लोकतंत्र की चुनौतियाँ
लोकतंत्र की चुनौतियाँ
डा0 मोहम्मद आरिफ़
आज पूरा विश्व ंिहसा और संघर्श का सामना कर रहा है। वास्तव में इतिहास में ऐसी कोई अवधि नहीं मिलती जिसने संघर्ष न देखा हो। लेकिन हर युग में ऐसे पैग़म्बर, संत, धर्मवेत्ता, सूफी, विचारक तथा कवि एवं लेखक भी हुए हैं, जिन्होंने सद्भाव, शांति एवं मानवीय एकता पर विशेष बल दिया। सच कहा जाए तो, कुछ सशक्त लोगों द्वारा ही हिंसा एवं संघर्ष को अपने निहित स्वार्थ हेतु अंजाम दिया जाता है। ये स्वार्थ भी कई श्रेणियों मे बाँटे जा सकते हैं जैसे-धार्मिक, आर्थिक, राजनैतिक अथवा सामाजिक। एक जि़म्मेदार नागरिक होने के नाते हमें इन स्वार्थों को पहचानने में सक्षम होना चाहिए, जिन्हें न्याय संगत बताये जाने का कुटिल प्रयास किया जा रहा है। हमें इन चुनौतियों के प्रति सचेत रहना पड़ेगा वरना इनका समाधान निकालना आसान नहीं होगा।
इस समय देश की एकता को सबसे गम्भीर चुनौती विभिन्न धर्मावलम्बियों के बीच बढ़ती असहिष्णुता से है। इस आहिष्णुता को निहित स्वार्थी तत्व दिन-रात हवा देते रहते हैं। इसके फलस्वरुप आतंकवादियों समेत विघटनकारी ताक़तें मज़बूत होती जा रही हैं। एक तरफ़ जहाँ आतंकवाद का सम्बन्ध मुसलमानों से जोड़ा जाता है वहीं इसकी प्रतिक्रिया स्वरुप कुछ हिन्दुत्ववादी सगंठन भी ंिहंसक गतिविधियों में लिप्त पाये जा रहे हैं। आजा़दी के इतने वर्षों बाद आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में छुआछूत का कलंक व्याप्त है। इस प्रवृत्ति से पीडि़त अतिवंचितो का एक वर्ग हिंसा का सहारा लेता है। विश्व बैंक के अनुसार भारत में 42ः जनता आज भी ग़रीबी से पीडि़त है। भाषायी राज्यों के गठन के बावजूद भाषा एवं क्षेत्रीयता के नाम पर विवाद गहराते जा रहे हैं। सबसे अधिक चिन्ता की बात है कि सरकार, राजनैतिक पर्टियाँ और राजनेताओं में से कोई भी राष्ट्रीय एकता को मज़बूत करने के प्रति प्रतिबद्धता नही दिखाता है। यहाँ तक कि कुछ छात्र संगठनों द्वारा छात्र/छात्राओं से कहा जाता है कि वे मुस्लिम व इसाई छात्रों से किसी भी प्रकार का सम्बन्ध न रखें। युवाओं पर ही देश का भविष्य निर्भर करता है यदि उन्हीं को साम्प्रदायिकता का ग्रहण लग गया तो इसके परिणाम भयावह होंगे।
भारत विभिन्न धर्मों का देश है। देश की एकता उस समय तक सुदृढ़ नही होगी जब तक विभिन्न धर्मो को मानने वाले सह-अस्तित्व की भावना के साथ जीना नही सीख लेते। यह बात प्रायः कही जाती है कि सभी धर्मों का सन्देश एक है परन्तु इस सत्य से हमें सर्वप्रथम बच्चों कोे अवगत कराना चाहिए। यह तभी सम्भव है जब हम शिक्षण संस्थाओं, विशेषकर स्कूलों के पाठ्यक्रम में सर्वधर्म सम्भाव को शामिल हरें। छुआछूत के अभिशाप को मिटाने के लिये हमें सामन्तवादी अवशेषों को दफन करना होगा। इसके लिये धर्म शास्त्रों की सही विवेचना आवश्यक है। महिलाओं एवं आदिवासियों की स्थिति में सुधार और देश की एकता के बीच सीधा सम्बन्ध है। इनके सम्मान बहाली के बग़ैर गैर साम्प्रदायिकता एवं धर्म- निरपेक्ष लोकतांत्रिक व्यवस्था की कल्पना बेमानी है।
हमें उन तत्वों को एक होकर मज़बूती से शिकस्त देना चाहिये जो हमे धर्म, सम्प्रदाय और जाति के नाम पर बाँटने का प्रयास करते हैं। साम्प्रदायिक प्रचार के अन्य माध्यमों के साथ, साम्प्रदायिक साहित्य को भी प्रतिबन्धित कर दिया जाना चाहिये। देश की एकता को मज़बूत करना है तो मीडिया की भूमिका और चुनाव प्रणाली में बुनियादी सुधार करना होगा। राज्य एवं उसकी मशीनरी की भूमिका का भी समय-समय पर मूल्यांकन होना चाहिये। ऐसी राजनैतिक पार्टियों पर भी अंकुश लगना चाहिए जो सत्ता का दुरुप्रयोग आपसी वैमनस्य को बढ़ाने में करती है तथा लोगों को धर्म व जाति के नाम पर वोट बैंक बना लेती है। चुनाव प्रणाली में इस तरह का सुधार किया जाना चाहिए जिससे इन ताक़तों को प्रजातांत्रिक प्रक्रियाओं का लाभ न मिल सके। हमे उन उपायों कांे खोजने का प्रयास करना है जिससे राष्ट्रीय एकता एवं धर्म निरपेक्ष/ लोकतांत्रिक मूल्यों की नींव को और मज़बूत किया जा सके। यह तभी सम्भव हो सकेगा जब हम सभी मिलकर बाँटने वाली ताक़तों को शिकस्त दें।
डा0 मोहम्मद आरिफ़
(चेयरमेन)
सेन्टर फार हरमोनी एण्ड पीस


