आज के ही दिन ठीक 72 साल 22 जून 1941 की भोर होते ही नाज़ी जर्मनी ने सोवियत संघ पर हमला कर दिया था। इस हमले के बाद युद्ध शुरू हुआ था। आज रूस में स्मृति और शोक दिवस मनाया जा रहा है।

जर्मनी के विमानों ने सोवियत संघ की सीमा से 250-300 किलोमीटर तक अन्दर जाकर हवाई अड्डों, रेलवे स्टेशनों, नौसैनिक अड्डों, सैन्य छावनियों और कई शहरों पर बड़े पैमाने पर हमले किये थे। सोवियत संघ पर किये गये इस हमले में इटली, हंगरी, फ़िनलैंड और रोमानिया भी शामिल थे।

द्वितीय विश्व युद्ध में सोवियत संघ के लोगों को सबसे बड़ा जानी नुकसान उठाना पड़ा था। रूस के रक्षा मंत्रालय के अनुसार, महान देशभक्तिपूर्ण युद्ध में दो करोड़ 70 लाख सोवियत लोगों ने अपनी जानों की आहुति दी थी।

रूस के निवासी आज के दिन अपनी जन्मभूमि के रक्षकों को श्रद्धाञ्जलि भेंट करते हैं।

ङमले के वक्त हिटलर ने लिखा था- "रूस की शक्ति का पूर्ण विनाश, इसके पूरे क्षेत्र पर नियन्त्रण और इसकी जनता को अपने अधीन करना- मेरा लक्ष्य है।" लेकिन पूरे यूरोप पर कब्ज़ा करने वाले हिटलर का यह सपना कभी साकार नहीं हो सका। उसने सोवियत संघ पर अचानक हमला तो कर दिया लेकिन उसे यह उम्मीद नहीं थी सोवियत लोग इस हमले का जी-जान से और पूरी बहादुरी से प्रतिरोध करेंगे। सम्भवतः हिटलर अगर सोवियत संघ से पंगा न लेता तो उसका डंका सारी दुनिया में बज रहा होता।

हिटलर ने 55 लाख सैनिक, चार हज़ार से अधिक टैंक, पाँच हज़ार विमान और लगभग 50 हज़ार बन्दूकें और मोर्टार तोपें इस युद्ध में झोंकी थीं। भारी गोलाबारी और बमबारी की गयी थी जिससे लाल सेना का बहुत नुकसान हुआ था। युद्ध के शुरुआती दिनों में लाल सेना के ईंधन, गोला बारूद और सैन्य उपकरणों का बहुत बड़ा हिस्सा नष्ट कर दिया गया था। ज़मीन पर खड़े 1200 सोवियत विमानों को नष्ट कर दिया गया था।

हिटलर ने कहा था- "जितनी जल्दी हम रूस को ख़त्म कर दें, हमारे लिये उतना ही बेहतर होगा। हमारा यह युद्ध तब ही सार्थक हो सकता है अगर हम एक तेज़ झटके से इस पूरे देश को तबाह कर दें।" लेकिन सोवियत जनता ने स्टालिन के नेतृत्व में अभूतपूर्व वीरता से इस आक्रमण का सामना किया।

22 जून, 1941 और 9 मई, 1945 – ये दो ऐसी तिथियाँ हैं जो रूसी लोगों की कई पीढ़ियों की स्मृति में सदा के लिए बस गयी हैं। इन दो तिथियों के बीच महान देशभक्तिपूर्ण युद्ध के 1418 दिनों और रातों का एक लम्बा अरसा है जिसके दौरान दो करोड़ 70 लाख सोवियत सैनिकों और इस देश के निर्दोष नागरिकों को अपनी जानों की आहुति देनी पड़ी थी। उस युद्ध में 1710 सोवियत शहरों, एक लाख गाँवों, दसियों हज़ार औद्योगिक उद्यमों को तबाह कर दिया गया था। सोवियत जनता को उस युद्ध में महान जीत हासिल करने के लिये भारी क़ीमत भी चुकानी पड़ी थी। लेकिन उस काली शक्ति का भी विनाश कर दिया गया था जो पूरी दुनिया को अपनी चपेट में लाना चाहती थी।

इनपुट-रेडियो रूस से