके दलाल और उन पर फैसला लेने वाले सत्ता से जुड़े लोग हैं। यही वह तबका है जो सबसे ज्यादा चांदी काटता है। और शायद यही वजह है कि बड़े और पश्चिमी देशों की भी वैसी तीखी प्रतिक्रिया नहीं आई है। जिसकी उम्मीद थी। शायद वो मामले को थोड़ा और गरम होते देखना चाहते हैं। उसके बाद ही उनके हथियारों की बिक्री का रास्ता खुलेगा।
इन चीजों के अलावा सेना के चोटी के अफसरों को इसका फायदा होता है, क्योंकि उन्हें सीमा पर लड़ाई की अगुवाई नहीं करनी होती है। इसलिए जान जाने का कोई खतरा भी नहीं है। और इतिहास में नाम दर्ज करने का मौका ऊपर से मिलता है। लिहाजा उन्हें हमेशा इस तरह के मौके की तलाश रहती है। ऐसे में समय आने पर वो कत्तई नहीं चूकते।
अगर किसी एक और तबके को इससे कोई फायदा दिखता है तो वह मध्यवर्ग है।
हालांकि यह पदार्थ रूप में कम मानसिक तौर पर ज्यादा होता है। पिज्जा और बर्गर संस्कृति के पोषक इस हिस्से का मनोरंजन जरूर होता है। वह भी आजकल युद्ध को एक खेल के तौर पर लेने लगा है। भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट मैच के दौरान लड़ाई के जिस सुख का वह आनंद लेता था। मैच समाप्त होने के बाद उससे वंचित हो गया था।
ऐसे में युद्धोन्माद उसका नया विकल्प बन गया है। और इसके साथ ही उसके पुराने दिन लौट आए हैं।
ड्राइंग रूम में बैठकर चिप्स के साथ लड़ाई में मुंडी गिनने का जो आनंद है वह फिर भला कहां मिलेगा?
लेकिन बचे देश के बाकी तबकों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। युद्ध उनके लिए किसी अभिशाप से कम नहीं होगा। इसमें सबसे पहले सीमा से सटे रिहाइशी इलाके और उसके लोग हैं। पंजाब की सरहद से सटे 10 किमी भीतर के लोगों के लिए 1947 एक बार फिर जिंदा हो गया है। वहां उजड़ती बस्तियां हैं। छूटते खेत-खलिहान हैं। दर-बदर होती जिंदगियां हैं। और अनिश्चित भविष्य है। आने वाले दिनों में जिंदगी कैसे चलेगी न तो उसका कोई पता है। न ही विस्थापितों का कोई ठिकाना। 5 लाख से ज्यादा उजड़े लोगों के लिए रिहाइशी व्यवस्था किसी सरकार के बूते की बात नहीं। ऊपर से पूरे इलाके में बारूदी सुरंगे बिछाने के सरकार के ऐलान ने स्थानीय बाशिंदों के लिए नई मुसीबत खड़ी कर दी है।
युद्ध उनके लिए जहन्नुम होगा। युद्धोन्माद भी उससे कम नहीं।
और अगर यह बहुत ज्यादा दिनों तक खिंच गया। तो फिर भविष्य की परेशानियों की कल्पना कर पाना भी किसी के लिए मुश्किल है। ये हालात पंजाब से लेकर राजस्थान और कश्मीर तक के सरहदी लोगों को झेलने होंगे। यहां तबाहियां ही तबाहियां हैं।
दूसरे सीधे प्रभावित होने वालों में सरहद पर तैनात सैनिक और सुदूर बसे उनके परिजन होंगे। युद्ध की आशंका भर से उनके परिजनों की जेहन में उपजी पीड़ा का हम अहसास नहीं कर सकते हैं। युद्धोन्माद से युद्ध के बीच पसरे इस समय में उन्हें रोजाना मौत का सामना करना पड़ता है। हर दिन कयामत का दिन होता है।
हम कुछ दिनों के लए शहादत और भावना की झाड़ पर चढ़ा कर भले ही उनसे कुर्बानी हासिल कर लें। लेकिन इसकी कीमत उन्हें जीवन भर चुकानी पड़ती है। अपनों से बिछुड़ने का गम और अधूरी जिंदगी उनके जीवन का हिस्सा बन जाती है।
इसके साथ ही पूरी अर्थव्यवस्था ठप पड़ जाती है। इसका नतीजा महंगाई और रोजाना जरूरियात की चीजों पर सबसे ज्यादा पड़ता है। जिसका खामियाजा सीधे तौर पर गरीब और समाज के वंचित तबके पर पड़ता है। और उसकी जिंदगी मुहाल हो जाती है।
दोनों देशों की सरकारों, सत्ता प्रतिष्ठान, कारपोरेट, उच्च वर्ग और वर्दीधारियों का भले इसमें बड़ा लाभ हो। लेकिन जनता को इसमें घाटा ही घाटा है। ऐसे में जनता और देश के हित में सोचने वालों को इसके विरोध में खड़ा होने की जरूरत है।


