पहले दंगाइयों ने मारा अब ठंड मार रही है
मौत-घर बन रहे हैं मुजफ्फरनगर के राहत शिविर
फेसबुक पर "मुज़फ्फ़रनगर के राहत शिविर, राहत शिविर नहीं हैं, यातना शिविर हैं", यह कहा आचार्य उमाशंकर सिंह परमार ने। वरिष्ठ साहित्यकार मोहन श्रोत्रिय जी ने उसमें सिर्फ़ इतना जोड़ा, "राहत शिविर सच में यातना शिविर हैं, नन्हे-मुन्नों के क़त्लगाह हैं।" जी हां, लेकिन इन शब्दों और हकीकत का असर न उत्तर प्रदेश सरकार पर है न प्रशासन पर। नेता जी पूरी मौज में हैं, सुना गया है कि वह कहते पाए गए हैं कि #मुज़फ्फरनगर के राहत शिविर में कोई दंगा पीड़ित नहीं बचा है....वहां केवल कांग्रेस और बीजेपी के लोग रुके हुए हैं जो साजिश करके सरकार की छवि ख़राब कर रहे हैं..... ऐसे संवेदनहीन क्रूर माहौल में वरिष्ठ पत्रकार पंकज चतुर्वेदी इस रिपोर्ट में काला सच सामने रख रहे हैं...
सं.-ह.

किसी राजनीतिक पार्टी को कोई फ़र्क़ पड़ता नज़र नहीं आता !
पंकज चतुर्वेदी
पश्चिमी उत्तर प्रदेश का जो इलाका अभी कुछ महीनों पहले तक चीनी की चाशनी के लिए मशहूर था, आज नफरत, हिंसा, अमनावीयता की मंद-मंद आग से तप रहा है। भले ही दंगों की लपटें समाप्त दिखाई दे रही हैं लेकिन उसके दूरगामी दुष्परिणाम समाज शिद्दत से महसूस कर रहा है। विडंबना है कि अविश्वास, गुरबत और सामाजिकता के छिन्न-भिन्न होने का जो सिलसिला सितंबर-2013 में शुरू हुआ था वह दिनों-दिन गहराता जा रहा है। सरकार व समाज दोनों की राहत की कोशिशें कहीं पर घाव को गहरा कर रहे हैं। मुजफ्फरनगर और उसके करीबी पांच जिलों में आंचलिक गांव तक फैली दंगे के दावानल को आजादी के बाद उ.प्र. का सबसे बड़ा दंगा कहा गया जिसमें कोई एक लाख लोग घर-गांव से पलायन करने को मजबूर हुए। अब सामने दिख रहा है कि ना तो इसे अपराध के तौर पर और ना ही सामाजिक समस्या के रूप में आकलिन व निवारण के प्रयास करने में सरकारी मशीनरी विफल रही है। आज भी दंगा पीड़ित लोग तिल-दर-तिल मर रहे हैं और उनके सामने भविश्य के नाम पर एक श्याह अंतहीन गली दिख रही है। हर रोज किसी झुग्गी से कोई लाश उठ रही है- असल में यह जनाजा मौसम की मार, सरकार की बेरूखी, लाचारी, गुरबत और खौफ के कंधों पर कब्रिस्तान तक जाता है। भले ही कोई इसे सियासत कहे, लेकिन राहुल गांधी ने उस इलाके में जा कर उन भुला चुके लोगों की ओर देश का ध्यान आकृष्ट करने का प्रयास तो किया है।
यह सभी जानते हैं कि देश की कुल गन्ने की फसल व चीनी उत्पादन का बड़ा हिस्सा पश्चिमी उ.प्र.के सात जिलों से आता है। इस बार किसान अपना गन्ना लेकर तैयार था तो चीनी मिल दाम को लेकर मनमानी पर उतारू थीं। भारतीय किसान यूनियन ने जब इसका विरोध करने के मोर्चे निकाले तो उस पर दंगों का साया साफ दिखा- प्रदर्शन बेहद फीके रहे क्योंकि ऐसे धरने-जुलूसों में तरन्नुम में नारे लगाने वाले, नए-नए जुमले गढ़ने वाले मुसलमान उसमें शामिल ही नहीं थे। कुंद धार आंदोलन होने का ही परिणाम रहा कि किसान को मन मसोस कर मिल मालिक की मर्जी के मुताबिक गन्ना देना पड़ा। दंगे के दौरान जिस तरह कई जगह खड़ी फसलों को आग के हवाले किया गया, जिस तरह दूसरे समुदाय के लोगों के खेतों पर कतिपय लोगों ने अपने खूंटे गाड़ दिए, इसके दुष्परिणाम अगले साल देखने को मिलेंगे- यह बात किसान भी समझ गए हैं।
गांव-गांव में जाटों के खेतों पर मजदूरी करने वाले मुसलमान भूमिहीनों ने कभी यह समझा ही नही था कि वह किसी गैर के यहां मजदूरी कर रहा है, लेकिन अब ना तो वह भरोसा रहा और ना ही वह मेहनतकश हाथ वहां बचे हैं।
शामली जिले के मलकपुर, सुनेती गांवों के बाहर खुले मैदान हों या फिर मुजफ्फरनगर के लोई, जोउला या कबाड़ के बाहर खेत- दूर से तो वहां रंगबिरंगी पन्नी व चादरों के कैंप किसी मेला-मिलाद की तरह दिखते हैं, लेकिन वहां हर रंगीन चादर के नीचे हजारों दर्द पल रहे हैं किसी का गांव में दो मंजिला मकान व लकड़ी का कारखाना था, आज वह कैंप के बाह कचरे की तरह पड़े पुराने कपड़ों में से अपने नाप की कमीज तलाश रहा है। बीते दो महीनों में कोई सौ से ज्यादा बच्चियों का निकाह जायद उम्र से पहले करने के पीछे भी उन बच्चियों की रक्षा कैंप में ना होने की त्रासदी है।
शामली के मलकपुर कैंप में कोई 1500 परिवार हैं और यहां दीवाली के बाद से 26 मौत हो चुकी हैं मरने वाले बहुत से छोटे बच्चे हैं। मुजफ्फरनरगर के कैंपों में चालीस से ज्यादा बच्चे काल के गाल में समा चुके हैं। दिन में तीखी धूप खुले आसमान के नीचे बने अस्थाई कैंपों में कहर बरपाती हैं रात में यहां ठंड व ओस से लोग गीले हो जाते हैं। कैंपों के पास चल रहे सरकारी अस्पताल बंद हो चुके हैं, वैसे भी वे अस्पताल में महज प्राथमिक उपचार की दवाएं ही दे रहे थे। नवंबर के पहले सप्ताह से सरकारी राशन बंटना बंद होना भी भुखमरी का कारण बन गया है। कुछ मुस्लिम संगठन यहां इमदाद बांट रहे हैं, लेकिन बगैर तेल-मसाले-जलावन के उनका आटा, चावल या दाल कोई काम का नहीं है।
सबसे बुरी हालत देश का भविष्य कहे जाने वाले बच्चों की है। इन कैंपे के बाहर कई सौ ऐसे किशोर मिल जाएंगे जो अभी तक कालेज या हायर सैकेंडरी स्कूलों में जाते थे। दंगे में उनकी किताबों- कापियों, पुराने सनद-दस्तावेजों सभी को राख में बदल दिया है। अब वे ना तो किसी नई जगह दाखिला ले सकते हैं और ना ही अपने पुराने स्कूल-कालेजों में जा सकते हैं। जब मां-बाप एक-एक निवाले की जुगाड़ में सारा दिन बिताते हैं तो उन तीन हजार से ज्यादा स्कूली बच्चों की परवाह कैसे की जा सकती है जिनके लिए कैंपों में शिक्षा की कोई व्यवस्था नहीं हे। जरा सोचें कि अभी भी खौफ के साये में जी रहे इन चालीस हजार से ज्यादा लोगों के कई हजार बच्चे बगैर माकूल शिक्षा या प्रशिक्षण के, इस तरह के शोषण-भयावह और अन्याय के महौल से बड़े हो कर किस तरह मुल्क के विकास में योगदान दे पाएंगे।
कहने को राज्य सरकार ने राहत शिविरों से घर ना लौट रहे लोगों को पांच-पांच लाख रूपए दे कर बसाने की योजना बनाई है और इसके तहत 1800 लोगों को मुआवजा भी दिया जा रहा है। इसके एवज में 900 लोग हलफनामा दे चुके हैं कि वे कभी भी अपने घर-गांव नहीं लौटेंगे।
जरा गौर करें कि यह कितनी असहनीय व सरकार की असहाय होने की योजना है। सरकार में बैठे लोग गांव-गांव में दोनों फिरकों के बीच विश्वास बहाली नहीं कर पा रहे हैं या फिर एक साजिश के तहत उन विस्थापित लोगों के घर-खेतों पर कतिपय लोगों को कब्जा करने की छूट दी जा रही है। संयुक्त परिवार में रह रहे लोगों को मुआवजे के लिए आपस में झगड़ा होना, इतने कम पैसे में नए सिरे से जीवन शुरू कठिन होना लाजिमी है। सनद रहे कि इलाके के गांवों में मुसलमानों की घर वापिसी पर मुकदमे वापिस लेने, साथ में हुक्के के लिए नहीं बैठने, मनमर्जी दर पर मजदूरी करे जैसी शर्तें थोपी जा रही हैं, इसकी जानकारी पुलिस को भी है, लेकिन विग्रह की व्यापकता और उनका प्रशिक्षण इस तरह का ना होने से हालात जस के तस बने हुए हैं।
जिन दंगों ने डेढ़ सौ से ज्यादा जान लीं, जिसमें कई करोड़ की संपत्ति नष्ट हुई, जिसके कारण एक लाख से ज्यादा लोग पलायन करने पर मजबूर हुए, सबसे बड़ी बात जिस दंगे ने आपसी विश्वास और भाईचारे के भव्य महल को नेस्तनाबूद कर दिया- ऐसे गंभीर अपराध पर प्रशासन की कार्यवाही इतनी लचर थी कि इसके सभी आरोपी सहजता से जेल से बाहर आ गए और मुजरिम नहीं, हीरो के रूप् में बाहर आए।
पश्चिमी उ.प्र के हालातों को सामान्य बनाने के लिए किसी सरकारी दस्तावेज या कानून से कहीं ज्यादा मानवीय और दूरगामी योजना की जरूरत है। इलाके के राहत शिविरों में कई मुस्लिम तंजीमें इमदाद के काम कर रही है। जाहिर है कि लोग उनसे ही प्रभावित होंगे और इसके असर कहीं ना कही दुखदाई भी हो सकते हैं।
पंकज चतुर्वेदी, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व स्तंभकार हैं।