वाइब्रेंट गुजरात का फर्जीवाड़ा
वाइब्रेंट गुजरात का फर्जीवाड़ा
वाइब्रेंट गुजरात का फर्जीवाड़ा
महेंद्र मिश्र
वाइब्रेंट गुजरात और कुछ नहीं झूठ, फरेब और फर्जीवाड़े की पराकाष्ठा है। इस आयोजन में जब
बाहर की कंपनियां आना बंद हो गईं हैं और निवेशकों ने भारत से मुंह मोड़ लिया। तो गुजरात सरकार ने उसकी भरपाई का नायाब रास्ता ढूंढ लिया है। इसके तहत उसने सारे पंडालों को सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों और संस्थाओं वो बैंक हों या कि रेलवे, मरीन हो या कि मेट्रो सबसे भर दिया।
अनायास नहीं पंडालों में घूमने पर स्टेट बैंक, एक्सिस बैंक और देना बैंक के बड़े-बड़े स्टाल दिखते हैं।
रही सही कसर निजी कंपनियों की स्टालों से पूरा कर दिया गया है। जिसमें मोदी जी की इज्जत बचाने के लिए एक बार फिर रिलायंस ने कमान संभाल ली है।
शायद ही कोई ऐसा हाल बचा हो जिसमें उसकी एक या दो स्टाल न लगी हों। वैसे तो रिलायंस की अलग-अलग कंपनियों के नाम से स्टाल लगे हैं लेकिन इसके सभी काउंटरों पर एक ही काम हो रहा है। वह है जियो सिम की बिक्री का। विदेशी कंपनियां या तो नदारद हैं और अगर कुछ हैं भी तो बावजूद और बेपहचान वाली।
पूरे आयोजन की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कई स्टाल एप को समर्पित हैं। इन स्टालों पर एप के इन्स्टालमेन्ट और उनको ऑपरेट करने के तरीके बताए जा रहे हैं। अब किसी एप के बनने और उनको चलाने के तरीके बताना अगर किसी प्रदर्शनी का केंद्रीय कार्यभार बन जाए तो उसकी असलियत को समझना मुश्किल नहीं है। इनका भला किसी बड़े निवेश से क्या रिश्ता हो सकता है ?
निवेश के नाम पर दो ही निवेशों की चर्चा हुई है। दोनों अपने आप में ही विरोधाभाषी हैं। पहला गांधी के शराबबंदी वाले सूबे में शराब का कारखाना लगाने का। इसका करार एक विदेशी कंपनी के साथ हुआ है। दूसरा अहमदाबाद से मुम्बई के बीच बुलेट ट्रेन चलाने के लिए 77 हजार करोड़ के एमओयू पर हस्ताक्षर का है, जिसमें घरेलू कंपनियां शामिल हैं।
अब भला मोदी जी से ये बात जरूर पूछी जानी चाहिए कि जिन कर्मचारियों को सरकार 5000 रुपये वेतन दे रही है वो बुलेट ट्रेन का टिकट कहां से खरीदेंगे?
सरकार के फर्जीवाड़े ने इस बार सारी सीमाएं तोड़ दीं। आलम ये था कि जब कंपनियां नहीं आईं तो भला उनके सीईओ कहां से आते। ऐसे में आयोजकों ने एक नायाब रास्ता ढूंढ निकाला और सूबे के 450 शिक्षकों को शूट-बूट पहनाकर सीईओ के तौर पर तैनात कर दिया गया।
लेकिन वाइब्रेंट का झूठ इस बार पर्दा फाड़ कर बाहर आ गया है। अब तक हुए आयोजनों में सरकार 62 लाख करोड़ के निवेश का दावा करती रही है। इस हिसाब से अगर 1 करोड़ पर एक रोजगार पैदा हो तब भी 62 लाख लोगों को रोजगार मिल जाना चाहिए था। ऐसे में शायद ही सूबे में कोई बेरोजगार बचता। जबकि हकीकत ये है कि राज्य में 60 लाख युवा बेरोजगार हैं। यही वजह रही कि इस बार जिग्नेश मेवानी समेत दूसरे नेता सरकार के इस आयोजन के विरोध का ऐलान किये थे। लेकिन विरोध करने से पहले ही प्रशासन ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया।


