विकास सिर्फ मंच से चिल्लाने का शब्द बन गया
विकास सिर्फ मंच से चिल्लाने का शब्द बन गया
GDP से लेकर IMF और नाना प्रकार के आंकड़े रोज हमारे देश के विकास की नई परिभाषाएं गढ़ रहे हैं, जिनकी प्रासंगिकता और जमीनी हकीकत पर सवाल खड़े होते रहते हैं, जिनको हम कई उदाहरणों से समझ सकते हैं।
सब सरकारों के शासन कालों में बनी सैंकड़ों किलोमीटर सड़कों की बारिश के बाद हालत हमें विकास दिखा रही होती है, हमारे स्मार्ट बनने की प्रतीक्षा कर रहे शहर एक बारिश को झेल नहीं पाते।
शिक्षा तो वाकई सिर्फ आंकड़ों में जिंदा है बाकी तो यह धंधा अंधाधुंध पनप रहा है जिसकी गुणवत्ता की रिपोर्ट्स विकास को नए रूप से देखती है।
ऐसे आंकड़े रोज आते हैं कि 5वीं का बच्चा दूसरी कक्षा और आठवीं कक्षा का बच्चा चौथी कक्षा का सवाल नहीं कर सकता।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को भी याद कर सकते हैं सरकारी स्कूलों के संदर्भ में तो कम से कम।
उच्च शिक्षा का विकास अलग ही कहानी कहता है। अस्पताल की तरफ रूख करने पर तो और भयावह नतीजे मालूम पड़ते हैं जहां मरीजों को बेड के लिए बोली लगानी पड़ती हो, घूस देनी पड़ती हो, डॉक्टर के घर पर चक्कर काटने पड़ते हों, दवा में ठगी झेलनी पड़ती हो, छोटे शहरों या कस्बों में अस्पतालों की गुणवत्ता कौनसे विकास को गढ़ रही है।
GDP के साथ साथ इन बुनियादी चीजों पर ध्यान देना विकास में नहीं आता क्या। या विकास सिर्फ मंच से चिल्लाने का शब्द बन गया जो नजर नहीं आता।
रवि शर्मा


