वनाधिकार कानून के अनुपालन में उत्तर प्रदेश वन विभाग के लापरवाही बरतने का मामला...
राजनीतिक दल एआईपीएफ से सम्बद्ध गैर-सरकारी संगठन आदिवासी-वनवासी महासभा ने दाखिल की है जनहित याचिका...
लखनऊ। वनाधिकार कानून के अनुपालन में उत्तर प्रदेश वन विभाग द्वारा बरती जा रही लापरवाही को लेकर दाखिल एक जनहित याचिका को स्वीकार करते हुये इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार के मुख्य सचिव और केन्द्र सरकार को समन जारी कर जवाब माँगा है। उच्च न्यायालय में यह याचिका राजनीतिक पार्टी एआईपीएफ से सम्बद्ध गैर-सरकारी संगठन आदिवासी-वनवासी महासभा ने दाखिल की थी।

एआईपीएफ के संयोजक अखिलेन्द्र प्रताप सिंह ने यह जानकारी दी। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा वनाधिकार कानून को नाकाम करने की कोशिश की गयी है। हमने सोमवार को इसके खिलाफ राज्यपाल बीएल जोशी को एक पत्र भेजा है। इसमें निवेदन किया गया है कि प्रदेश के संवैधानिक प्रमुख होने के नाते वे संसद द्वारा पारित वनाधिकार कानून के क्रियान्वयन के लिये राज्य सरकार को निर्देश दें। साथ वे राज्य के आदिवासियों एवम् परम्परागत वन निवासियों की रक्षा करें।

उन्होंने बताया कि पत्र में लिखा गया है, उ0 प्र0 में आदिवासी समुदाय के साथ आजादी के बाद से ही बड़ा अन्याय हुआ है। आदिवासियों की कोल समेत तमाम जातियाँ आज भी अनुसूचित जन जातियों की श्रेणी में शामिल नहीं की गयी हैं। 2003 में गोड़, खरवार जैसी जिन तेरह आदिवासी जातियों को अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में सम्मलित भी किया गया, उनके लिये माननीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद भी लोकसभा, विधानसभा और पंचायतों में आज तक सीटें आरक्षित नहीं की गयी है। परिणामस्वरूप आज भी सोनभद्र जनपद में आदिवासियों की ही आबादी वाली कई ग्रामसभाओं में पंचायत चुनाव में प्रतिनिधित्व ही नहीं हो सका है।

अखिलेन्द्र प्रताप सिंह ने बताया कि देश के आदिवासियों और परम्परागत वनाश्रित जातियों के वनभूमि पर अधिकार के लिये 2007 में संसद द्वारा वनाधिकार कानून को पारित किया गया। जिसका मूल उद्देश्य आदिवासियों और अन्य परम्परागत वनाश्रित जातियों के वन विभाग की जमीन पर पुश्तैनी कब्जे को उनके नाम दर्ज करने का था। इस कानून को उ0 प्र0 में बनी सपा और बसपा की सरकारों द्वारा नाकाम कर दिया गया। आदिवासियों और वनाश्रित जातियों के साथ अन्याय करते हुये ग्राम स्तर की वनाधिकार समिति द्वारा पास किये गये लाखों दावों को कानून में अधिकार न होते हुये भी उप खण्ड स्तरीय कमेटी द्वारा खारिज कर दिया गया। उन्होंने यह भी बताया कि जिन लोगों के दावे खारिज किये गये, उन्हें इस बाबत सूचित तक नहीं किया गया। इससे वह जिलास्तरीय समिति में अपील भी नहीं कर सकें। उनके दावों को कूड़े के ढेर में डाल दिया गया। धोरावल के पेढ़, भैसवार, विसुधरी जैसे कई स्थानों पर जब सूचना के अधिकार के तहत जानकारी माँगी गयी तब पता चला कि दावे खारिज हो गये। जिन कुछ लोगों को इस कानून के तहत जमीन दी भी गयी वह भी उनके द्वारा किये गये दावे से बेहद कम थी। ग्रामस्तर की वनाधिकार समिति की अनुशँसा में भी वन विभाग द्वारा धोखाधड़ी की गयी। इस कानून के तहत की गयी त्रिस्तरीय कमेटी व्यवस्था के लोकतान्त्रिक संचालन का भी अनुपालन दावों के निस्तारण के वक्त नहीं किया गया।

आइपीएफ नेता ने बताया कि आइपीएफ से जुड़ी आदिवासी-वनवासी महासभा ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की है। जनहित याचिका संख्या 27063/2013 को स्वीकार कर माननीय उच्च न्यायालय के न्यायाधीश एन0ए0 मोनिस और न्यायमूर्ति सुशील हरकौली की दो सदस्यीय खण्डपीठ ने केन्द्र सरकार और उ0 प्र0 सरकार के मुख्य सचिव को अपना जबाब दाखिल करने का आदेश दिया है।