वक्त सबको जबाव देता है, चाहे वह नरेंद्र हो या नीतीश....ज़ीरो टॉलरेंस तो एक पाखण्ड और बकबास है
वक्त सबको जबाव देता है, चाहे वह नरेंद्र हो या नीतीश....ज़ीरो टॉलरेंस तो एक पाखण्ड और बकबास है
नाम लेंगें गांधी और लोहिया का और काम करेंगे गोडसे का।
भाजपा नीतीश का पुश्तैनी घर नहीं है। भाजपा के साथ बनने वाली नई सरकार सरोगेटेड-सरकार ही होगी। भाजपा के लिए नीतीश समाजवादी मुसाफिर की ही तरह हैं। जनेऊ तोड़ने और जातिवाद मिटाने का शंखनाद करने वाले जेपी और लोहिया की विरासत का दावा ठोंकने वाले नीतीश का चरित्र हमें कन्फ्यूज्ड कर रहा है।
नीतीश कल भी भाजपा के साथ हुए थे और आज भी साथ हुए हैं। आज लालू ठगे गए और इसी ठगी का भाजपा भी शिकार पहले हो चुकी है। बावजूद इसके भाजपा का नीतीश पर गहरा भरोसा बरकरार है। भाजपा ने कभी धैर्य नहीं खोया। परदेश गए पिया की वापसी की आस संजोयी रही। पिया घर आया ओ रामजी। लोभी व्यक्ति को बहुत ही धैर्य होता है जैसे बगुला। भाजपा को बकोध्यान का फलाफल मिल गया है।
नीतीश का यह इस्तीफा-पुराण नीतीश को क्या दे सकता है?
मुख्यमंत्री से मुख्यमंत्री की यात्रा में नीतीश की राजनीति कहाँ पहुंचेगी? नरेंद्र मोदी की जगह तो मिलेगी नहीं। बहुत होगा तो उप प्रधानमंत्री होंगे, पर नीतीश के इस ‘उप’ होने से विपक्षी एकता का संहार है।
नीतीश के ऊपर दावं लगाकर भाजपा और क्या-क्या गुल खिलाएगी इसका अभी आकलन कर लेना जल्दबाजी होगा।
विपक्ष मुक्त भारत निर्माण के नीतीश नए नेता हैं। जार्ज की भूमिका में नीतीश आ गए।
ईमानदार नीतीश की जरूरत अभी किसको ज्यादा है? ज़ीरो टॉलरेंस तो एक पाखण्ड और बकबास है। नीतीश को यह तो पहले से पता था लालू एन्ड कंपनी के बारे में। फिर महागठबंधन में गए ही क्यों थे?
ईमानदार नीतीश की जरूरत अभी किनको है? नीतीश की ईमानदारी का भजन कौन ज्यादा गा रहा है? अशान्त और अराजक होते भारत से भय आज किनको है? निश्चित रूप से देश के दलित और मुसलमान नीतीश को मिले इस सवर्ण सर्टिफिकेट से खुश नही है। बिहार में सन्नाटा है। नेता सभी सस्पेंशन और सस्पेक्टेड मोड में हैं।
नीतीश लालू के कुएं से निकलकर संघ की खाई में गिर गए हैं। उम्मीदें डूब गई हैं।
इस्तीफा लेने का दम नहीं तो फिर देने का दम क्या दिखाना? पूरे भ्रष्ट परिवार कर देते पर साथ नही छोड़ना था। यह भारतीय संसदीय जनतंत्र के व्यापक भविष्य का मामला था जिसे नीतीश ने रौंदकर रख दिया।
लालू भ्रष्ट हो सकते हैं और बिहार की लूट को बिल्कुल ही सहन नहीं किया जा सकता है। नीतीश ने इस्तीफा दिया, यह स्वागत योग्य कदम है। पर भाजपा के साथ सरकार बनाने की बात नीतीश को अविश्वसनीय बनाती है। नीतीश भाजपा में भी शामिल हो जाएं तो भी अच्छा है। यह कहने में क्या दिक्कत है कि उन्हें नरेंद्र मोदी का नेतृत्व पसंद है? भाजपा के सिद्धांत में उन्हें बहुत भरोसा है। पर नाम लेंगें गांधी और लोहिया का और काम करेंगे गोडसे का। लिंचिंग पर ज़ीरो टॉलरेंस क्यों नहीं? बेमुला और सहारनपुर के सवाल पर नीतीश का शून्य-सहन कहाँ है? अगर यह नही है तो नीतीश की ईमानदारी दो कौड़ी की है।
सामाजिक न्याय कहाँ है? अन्यायी पार्टी के साथ मिलकर कैसा विकास होगा? महागठबंधन को नीतीश ने क्यों बचाने का प्रयास किया? उसकी क्या जरूरत थी उन्हें? अगर महागठबंधन नही बच रहा था तो नीतीश को जनता के पास जाना चाहिए ना कि भारतीय जनता पार्टी के पास। क्या बिहार भाजपा के पास जाने भर से बच जाएगा? क्या भाजपा से देश बच रहा है जो बिहार बच जाएगा?
चुनावों के इस देश में एक और चुनाव हो ही जाता तो क्या होता? कम से कम इनके ज़ीरो टॉलरेंस की परीक्षा भी तो हो जाती? पर ऐसा नही हुआ। अगर वैसा होता तो बिहार की जनता नीतीश साथ खड़ी हो सकती थी। नीतीश को ईमानदार पसंद बिहार पर कोई भरोसा नही था। जाने अनजाने नीतीश ने बिहार का अपमान कर दिया।
भाजपा में भी असंख्य तेजस्वी हैं फिर वहां ज़ीरो- टॉलरेंस का क्या मतलब है?
भाजपा की वसुंधरा के साथ योगी और शिव सभी शव बने हुए हैं। भाजपा की शराब भट्टियां क्या ध्वस्त हो पाएंगी?
नीतीश का यह फैसला अंतर्विरोधों से भरा है। नीतीश तेजस्वी को जनता की अदालत में जाकर अपनी सफाई देने का उपदेश दे रहे थे पर नीतीश की भी नैतिकता थी जनता से पूछने का कि वे यह फैसला ले या ना ले।
जनता सब जानती हैं। इस्तीफा देना तो नीतीश की एक जीत हो सकती है पर राजग का हिस्सा होना नीतीश की बड़ी हार है।
नीतीश के भीतर जेपी और वीपी दोनों की आत्मा मौजूद थी। संभावनाएं भी थी। पर इस फैसले से इनकी जननायकी खत्म होगी। वह खेल अब खत्म हो गया। लोकनायक होते-होते गटनायक बनकर रह गए।
इस खेल से यह साबित किया जा सकेगा कि इस देश में गठबंधन का कोई भविष्य नही है। संघ सरकार ही इस देश का अब शेष भविष्य है जिस प्रमेय के परिणाम हो गए नीतीश।
पर वक्त सबको जबाव देता है। चाहे वह नरेंद्र हो या नीतीश। वक्त की कोख से यूँ ही संभावनाएं जन्म लेती रहती हैं। और आगे भी लेगी। समाजवादी नीतीश का यह वानप्रस्थ है। जेपी भी अंतिम क्षण में रामायण के शरण में आ गए थे और इस स्थिति में नीतीश का ‘रामशरण’ हो जाना चकित नही करता। बस शुभ हो बिहार के लिए।
वरिष्ठ पत्रकार बाबा विजयेंद्र स्वराज खबर के संपादक हैं।


