मार्कस स्‍टीजेनबर्जर
अपने अक्षय ऊर्जा कार्यक्रमों के बल पर भारत ने जी-20 देशों में जर्मनी के बाद दूसरे ऐसे देश के रूप में जगह बनायी है जो वास्‍तव में इस ऊर्जा क्षेत्र में महत्‍वाकांक्षी लक्ष्‍यों की प्राप्ति पर काम कर रहा है। दोनों देशों की तुलना करें तो जहन में एक समानता फौरन उभरती है, वह यह कि दोनों ही मुल्‍क वायु तथा सौर ऊर्जा में अपना भविष्‍य बना रहे हैं। बिजली उत्‍पादन की यह दोनों प्रौद्योगिकियां मौसम पर निर्भर करती हैं।
अक्षय ऊर्जा के मौजूदा कार्यक्रम भारत को सौर प्रणाली विकास के एक नये युग में तेजी से ले जाएंगे। मौसम पर निर्भर 160 गीगावॉट की ऊर्जा उत्‍पादन क्षमता भारतीय ऊर्जा प्रणाली को मूलभूत रूप से बदल देगी। इसका मतलब यह होगा कि बिजली उत्‍पादन तथा उसके इस्‍तेमाल के तरीके की आधारभूत मिसाल ही बदल जाएगी। दशकों तक बिजली उत्‍पादन को लेकर एक ही परिकल्‍पना जीवंत रही कि बिजली की आवश्‍यकता पूरी करने के लिये जरूरी ‘बेसलोड’ उपलब्‍ध कराने के वास्‍ते बड़े ऊर्जा संयंत्र स्‍थापित किये जाएं जिनसे चौबीसों घंटे बिजली का उत्‍पादन हो। भविष्‍य में उन कोयला अथवा परमाणु आधारित बड़े बेसलोड संयंत्रों की जरूरत धीरे-धीरे कम होती जाएगी। ऐसा इसलिये होगा क्‍योंकि ऐसे संयंत्र आमतौर अपने उत्‍पादन के स्‍तर में बदलाव के लिहाज से अपेक्षाकृत धीमे होते हैं।
लचीलापन एक नयी मिसाल है। अक्षय ऊर्जा स्रोतों (आरईएस) की बढ़ती हिस्‍सेदारी के साथ हम विद्युत की मांग की पूर्ति में सौर तथा वायु द्वारा उत्‍पादित बिजली की ज्‍यादा से ज्‍यादा भागीदारी देखेंगे। लिहाजा वायु तथा सौर ऊर्जा का समुचित उत्‍पादन नहीं होने की स्थिति में बिजली की मांग के भार को अच्‍छी तरह सम्‍भालने के लिये मुख्‍य बिजली उत्‍पादन प्रणाली में पर्याप्‍त लचीलापन लाने की जरूरत होगी। इसके अलावा जरूरत ना होने पर उत्‍पादन में कमी लाने तथा वायु एवं सौर ऊर्जा प्रणालियों की तरह उत्‍पादन के स्‍तर में तेजी से बदलाव करने के गुण भी मुख्‍य प्रणाली में पैदा करने होंगे।
यह सौभाग्‍य की बात है कि ऊर्जा संयंत्रों में स्‍वाभाविक रूप से कई प्रकार का लचीलापन होता है। उदाहरण के तौर पर ग्रिड का विस्‍तार, मांग के अनुरूप कार्य, ऊर्जा भण्‍डारण या लचीले परम्‍परागत ऊर्जा संयंत्र। जर्मनी के साथ-साथ भारत में भी सख्‍त कोयले से चलने वाले अनेक बिजली संयंत्र हैं। उनमें से अनेक संयंत्रों को तो लचीलापन बढ़ाने के लिये हाल के वर्षों में नयी तकनीक से लैस किया गया है। यह तकनीकी रूप से आसान तथा किफायती है। यह तथ्‍य है कि जर्मनी की ऊर्जा उत्‍पादन प्रणाली में सख्‍त कोयले से चलने वाले संयंत्रों को ‘बैक-अप’ क्षमता के तौर पर लगातार इस्‍तेमाल किया जा रहा है।
हालांकि यह सवाल अब भी पूछा जा सकता है कि अगर वायु तथा सौर ऊर्जा संयत्रों से हमारी बिजली उत्‍पादन प्रणाली ज्‍यादा जटिल हो जाती है तो हमें इन वैकल्पिक ऊर्जा संयंत्रों को क्‍यों लगाना चाहिये? इसका जवाब बिल्‍कुल सीधा है कि अक्षय ऊर्जा प्रणाली के हमारी परम्‍परागत बिजली उत्‍पादन प्रौद्योगिकियों के मुकाबले कई फायदे हैं। इससे वायु तथा मृदा का कम प्रदूषण होता है, इसमें कम पानी की जरूरत पड़ती है, घरेलू स्रोत होने की वजह से इसके लिये ईंधन का कम आयात करना पड़ता है, इससे कार्बन-डाई-ऑक्‍साइड का उत्‍सर्जन कम होता है, साथ ही परम्‍परागत बिजली संयंत्रों के मुकाबले इनमें रोजगार के ज्‍यादा अवसर हैं। सबसे खास बात यह है कि हम यह मान सकते हैं कि भविष्‍य में सौर तथा वायु ऊर्जा सबसे सस्‍ती बिजली उत्‍पादन तकनीक के रूप में उभरेगी।
अनेक विशेषज्ञों को संदेह है कि अक्षय ऊर्जा प्रणालियां उत्‍पादन के एक सुनिश्चित हिस्‍से यानी करीब 15 प्रतिशत से ज्‍यादा योगदान नहीं कर सकती हैं। बहरहाल, जर्मनी का अनुभव कुछ अलग ही बताता है। तेईस अगस्‍त 2015 की दोपहर को जर्मनी की ऊर्जा प्रणाली में परिवर्तनशील आरईएस का योगदान रिकार्ड औसतन 72 प्रतिशत (कुल आरईएस का 84 प्रतिशत) था। यह तो औसत स्‍तर था, जर्मनी के कुछ हिस्‍सों में वितरण के स्‍तर पर आरईएस की हिस्‍सेदारी 100 प्रतिशत तक पहुंच गयी थी। डेनमार्क में तो इस साल के शुरू में आरईएस की हिस्‍सेदारी 140 प्रतिशत तक पायी गयी थी। इनमें से किसी भी मामले में ऊर्जा प्रणाली को आपूर्ति की सुनिश्चितता सम्‍बन्‍धी किसी बड़ी समस्‍या का सामना नहीं करना पड़ा। सच्‍चाई यह है कि जर्मनी और डेनमार्क को ऊर्जा प्रणाली की विश्‍वसनीयता के लिहाज से दुनिया के शीर्ष देशों में शामिल किया जाता है। हालांकि आम धारणा के विपरीत जर्मनी का बिजली वितरण तंत्र ‘स्‍मार्ट’ नहीं है और वह अब भी परम्‍परागत ऊर्जा उत्‍पादन प्रणाली पर ही काफी हद तक निर्भर है।
अक्षय ऊर्जा प्रणाली प्रौद्योगिकी के लिहाज से साध्‍य तो है लेकिन उसके संयंत्रों की लागत हमें सोचने पर मजबूर करती है। चूंकि ऊर्जा उत्‍पादन की शेष प्रणालियों का लचीलापन भविष्‍य के लिये महत्‍वपूर्ण है, इसलिये तंत्र की सम्‍पूर्ण लागतें परिवर्तनशील अक्षय ऊर्जा स्रोतों की बढ़ती हिस्‍सेदारी का सामना करने की ऊर्जा तंत्र की क्षमता पर निर्भर करेंगी। तंत्र को गैर-लचीले बेसलोड मार्ग से ना जोड़ना महत्‍वपूर्ण है। अन्‍यथा, अक्षय ऊर्जा आधारित सौर प्रणालियों की सम्‍पूर्ण लागत बेवजह ज्‍यादा हो सकती है।
भारत ने अक्षय ऊर्जा के रास्‍ते पर अभी चलना शुरू ही किया है। यह कार्यक्रम पेरिस में इस साल हुए संयुक्‍त राष्‍ट्र के पर्यावरण सम्‍बन्‍धी महत्‍वपूर्ण अधिवेशन में शुरू किया गया है। ऐसा करने का यह बिल्‍कुल सही समय भी था। अक्षय ऊर्जा स्रोतों के बलबूते भारत के पास पर्यावरण नीति में नेतृत्‍वकर्ता राष्‍ट्र के रूप में जगह बनाने का बेहतरीन मौका है। निश्चित रूप से जर्मनी, जो कि अक्षय ऊर्जा विकास के लिहाज से अग्रणी देशों में शामिल है, भारत का गर्मजोशी से स्‍वागत करेगा और उसकी महत्‍वाकांक्षाओं को पूरा करने में सहयोग देगा।
मार्कस स्‍टीजेनबर्जर, अगोरा एनर्जीवेंड जर्मनी के उप कार्यकारी निदेशक हैं