वर्गीय हितों को साधने में किया जाता है जाति का इस्तेमाल
वर्गीय हितों को साधने में किया जाता है जाति का इस्तेमाल
अंबेडकर के ‘जाति का खात्मा’ पर परिचर्चा के संदर्भ में - भाग-1
पार्थ सरकार
हाल ही में पटना में अंबेडकर के ‘जाति का खात्मा’ लेक्चर पर एक गोष्ठी का आयोजन किया गया। इसके आयोेजकों में प्रमुख ‘जनमुक्ति संघर्ष वाहिनी’ थी जो जयप्रकाश नारायण के विचारों से प्रेरित संगठनों में है और इसने बोल्ड गया महंत के सामंती वर्चस्व के खिलाफ संघर्ष को नेतृत्त्व दिया था जो उल्लेखनीय है। जाति विरोधी व महिला अधिकारों के आंदोलनों में भी इस संगठना की सक्रिय भागीदारी रही है। अंबेडकर के इस भाषण पर परिचर्चा में कम्युनिस्ट सेंटर ऑफ इंडिया के साथी ने अपने विचार रखे जिन्हें कुछ नकारात्मक प्रस्तुतियां हुईं। अंबेडकर के इस भाषण की विशेषता की प्रक्रिया का खात्मा करते हुए अंबेडकर को पंछाब में काम कर रहा ‘जात-पात तोड़क मंडल’ की ओर से 1936 में ‘जाति का खात्मा’ नामक विषय पर लाहौर में होने वाले सम्मेलनों में अध्यक्षता करने के लिए बुलाया गया था। अंबेडकर ने इस अवसर के लिए अपने अध्यक्षीय भाषण की तैयारी की और इसे जात-पात तोड़क मंडल के पास भेज दिया। इसे पढ़कर मेजबानों को लगा कि इससे हैंगामा हो जाएगा और यह उनके अधिकारियों को मान्य नहीं होगा। अंबेडकर की उक्त भाषण की पृष्ठभूमि बता दें। अंबेडकर को पंजाबी में काम कर रहा ‘जात-पात तोड़क मंडल’ की ओर से 1936 में ‘जाति का खात्मा’ नामक विषय पर लाहौर में होने वाले सम्मेलनों में अध्यक्षता करने के लिए बुलाया गया था। अंबेडकर ने इस अवसर के लिए अपने अध्यक्षीय भाषण की तैयारी की और इसे जात-पात तोड़क मंडल के पास भेज दिया। इसे पढ़कर मेजबानों को लगा कि इससे हैंगामा हो जाएगा और यह उनके अधिकारियों को मान्य नहीं होगा। अंबेडकर की उक्त भाषण की पृष्ठभूमि बता दें।


