वह आदमी जो अब तक हँस रहा है, लगता है बुरी ख़बर उस तक नहीं पहुँची है
वह आदमी जो अब तक हँस रहा है, लगता है बुरी ख़बर उस तक नहीं पहुँची है
जलते समय में एक शाम - किताबों के नाम
लखनऊ, 8 जून। हर प्रकार की निरंकुशता, कट्टरपंथ और दमन-उत्पीड़न की संस्कृति के विरुद्ध संघर्ष में साहित्य और पुस्तकों की अहम भूमिका रही है और आज इसकी प्रासंगिकता पहले से भी अधिक बढ़ गयी है। जनचेतना की ओर से आज शाम हज़रतगंज में ‘जलते समय में एक शाम - किताबों के नाम’ आयोजन इसी विषयवस्तु पर केन्द्रित रहा।
इस आयोजन में कूपमंडूकता, निरंकुशता और बर्बरता के विरुद्ध साहित्य की अहम भूमिका पर केन्द्रित पोस्टर प्रदर्शनी के साथ ही विभिन्न कवियों की कविताओं का पाठ और गीतों की प्रस्तुति की गयी तथा ‘मेरे जीवन में किताब’ विषय पर विभिन्न लेखकों से लेकर पाठकों तक ने अपने अनुभव साझा किए। उल्लेखनीय है कि इसी स्थान पर 6 जून से 13 जून तक जनचेतना की पुस्तक प्रदर्शनी भी चल रही है।
कार्यक्रम का संचालन कर रहे सत्यम ने कहा कि देश के अलग-अलग हिस्सों में आम लोगों पर बढ़ते हमले, माहौल बिगाड़ने की साज़िशें और अवाम के रहे-सहे अधिकारों को छीनने की कोशिशें आने वाले चुनौतीपूर्ण समय का संकेत दे रहे हैं। ब्रेष्ट की पंक्ति बार-बार याद आती है - 'वह आदमी जो अब तक हँस रहा है, लगता है बुरी ख़बर उस तक नहीं पहुँची है।' आज ज़रूरी है कि तमाम तरह के कट्टरपंथी, दकियानूसी विचारों के विषैले प्रचार का जवाब लोगों के बीच ज़मीनी स्तर पर जाकर दिया जाये और ऐसे विचारों और संस्कृति को आगे बढ़ाया जाये जो बेहतर इंसान बनने और बेहतर समाज बनाने की लड़ाई लड़ने को प्रेरित करती हैं।
कार्यक्रम में शिप्रा ने बेर्टोल्ट ब्रेष्ट की कविता ‘जरनैल साहब’, शाकंभरी ने महेश्वर की कविता ‘वे’, विमला ने मुक्तिबोध की कविता के एक अंश तथा शिवा ने सफदर की कविता ‘किताबें करती हैं बातें’ का पाठ किया। गीतिका ने हाल में दिवंगत हुई प्रसिद्ध अमेरिकी कवयित्री माइआ अंजालो की कविता ‘पिंजरे का पंछी क्या गाता है’ की प्रस्तुति की। इसके अलावा पुस्तकों और साहित्य की भूमिका पर प्रेमचन्द, राहुल सांकृत्यायन, भगत सिंह, दिदेरो, वोल्तेयर, कार्ल मार्क्स, नाजिम हिकमत, ब्रेष्ट, मुक्तिबोध, गणेशशंकर विद्यार्थी, डैनियल हैंडलर, आदि के उद्धरणों और रचना-अंशों की कलात्मक प्रस्तुति की गयी। कट्टरपंथ और निरंकुशता के विरुद्ध कविताओं और उद्धरणों पर बनाये रामबाबू के पोस्टर प्रदर्शनी स्थल पर प्रदर्शित किये गये थे।
कवयित्री कात्यायनी ने कहा कि जीवन से साहित्य और विचारों को बेदखल करने वाले सांस्कृतिक हमले उतने ही ख़तरनाक हैं जितने कि लोगों को उनकी जगह-ज़मीन से बेदखल करने वाले कारपोरेट हमले। आने वाला समय बेशक कठिन है लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इतिहास में तानाशाहों का हश्र क्या हुआ है। आज हाथ पर हाथ धरकर बैठने का नहीं बल्कि कमर कसकर मैदान में उतरने का समय है। इस लड़ाई में किताबें एक बहुत कारगर हथियार हैं।


