#तहलका के प्रधान संपादक #तरुणतेजपाल ने
नया कीर्तिमान स्थापित किया !
मोहन श्रोत्रिय

अपनी ही सहकर्मी के साथ दुराचार ! और इससे पहले कि ख़बर उजागर हो, खुद अपराधी ही #न्यायाधीश भी बन गया। नफ़ीस शब्दों के आवरण में अपना अपराध कुबूल किया (यह दूसरी बात है कि उसे अपराध की संज्ञा फिर भी न दी) और अपने लिये #सज़ा भी सुना दी। #सज़ा भी कैसी ! छह महीने तक तहलका के प्रधान संपादक की कुर्सी से उतरे रहेंगे और इस अभूतपूर्व तरीक़े से प्रायश्चित करेंगे ! प्रकारांतर से उन्होंने मान भी लिया कि उनकी हवस की शिकार बनी सहकर्मी ने उनकी "बिना-शर्त क्षमा-याचना" को स्वीकार भी कर लिया है। मज़ा यह है कि यह सच नहीं है कि उन्हें माफ़ कर दिया गया है। माफ़ कर दिया गया होता, तो बात के खुल जाने का डर भी नहीं होता और इस #प्रायश्चित तक की नौबत नहीं आती।

ज़ाहिर है, हुआ यह होगा कि बात खुल जाने के कगार पर आ गयी होगी और न्याय की प्रक्रिया को बाइपास कर पाने की शुभेच्छा के वशीभूत तरुण तेजपाल ने पश्चाताप-प्रायश्चित का नाटक रच दिया होगा।

यह निन्दनीय है कि इतनी प्रतिष्ठित पत्रिका के संस्थापक- प्रधान संपादक ने अपने आपको नैतिकतावादी दिखाने के लिये यह घोर-न्याय विरुद्ध तरीक़ा अपनाया। यही नहीं, चूँकि सहकर्मी का नाम नहीं आया है, उन्होंने अपनी पत्रिका में काम करने वाली तमाम महिला पत्रकारों को संदिग्ध बना दिया है।

कहने की ज़रूरत नहीं है कि हम बेहद बुरे समय में जी रहे हैं। पिछले दिनों उठे मामले गिनाने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि ये सब "पब्लिक डोमेन" में हैं तथा मीडिया एवं सोशल मीडिया में छाये हुये हैं।

चाहे तरुण तेजपाल ने अपने खिलाफ़ फ़ैसला (?) सुना दिया हो, क़ानून को अपना काम करना चाहिए।