रोहित, हम बुढ़ाते एक्टविस्ट हैं तुम्हारी मौत के जिम्मेदार!
रोहित, हम बुढ़ाते एक्टविस्ट हैं तुम्हारी मौत के जिम्मेदार!
एक बुढ़ाता एक्टविस्ट होने के नाते तुम्हारे जैसे उभरते एक्टविस्ट की मौत की जिम्मेदारी से अपने आपको अलग नहीं कर पा रहा हूँ
प्रिय रोहित,
तुम्हारे पत्र के गूण अर्थों को मैं अभी तक पूरी तरह समझ नहीं पाया; लेकिन, हमारा सरकारी तंत्र समझ गया और तुम्हारी मौत की जिम्मेदारी से अपना पल्ला पहले ही झाड़ लिया। हालाँकि, हमारे देश के प्रधानमंत्री तक तुम्हारी मौत से दुखी है। ऐसे में, कई सारे समूह तुम्हारी मौत की जिम्मेदारी तय कर दोषियों के खिलाफ सज़ा की मांग कर रहे है। यह तंत्र तुम्हारी मौत की सजा कभी तय करेगा; मालूम नहीं। लेकिन, मैं अपनी सजा तय करना चाहता हूँ। क्योंकि, तुम्हारे पत्र के हर एक शब्द में मुझे अपना नाम नजर आ रहा है। ...और, एक बुढ़ाता एक्टविस्ट होने के नाते तुम्हारे जैसे उभरते एक्टविस्ट की मौत की जिम्मेदारी से अपने आपको अलग नहीं कर पा रहा हूँ। इस भूल की कोई माफी नहीं हो सकती – और होती, तो भी मैं नहीं चाहता। इसलिए, किसी को मिले चाहे न मिले लेकिन तुम्हारी मौत क सज़ा मुझ जैसे हर उस बुढ़ाते एक्टविस्ट को मिलना चाहिए; जिन्होंने, तुम्हारे जैसे होनहार युवा एक्टविस्ट को निराश किया।
अपने पत्र की उन आखिरी दो लाईनें को आखिरी समय में काटकर भले ही तुमने हमें बचाने का बढ़प्पन दिखाया है; लेकिन वो अनकही दो लाईनें बहुत कुछ कह गईं। एक एक्टविस्ट होने के नाते, मैं और मेरी पत्नी तुम्हारा पत्र पढ़ने के बाद से बैचैन हैं, क्योंकि, इतिहास दोहराया गया है। एक बार फिर, हम अपने-अपने मुद्दे लेकर बैठे रह गए; तुम्हारे जैसे युवा तक नहीं पहुँच पाए। ... और, तुम अपनी शहादत से तूफ़ान मचाकर निकल गए। जैसे, उस समय सोए हुए देश को जगाने युवा भगत सिंह ने शहादत दी थी – और बूढ़े रह गए थे। फर्क इतना था, उन्हें फांसी देने वाले हाथ विदेशी थे! और तुम्हें फांसी देने वाले हाथ देशी! अगर युवा ताकत इसी तरह शहीद होती रहेंगी और; बूढ़े देश चलाते रहेंगे, तो जिस मौलिकता और प्यार को तुम ढूंढ रहे थे; वो कहाँ से आएगा? हमारी जात; धर्म; पहचान और वोट की मानताएँ कैसे बदलेंगी? जवान जब चला जाएगा, तो बूढ़े तो फिर कब्र से पुरानी मान्यताओं के भूत इसी तरह एक पीढ़ी-दर-पीढ़ी देते रहेंगे।
एक समय था, जब यूनिवर्सिटी में तुम्हारे जैसे एक्टविस्ट युवाओं की बैचेनी और उर्जा को एक वैचारिक आधार देना जन आंदोलनों के सीनियर एक्टविस्टों की जवाबदारी होती थी; इससे आंदोलनों को एक नई उर्जा मिलती थी। यही उसके सतत् जारी रहने का जरिया था। तुम्हारी मौत में यह साफ रेखांकित है कि यह प्रक्रिया अब शिथिल हो गई है। अब विश्वविद्यालय कैरिएर का अड्डा बनकर गए हैं- और अब वैचारिक समूह भी इसमें सहारा दे अपनी मेम्बरी करते हैं। ...और, बस-बस अपनी अपनी स्थापित पार्टियों की लीक पर चलने के लिए सैनिक ढूंढते हैं।
हालांकि, तुम्हारे पत्र से मुख्य-धारा का - छठवें के बाद सातवें वेतन आयोग का इंतजार करता थका चुका – यूनिवर्सिटियों में बसने वाला बुद्धिजीवी समाज भी बैचैन है! क्योंकि तुमने, तमिल, तेलगु की बजाए उनकी अपनी जबान - ऐसी तड़ाकेदार अंग्रेजी - में जो पत्र लिख दिया। इससे यह स्थापित हो सका कि तुम वाकई एक स्कॉलर थे; जो दलित भी था। जिस समाज में आधे लोग पढ़ना-लिखना भी नहीं जानते, उस समाज से आने के बावजूद, तुमने इस सभ्य समाज को उसी के हथियार से संबोधित किया है। अगर तुम सिर्फ कुशल होते और; पढ़े-लिखे ‘होनहार’ ना होते? सिर्फ दलित, छात्र, किसान या मजदूर होते? तो बहस क्या, कोई बात करने की जेहमत भी नहीं करता। तुम्हारी माँ, तुम्हारे मौत के मुआवजे के लिए दर-दर की ठोकरे खाती रहती! जैसे, लाखों किसानों और मजदूरों की शहादत पर पिछले दस सालों से इस देश में हो रहा है।
हालाँकि, यह लिखते दुख: हो रहा है कि, जैसा तुम कह गए - ‘हमारी मौलिकताएँ कृत्रिम’ हैं। वैसे ही, बुद्धिजीवियों का यह तूफ़ान भी कृत्रिम है। क्योंकि, आजकल क्रांति सड़कों पर नहीं, बल्कि सोशल मीडिया और टी वी. चैनल स्टूडियो की ‘कृत्रिम-दुनिया’ में होती है, जहाँ, उसके प्रगतिशील एंकर और बुद्धिजीवी उसमें अपनी लच्छेदार भाषा का तड़का लगाते हैं। ... और अब यूनिवर्सिटी की बहस भी बंद वातानाकूलित कमरे में किसी बड़ी फंडिंग से होती है – जहाँ कोई कार्यकर्ता नहीं; हर कोई खालिस ‘पार्टिसिपेंट’ या ‘रिसोर्स –पर्सन’ होता है। यूनिवर्सिटी की इस कृत्रिम दुनिया और उसकी बहस में दलित; आदिवासी; किसान और; मजदूर की कोई वास्तविक भागीदारी नहीं होती। ज्यादा से ज्यादा, वो या तो टारगेट समूह के प्रतिनिधि होते हैं या किसी कैटरिंग या सफाई एजेंसी के दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी के रूप में वहां भोजन; सफाई अदि व्यवस्था में अपनी जवाबदारी निभा रहे होते हैं। यह बुद्धिजीवी प्रोफेसर तुम्हारे भी तुम जैसे युवा एक्टविस्ट को प्रेरणा नहीं दे पाए; तुम्हारी निराशा देख नहीं पाए? इसलिए जवाबदारी उनकी भी बनती है।
....और, मीडिया में बुद्धिजीवी प्रगतिशील, एंकरों और अख़बारों के संपादकों की भी जवाबदारी बनती है, जो अपनी तमाम सहानुभूतियों के बावजूद दलितों-आदिवासियों, किसानों और मजदूरों से जुड़ी खबरों को ‘निगेटिव न्यूज़’ कहलाने से नहीं रोक पाए। और जिनके लिए देश के आदिवासी इलाके में जारी सरकारी हिंसा एक कानून व्यवस्था का सवाल भर बनकर रह गई। इसलिए, यहाँ सवाल हर उस दबे-कुचले वर्ग का है; जिसका वजूद ही सवाल बन गया है: जिसकी आत्मा व्यवस्था की चोट का दर्द सहते– सहते अपने शरीर से अलग हो गई और; जो सिर्फ उस दर्द को सहने के लिए जिन्दा है। जिसके दर्द को शब्द देने का काम तुमने किया है।
अब यहाँ सवाल यह है कि क्यों तुम्हारे जैसे युवा उर्जा का उपयोग इस परीस्थिति के बदलाव में नहीं हो पाया?
असल में, किसी देश में उस काल और समय में हुई देश-व्यापी राजनैतिक-सामाजिक उथल-पुथल ही उस समय के नौजवानों को बुनियादी-बदलाव के काम में खीचती है; और एक वैचारिक आधार भी देती है। आजादी के आन्दोलन में इसी कारण इतने लाखों युवा कूदे – चाहे वो अहिंसक आंदोलन हो; या हिंसक। आजादी आंदोलन के दौरान पैदा हुई इस उर्जा ने 60-70 के दशक तक युवाओं को प्रेरणा दी। परिणाम स्वरूप, जहाँ कुछ आंबेडकरवादी समूह उभरे वहीं साम्यवादी और समाजवादी राजनीति में उफान के साथ, तेलंगाना और नक्सली आन्दोलन भी देश में उभरा। इसके बाद इमरजेंसी के दौरान जो उर्जा पैदा हुई उसने 90 के दशक तक हमारे जैसे अनेक युवा को अपना सब-कुछ छोड़ बुनियादी बदलाव के आन्दोलन में कूदने की प्रेरणा दी।
हम अपने गिरेबान में झांकें और अपनी जवाबदारी तय करे कि; हम बुढ़ाते एक्टविस्ट एक ऐसा देशव्यापी आंदोलन क्यों नहीं खड़ा पाए। अगर वाकई में रोहित की शहादत से हम बैचैन है; तो हमारे जैसे बुढ़ाते एक्टिविस्टो को तुम्हारी मौत की जवाबदारी लेकर अपने-अपने मुद्ददे के संकीर्णता से बाहर आना होगा। साझा प्रयासों के जरिए एक एक देशव्यापी आंदोलन की दिशा में कदम बढ़ाना होगा। तब ही तुम्हारे जैसे सैंकड़ों युवाओं के दर्द और उर्जा को सहेज बदलाव के नए दौर की तैयार होगी, जिससे और कोई रोहित को इस तरह शहादत ना देना पढ़े। और अगर ऐसी कोई परीस्थिति बन भी जाए; तो आधी से ज्यादा ज़िन्दगी देख चुके हम जैसे कार्यकर्ता उसके लिए तैयार रहें। यही रोहित की शहादत को सच्ची सलामी होगी।
पुनश्च: तुम तक पहले ना पहुँचने का दुख: हमेशा रहेगा।
एक नाकाम बुढ़ाता एक्टिविस्ट
अनुराग मोदी
सदस्य राष्ट्रीय कार्यकारणी, समाजवादी जन परिषद, कोठी बाज़ार, बैतूल, म. प्र.


