वनाधिकार कानून के तहत विधिक प्रक्रिया का पालन करे सरकार
वनाधिकार कानून के तहत विधिक प्रक्रिया का पालन करे सरकार
आइपीएफ की जनहित याचिका पर उच्च न्यायालय ने दिया आदेश
आइपीएफ ने मुख्यमंत्री को भेजा पत्र
लखनऊ, 12 अगस्त 2013, आल इण्डि़या पीपुल्स फ्रंट (आइपीएफ) से सम्बद्ध आदिवासी वनवासी महासभा के द्वारा माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद में अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 (2007) के अनुपालन में उ0 प्र0 शासन व जिला प्रशासन द्वारा विधि के प्रतिकूल अपनाई गयी प्रक्रिया के विरूद्ध जनहित याचिका सं. 27063/2003 दाखिल की गयी थी। जिसमें दिनांक 05 अगस्त 2013 को निर्णय देते हुए माननीय मुख्य न्यायाधीश की खण्ड़पीठ ने इस अधिनियम व संशोधन अधिनियम 2012 के अनुसार जिले, तहसील व ग्राम सभाओं में वनभूमि पर प्रस्तुत दावों के सम्बन्ध में विधिक प्रक्रिया अपनाएं जाने और ग्रामसभाओं में दावा करने को कहा है, जिससे कि वनाधिकार समितियां नियमतः संस्तुति कर सकें और यदि कोई दावेदार असंतुष्ट है तो संशोधित नियम 2012 के प्रावधानों के तहत राहत के लिए अगली कार्रवाई कर सकता है।
इस सम्बंध में आज आइपीएफ के संगठन प्रभारी दिनकर कपूर ने मुख्यमंत्री को पत्र भेजकर उनसे निवेदन किया है कि उ0 प्र0 के समस्त जिलों में निरस्त किए गए वनाधिकार अधिनियम के तहत प्रस्तुत दावों पर व्यथित व्यक्ति और ग्रामसभाओं की वनाधिकार समितियों के दावों के सम्बंध में माननीय उच्च न्यायालय के आदेश के आलोक में वनाधिकार अधिनियम और संशोधन नियम 2012 के प्रावधानों के अनुसार विधिक प्रक्रिया के पालन के लिए उ0 प्र0 शासन द्वारा निर्देश जारी किए जाएं और शासन द्वारा भंग की गयी वनाधिकार समितियों को पुनर्बहाल किया जाए।
पत्र द्वारा मुख्यमंत्री को अवगत कराया गया कि प्रदेश के 13 जिलों में वनाधिकार कानून के तहत 92433 दावों में से 73416 दावों को निरस्त किया गया। उपरोक्त कानून की धारा 6 का उल्लंघन करते हुए निरस्त किये 73416 दावों में अधिकांश दावेदारों को सूचित नहीं किया गया और सुनवाई का युक्ति युक्त अवसर भी प्रदान नहीं किया गया। जिन दावों को स्वीकार किया गया उसमें वनाधिकार समितियों द्वारा संस्तुति किए गए रक्बे को भी बड़े पैमाने पर घटा दिया गया है। वनाधिकार समितियों के संस्तुति के बाबजूद इतने बड़े पैमाने पर अनुसूचित जनजाति और परम्परागत वन निवासियों के दावों का निरस्तीकरण अधिनियम की मूल भावना के विरूद्ध है। समस्त दावे ग्रामसभाओं की विधिक रूप से गठित वनाधिकार समितियों द्वारा स्वीकृत थे, जिन्हें जिला स्तरीय कमेटी व उपखण्ड स्तरीय कमेटी ने मनमाने ढंग से खारिज कर दिया। यहीं नहीं कई जगहों पर वनाधिकार समितियों की संस्तुतियों में भी हेराफेरी करते हुए कहा गया कि वनाधिकार समितियों ने दावो को अस्वीकृत कर दिया है। बताने की जरूरत नहीं है कि यदि वनाधिकार समितियां किसी दावे को निरस्त करती तो वह उसे उपखण्ड़स्तर की समिति में उसे भेजती ही क्यों। वनाधिकार समितियों ने यह भी शिकायत की है कि उनके द्वारा प्रेषित ढेर सारे दावों के प्रपत्र को उपखण्ड स्तर की समिति ने स्वीकार भी नहीं किया। स्वतः स्पष्ट है कि उपखण्ड समिति और जिला स्तरीय समिति ने अपने विधिक कार्य को उचित ढंग से सम्पादित नहीं किया। यह भी अवगत करा दे कि उपरोक्त कानून के संदर्भ में माननीय उच्चतम न्यायालय ने सिविल रिट याचिका 180/2011 उड़ीसा माइनिंग कारपोरेशन बनाम पर्यावरण एवं वन मंत्रालय में दिनांक 18 अप्रैल 2013 दिए आदेश में ग्रामसभाओं के नियमन के प्राधिकार को रेखांकित किया है। उन्हें यह भी अवगत कराया गया कि वनाधिकार कानून व संशोधन नियम 2012 मुख्य रूप से वनवासियों को भूमि अधिकार जो कि संविधान के अनुच्छेद 21 के अनुक्रम में संरक्षित है, को प्रदान करने के लिए ही बनाया गया है। माननीय उच्च न्यायालय के आदेश के बाद चंदौली, सोनभद्र की कुछ ग्राम वनाधिकार समितियों ने उपखण्ड समिति के अधिकारियों से प्रपत्र देने के संदर्भ में सम्पर्क किया तो उन्हें यह बताया गया कि न केवल उपखण्ड स्तरीय कमेटी बल्कि जिला और राज्यस्तरीय कमेटी को भंग कर दिया गया है। ऐसी स्थिति में बिना समितियों के पुर्नबहाली माननीय उच्च न्यायालय के आदेश का अनुपालन होना सम्भव नहीं है।
उन्हें यह भी अवगत कराया गया कि आजादी के साठ साल बाद भी उ0 प्र0 में कोल, धागंर जैसी आदिवासी जातियों को आदिवासी का दर्जा नहीं मिला और जिन गोड़, खरवार जैसी आदिवासी जातियों को दर्जा दिया भी गया, माननीय उच्चतम न्यायालय के आदेश के बाबजूद उनके लिए चुनाव में अभी तक सीटें आरक्षित नहीं की गयी है। वनाधिकार कानून के लाभ से यदि उन्हें वंचित रखा गया, उनके साथ धोर अन्याय होगा। इसलिए इस कानून के क्रियान्वन में विधिक प्रक्रिया अपनाया जाना आवश्यक है।


