वन अधिकार कानून पर हिमाचल में बन रहे बड़े आन्दोलन के आसार
वन अधिकार कानून पर हिमाचल में बन रहे बड़े आन्दोलन के आसार
कुलभूषण उपमन्यु
हिमाचल प्रदेश में वन अधिकार कानून 2006 को लागू करने में जानबूझ कर जल विद्युत परियोजनाओं व वन विभाग के दबाव के कारण किये जा रहे विलम्ब व संवैधानिक अवहेलना को ले कर हिमालय नीति अभियान 24-25-26 मई को शाई रोपा, बन्जार, कुल्लू में देशव्यापी सम्मेलन का आयोजन कर रहा है। इस में देश भर से 50 व प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों के 150 प्रतिनिधि भाग लेंगे। हिमाचल सरकार, सभी राजनैतिक दलों व सामाजिक संगठनों को भी सम्मेलन में भाग लेने का निमन्त्रण दिया गया है ताकि इस पर आम सहमति बन सके।
वनाधिकार कानून-2006, जनवरी 2008 से पूरे देश में लागू है, परन्तु हिमाचल प्रदेश की पिछली सरकार ने इसे जानबूझ कर अमल में नहीं लाया। अप्रैल 2008 को पहले चरण में प्रदेश के आदिवासी क्षेत्रों में यह कानून लागू करने की प्रक्रिया शुरू की गयी परन्तु अभी तक भी अधिकारों के हस्तान्तरण का काम अधूरा पड़ा है। जन दबाव व केन्द्रीय सरकार के बार-बार स्पष्टीकरणों के बाद 27 मार्च 2012 को प्रदेश सरकार ने गैर आदिवासी इलाकों में अन्य वन निवासी श्रेणी के लिये इस कानून को लागू करने के आदेश जारी किये। जिला व उप-मण्डल स्तर की वन अधिकार समितियों के गठन के आदेश सभी जिलाधीशों को जारी हुये परन्तु एक साल बाद भी इन समितियों का गठन नहीं हो पाया है।
इस वर्ष हिमाचल सरकार ने प्रदेश में 7 अप्रैल 2013 को आयोजित होने वाली ग्राम सभाओं की बैठक में आदिवासी एवम् अन्य परम्परागत वन निवासी (वन अधिकार मान्यता) कानून -2006 के तहत वन अधिकार कमेंटियाँ गठित करने का एजेण्डा शामिल किया गया था। ग्राम सभाओं में एजेण्डे की सूची दी गयी जिस में वन अधिकार कमेटी गठित करना शामिल था परन्तु न तो नियम की प्रति व न ही गठन के तरीके का हवाला संलग्न था। जिस कारण ग्राम सभाओं में कमेटियों का गठन नहीं हो पाया है और जहाँ इनका गठन हुआ भी वह भी कानून सम्मत नहीं है।
जल विद्युत परियोजनाओं वन भूमि हस्तान्तरण में संवैधानिक अवहेलना
इस कानून के प्रावधानों के मुताबिक किसी भी तरह की वन भूमि का गैर वानिकी कार्यों के लिये तब तक हस्तान्तरण नहीं हो सकता जब तक यह कानून अमल में ला कर वन निवासियों के वन अधिकार के दावों को निपटा कर उन्हें सौंपा न जाये। परन्तु प्रदेश में 2008 के बाद वन भूमि हस्तान्तरण के कई मामले सामने आये हैं। खास कर जल विद्युत परियोजनाओं से सम्बंधित हस्तातरण बड़े पैमाने पर हुये। हिमाचल सरकार के अधिकारियों व मुख्यमन्त्री ने वर्ष 2012 में वन व पर्यावरण मन्त्रालय को पत्र लिख कर अनुरोध किया था कि प्रदेश में जल विद्युत परियोजनाओं के वन हस्तान्तरण के मामलों में वन अधिकार कानून को अवरोध न माना जाये, क्योंकि यहाँ वन अधिकार अंग्रेजों के समय हुये बन्दोवस्तों में दर्ज कर लिये गये हैं। पर्यावरण व वन मन्त्रालय ने भी जवाबी पत्र में प्रदेश सरकार को इस कानून के प्रावधानों को अमल में लाने से छूट दे दी और केवल जिलाधीश के प्रमाण पत्र की शर्त लगायी।
कब्जा हटाओ अभियान में संवैधानिक अवहेलना
वनाधिकार कानून-2006 एक विशेष अधिनियम है, जो इस से पहले के वन व अन्य अधिनियमों के प्रावधनों को रोकता है। इस कानून में यह प्रावधान है कि जब तक सरकार इस कानून के अनुसार आदिवासी एवम् परम्परागत अन्य वन निवासियों के वन अधिकारों के दावों का निपटारा पूरा नहीं कर लेती, तब तक वन भूमि पर हुये किसी तरह के हस्तक्षेप व कब्जा को हटाने की कार्यवाही किसी भी वन व अन्य कानूनों के आधार पर नहीं की जा सकती है। आज कल वन विभाग ने कांगड़ा, सिरमौर व प्रदेश के अन्य हिस्सों में न्यायालय के आदेशों की आड़ में कब्जा हटाओ अभियान चला रखा है तथा वन निवासियों के कई घर तोडे जा चुके हैं। यह कार्यवाही गैर कानूनी हुयी है और संवैधानिक अवहेलना के दायरे में आती है।
हिमाचल प्रदेश में वन निवासी समुदाय
इस कानून के अनुसार प्रदेश में वन निवासी श्रेणी में तीन परम्परागत वन उपभोगी समूह शामिल हैं।
आदिवासी इलाकों में रहने वाले परम्परागत वन उपभोगी समूह। गैर आदिवासी क्षेत्रों में रहने वाले घुमन्तू पशुचारी समुदाय जैसे गद्दी, गूज्जर व अन्य पशुपालक जिनमें आदिवासी व गैर आदिवासी परम्परागत वन उपभोगी समूह शामिल हैं। गैर आदिवासी इलाकों में रहने वाले परम्परागत वन उपभोगी अन्य वन निवासी समुदाय-वन बर्तनदार।
ऐसे में प्रदेश की लगभग 95 प्रतिशत आबादी वन निवासी श्रेणी में आ जाती है जिन्हें इससे फायदा होगा। उक्त तीनों श्रेणियों के परम्परागत वन निवासियों को न्यायोचित तरीके से उनके वन अधिकार सौंपने होंगे। वन अधिकार कानून हिमाचल प्रदेश के 67 प्रतिशत भूभाग पर भूमि के उपयोग, संरक्षण व प्रबन्धन की नई व्यवस्था, व वन उत्पादों के स्वामित्व में बदलाव को नये ढँग से परिभाषित करेगा। इस के लिये वर्तमान में चल रही वन व सरकारी भूमि की भू व्यवस्था में बदलाव लाना होगा। यह प्रक्रिया एक तरह से पूरा बन्दोवस्त जैसी होगी। अतः इस काम को दृढ़ राजनैतिक इच्छा शक्ति से करना होगा।
यह एक महत्वपूर्ण कानून है जिस के तहत सरकारों द्वारा सदियों से दी जा रही वन बतर्नदारी रियायतों को कानूनी अधिकार का दर्जा मिलेगा। वे सभी वन निवासी जो 13 दिसम्बर 2005 से पहले आजीविका के लिये वन भूमि पर निर्भर हैं और वन भूमि से लघु वन उपज-घास, पती, ईन्धन, जड़ी बूटी इत्यादी व वन भूमि पर रिहायश तथा खेती करता है का उसे अधिकार प्राप्त हो जायेगा। सरकार अपने प्रदेश वासियों को यह कानूनी अधिकार देने के बजाये कम्पनियों की हित पोषक बनती दिख रही है। ऐसे में प्रदेश में बड़े आन्दोलन के हालात बन सकते है।
हिमालय नीति अभियान की माँग हैः-
ऽ वन अधिकार कानून 2006 के प्रावधानों का उल्लंघन करने वालों पर संवैधानिक अवहेलना की कार्यवाही की जाये।
ऽ वन अधिकार कानून लागू करने की प्रकिया पूरी राजनैतिक इच्छा शक्ति से शुरू की जाये। ग्राम सभा में वन अधिकार समितियों के गठन से पहले प्रदेश भर में वन अधिकार कानून की जानकारी के लिये जागरूकता अभियान चलाया जाय तथा उप मण्डल, जिला व राज्य स्तर की समितियों का तुरन्त गठन किया जाये।
ऽ हिमाचल प्रदेश में वन विभाग द्वारा चलाया गया कब्जा हटाओ अभियान व कम्पनियों को वन भूमि के हस्तान्तरण की प्रक्रिया को तब तक रोका जाये, जब तक कि सभी वन निवासियों के वन अधिकारों के दावों को इस कानून के अनुसार निपटाया न जाये व उन्हें सौंपने की प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती। हिमाचल सरकार को कानून के दायरे में व लोक हित में उच्च न्यायलय में कब्जा हटाने के न्यायलय के आदेश के स्थगन बारे रिव्यू पिटीशन दायर करनी चाहिये। यह प्रक्रिया पूरी होने तक वन विभाग द्वारा चलाये जा रहे कब्जा हटाओ अभियान को रोकाने के आदेश जारी हों व लोगों पर दर्ज मुकदमे वापिस लिये जायें।
यह केन्द्रीय सरकार का एक फ्लैगशिप कार्यक्रम है और इसे अमल में लाने के लिये गम्भीर है। ऐसे में लगभग 95 प्रतिशत आबादी के वन अधिकारों को ध्यान में रख कर प्रदेश सरकार को भी पूरी राजनैतिक इच्छा शक्ति के साथ न्याय पूर्ण तरीके से वन अधिकार प्रदेश की जनता को सौंपने के लिये तैयार होना चाहिये।
सम्मेलन में प्रदेश में वन अधिकार कानून को लागू करवाने, सामुदायिक वन प्रबन्ध व संरक्षण पर चर्चा होगी इस के लिये प्रदेश व्यापी जन अभियान का आवाहन किया जायेगा। अगर सरकार गैर कानूनी रूप से वन भूमि का व्यावसायिक परियोजनाओं को हस्तांतरण व कब्जा हटाओ अभियान नहीं रोकती तो प्रदेश स्तर पर बड़े आन्दोलन के लिये कमर कसी जायेगी व संवैधानिक अवहेलन करने वाले सभी दोषी अधिकारियों पर कानूनी कार्यवाही की जायेगी।
कुलभूषण उपमन्यु, लेखक हिमालय नीति अभियान के अध्यक्ष हैं।


