शेष नारायण सिंह
दिल्ली में नरेंद्र मोदी ने एड़ी चोटी का जोर लगा दिया था लेकिन उनकी पार्टी को बहुमत नहीं मिल पाया। दिल्ली विधान सभा का चुनाव वास्तव में शुद्ध रूप से नरेन्द्र मोदी का चुनाव था क्योंकि यहाँ उन्होंने अपने मनमाफिक मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार तैनात करवाया था और खुद ही कई-कई सभाएं की थीं लेकिन सरकार बनाने भर को बहुमत नहीं जुटा सके। आम आदमी पार्टी के रूप में एक नई राजनीतिक ताक़त आ गयी। ताज़ा खबर यह है कि दिल्ली के उप राज्यपाल नजीब जंग ने भाजपा के नेता डॉ. हर्षवर्धन को सरकार बनाने के लिये बुलाया था लेकिन उन्होंने मना कर दिया और कहा कि ज़रूरी बहुमत नहीं है इसलिये सरकार नहीं बनायेगें।
दिल्ली में सरकार बनाने से भाग रही भाजपा से आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने एक सवाल पूछा है कि अगर 2014 के चुनावों में लोकसभा में स्पष्ट बहुमत नहीं मिला तो क्या भाजपा सरकार बनाने की कोशिश नहीं करेगी। यह सवाल बहुत ही दिलचस्प है और अब इसी तरह के सवाल पूछे जायेंगे क्योंकि सूचना क्रान्ति और आम आदमी पार्टी के प्रादुर्भाव ने ऐसा माहौल बना दिया है कि अब मुश्किल सवाल पूछने में कोई भी संकोच नहीं रह गया है। हालांकि आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल से भी पूछा जा सकता है दिल्ली की जनता ने आपको महत्व दिया है और जब आपकी पार्टी के बाहर के विधायक भी आपका समर्थन देने की बात करते पाए जा रहे हैं तो आप क्यों सरकार नहीं बनाते। लेकिन उनका घोषित तिकड़म की राजनीति का विरोध करने का है इसलिये उनको अगले अवसर की प्रतीक्षा है और वक़्त ही बताएगा कि वे विरोध की राजनीति विरोध के लिये करते हैं कि उनके मन में राजनीति को सही दिशा देने का कोई सकारात्मक कार्यक्रम है।
भ्रष्टाचार के आचरण को अपनी नियति मान चुकी राजनीतिक पार्टियों के बीच से आम आदमी पार्टी का उदय एक ऐसी घटना है जिसके बाद लोगों को लगने लगा है कि इस देश के दरवाज़े पर दस्तक दे रही फासिस्ट ताकतों को रोका जा सकता है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना ज़रूरी है कि भाजपा के सभी नेताओं को फासिस्ट कह देना अति सरलीकरण होगा। अभी चार राज्यों के विधानसभा चुनावों में जो देखा गया है वह यह है कि सभी राजनीतिक पार्टियों ने एक दूसरे की ताक़त को सामने से चुनौती दी और सही लोकत्रांत्रिक तरीके से चुनाव प्रचार किया। किसी भी पार्टी ने सत्ता को हथियाने के लिये गठबंधन सरकार के उन तिकड़मों का सहारा नहीं लिया जिनके सहारे 1933 में हिटलर ने जर्मनी की सत्ता पर कब्जा किया था। ...और जहाँ खुले आम चुनावी राजनीति का पारदर्शी प्रचार और कार्यक्रम होता है वहाँ फासिस्ट ताक़तें सत्ता नहीं हासिल कर सकतीं। यह भी भरोसा किया जाना चाहिए कि मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह और छत्तीसगढ़ में रमन सिंह ने आम आदमी की राजनीतिक भावनाओं को राजनीतिक शक्ल दी है। उम्मीद की जानी चाहिए कि वे भविष्य में भी उसकी भावनाओं के खिलाफ जाने की हिम्मत नहीं जुटा पायेंगे। इन चुनावों के बाद कांग्रेस में हिम्मत हार चुके नेताओं का जमावड़ा भी साफ़ नज़र आ रहा है। इसलिये उनसे किसी राजनीतिक लड़ाई की उम्मीद करने का कोई मतलब नहीं है लेकिन दिल्ली में कांग्रेस और भाजपा को चुनौती देने वाली आम आदमी पार्टी से उम्मीद की जानी चाहिए। अभी आम आदमी पार्टी के एक वक्तव्यप्रिय नेता ने घोषणा की है कि वे राहुल गांधी के खिलाफ अमेठी से चुनाव लड़ेंगे। उन्होंने कहा है कि उनकी पार्टी देश के किसी भी क्षेत्र में किसी भी पार्टी के बड़े से बड़े नेता को वाक् ओवर देने के पक्ष में नहीं है। यह देश की राजनीति के लिये बहुत ही अच्छा संकेत है। संसद के चुनाव के हर क्षेत्र में सभी नेताओं को बड़ी से बड़ी चुनौती देकर ही लोकतांत्रिक भारत की रक्षा की जा सकती है। दिल्ली विधान सभा के चुनावों में जिस तरह से आम आदमी पार्टी के उम्मीदवारों ने अपने राजनीतिक दायित्व का निर्वाह किया है वह महत्वपूर्ण है। पिछले एक हफ्ते में ऐसे बहुत सारे राजनीतिक विश्लेषकों से बातचीत हुई है जो कहते हैं कि यह पार्टी चल नहीं पायेगी या कि इसमें ऐसे नेता नहीं है जो साफ़ समझ के साथ राजनीति को दिशा दे सकें, आदि-आदि। इन बातों का कोई मतलब नहीं है। एक तो यह बात ही बेमतलब है कि आम आदमी पार्टी में सही राजनीतिक सोच के लोग नहीं है। हम जानते हैं कि वहाँ काम करने वाले आनंद कुमार, योगेन्द्र यादव, गोपाल राय और संजय सिंह ऐसे लोग हैं जिन्होने इसके पहले कई बार स्थापित सत्ता के खिलाफ लोकतांत्रिक सत्ता की बहाली के लिये संघर्ष किया है और उनकी राजनीतिक समझ किसी भी राहुल गांधी या नरेंद्र मोदी से ज़्यादा है। इसलिये इन शंकाओं को गम्भीरता से नहीं लिया जाना चाहिए। लेकिन इस से भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इस पार्टी का जो मुख्य रोल है उसमें इसने अपने आपको खरा साबित कर दिया है। स्थापित सत्ता के दावेदारों को चुनौती देकर अगर आम आदमी पार्टी इस बात को पूरे देश में साबित करने में कामयाब हो जाती है कि राजनीति में जनता की इच्छा से बड़ा कुछ नहीं होता तो यह बहुत बड़ी बात होगी।
आज की सच्चाई यह है कि देश के बड़े भूभाग में जनता दो पार्टियों की साम्राज्यवादी पूंजीवादी राजनीति के बीच पिस रही है। आम आदमी पार्टी ने एक ऐसी खिड़की दे दी है जिसके रास्ते देश का आम आदमी स्थापित सत्ता की दोनों की पार्टियों को चुनौती दे सकता है। और यह कोई मामूली भूमिका नहीं है। 1977 में जिस तरह से जनता ने चुनाव लड़कर उन लोगों को जिता दिया था जो स्थापित तानाशाही सत्ता के खिलाफ चुनाव लड़ रहे थे, उसी तरह इस बार दिल्ली विधानसभा में जनता ने आम आदमी पार्टी के उम्म्मीद्वारों को जिता कर यह सन्देश दे दिया है कि अगर राजनीतिक समूह की नीयत साफ़ हो तो जनता के पास ताकत है और वह अपेन बदलाव के सन्देश को देने के लिये किसी भी ईमानदार समूह का साथ दे देती है। और बदलाव की आंधी को गति दे देती है। 1977 में तानाशाही ताकतों के खिलाफ हुई लड़ाई में जो नतीजे निकले उनके ऊपर उस दौर की उन पार्टियों के पस्तहिम्मत नेताओं ने कब्जा कर लिया जो इंदिरा गांधी की ताकत का लोहा मान कर हथियार डाल चुके थे। जनता पार्टी का गठन 1977 के उस चुनाव के बाद हुआ जिसमें इंदिरा गांधी और संजय गांधी की तानाशाही हुकूमत को जनता पराजित कर चुकी थी। लेकिन जनता के उस अभियान का वह नतीजा नहीं निकला जिसकी उम्मीद की गयी थी। जेल से छूटकर आये नेताओं को लगने लगा कि उनकी पार्टी की लोकप्रियता और उनकी अपनी राजनीतिक योग्यता के कारण 1977 की चुनावी सफलता मिली थी। वे लोग भी सत्ता से मिलने वाले कोटा परमिट के लाभ को संभालने में उसी तरह से जुट गये जैसे उस पार्टी के लोग करते थे जिसको हराकर वे आये थे। नतीजा यह हुआ कि दो साल के अंदर ही जनता पार्टी टूट गयी और सब कुछ फिर से यथास्थितिवादी राजनीति के हवाले हो गया और संजय गांधी-इंदिरा गांधी की कांग्रेस फिर से सत्ता पर वापस आ गयी। आम आदमी पार्टी का विरोध कर रहे बहुत सारे लोग यही बात याद दिलाने की कोशिश करते हैं।
जनता पार्टी के प्रयोग को असफलता के रूप में पेश करने की तर्कपद्धति में दोष है। 1977 में जनता पार्टी की चुनावी सफलता किसी राजनीतिक पार्टी की सफलता नहीं थी। वह तो देश की जनता का आक्रोश था जिसने तनाशाही के खिलाफ एक आन्दोलन चलाया था। जनता के पास अपनी कोई राजनीतिक पार्टी नहीं थी, उसने जनसंघ, संसोपा, मुस्लिम मजलिस, भारतीय लोकदल, स्वतन्त्र पार्टी आदि राजनीतिक पार्टियों के नेताओं को मजबूर कर दिया था कि इंदिरा गांधी की सत्ता के खिलाफ राजनीतिक लड़ाई की उसकी मुहिम में सामने आयें। जनता के पास राजनीतिक पार्टी नहीं थी लिहाज़ा जनता पार्टी नाम का एक नया नाम राजनीति के मैदान में डाल दिया गया। और इस तरह से बिना किसी तैयारी के जनता पार्टी का ऐलान हो गया। चुनाव आयोग के पास जाकर चुनाव निशान लेने तक का समय नहीं था लिहाजा चौधरी चरण सिंह की पार्टी भारतीय लोकदल के चुनाव निशान हलधर किसान को जनता पार्टी के उम्मीदवारों का चुनाव निशान बना दिया गया। यह जानना दिलचस्प होगा कि 1977 का चुनाव जीतने वाले जनता पार्टी के सभी उम्मीदवार वास्तव में भारतीय लोक दल के संसद सदस्य के रूप में चुनकर आये थे और उसी पार्टी के सदस्य के रूप में उन्होने लोकसभा में सदस्यता की शपथ ली थी। मोरारजी देसाई जिस सरकार के प्रधानमंत्री बने थे वह भारतीय लोकदल की सरकार थी। सरकार बनाने के बाद इन लोगों ने 1 मई 1977 के दिन सम्मलेन करके जनता पार्टी का गठन किया और फिर हलधर किसान जनता पार्टी का चुनाव निशान बना। सब को मालूम है कि जनता पार्टी जैसी पार्टी उसमें शामिल राजनीतिक नेताओं के स्वार्थ के कारण तहस नहस हो गयी और बाद के कई वर्षों तक कांग्रेस के लोग यह भरोसा दिलाते रहे कि कांग्रेस विरोध की राजनीति का कोई मतलब नहीं होता लेकिन यह सच्चाई है कि जनता पार्टी के प्रयोग ने संजय गांधी ब्रांड तानाशाही को रोक दिया था और दोबारा 1980 में जब कांग्रेस की सत्ता में वापसी हुई तो एक लोकतांत्रिक पार्टी के रूप में ही उसकी वापसी हुई थी, 1975 की तानशाही की राजनीति को वह तिलांजलि दे चुकी थी।
1975 के जनता के आन्दोलन को उस समय की मौजूदा पार्टियों ने हड़पने में सफलता हासिल कर ली थी क्योंकि उन दिनों जनता की तरफ से कोई राजनीतिक फार्मेशन नहीं था। आम आदमी पार्टी ने उस कमी को पूरा कर दिया है। आज जनता के पास उसका अपना विकल्प है और उस पर यथास्थितिवाद की पार्टियों का प्रभाव बिलकुल नहीं है। 36 साल पुराने जनता पार्टी के सन्दर्भ का ज़िक्र करने का केवल यह मतलब है कि जब जनता तय करती है तो परिवर्तन असंभव नहीं रह जाता। आम आदमी पार्टी के गठन के समय भी देश की जनता आम तौर पर दिशाहीनता का शिकार हो चुकी थी। देश में दो बड़ी राजनीतिक पार्टियां हैं, कुछ राज्यों में बड़ी राष्ट्रीय पार्टियां तो नहीं हैं लेकिन वहाँ की मुकामी पार्टियों के बीच सारी राजनीति सिमट कर रह गयी है। जनता के सामने कोई विकल्प नहीं है। उसे नागनाथ और सांपनाथ के बीच किसी का चुनाव करना है लेकिन दिल्ली विधानसभा के चुनाव में जिस तरह से आम आदमी पार्टी ने विकल्प दिया है उसके बाद पूरे देश में राजनीतिक पार्टियों के बीच सक्रियता साफ़ नज़र आ रही है। उम्मीद की जानी चाहिए कि इसके बाद जनता की उन इच्छाओं को सम्मान मिलेगा जिसके तहत वे बदलाव कर देना चाहती हैं।
शेष नारायण सिंह, लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं। वह इतिहास के वैज्ञानिक विश्लेषण के एक्सपर्ट हैं। नये पत्रकार उन्हें पढ़ते हुये बहुत कुछ सीख सकते हैं।