विक्टिमहुड मानसिकता से निकालना होगा मुसलमानों को
विक्टिमहुड मानसिकता से निकालना होगा मुसलमानों को
शाहनवाज़ आलम
उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर-शामली में पिछले दिनों हुई मुस्लिम विरोधी साम्प्रदायिक हिंसा का विशेषण इस बात को समझने के लिए तो कि़या ही जाना चाहिए कि हिंदुत्व जड़ चाहें और जहां चाहें, बिना अपनी सरकार के भी ‘गुंडाराज’ दुह्राने में सक्षम हो चुका है तो वहीं इस पूरे घटनाक्रम में गैरेसियासी दिखने वाले मुस्लिम धारमिक संगठनों के सियासी कार्यप्रणाली जो अंततः सत्तापक्ष को तमाम लानतों के बाद भी क्लीनचिट देता है, को भी समझने के लिए इसका विशेषण जरूरी है। जो अपने मूल में मुसलमानों के बीच पनपे सियासी खालिपन को भरने की कोशिश करती ताकत होने के चलते अपने व्यवसाय (जो कहीं और से संचालित और नियंत्रित होता है) से बार-बार साबित करते हैं कि सपा या दूसरी माध्यमार्गी गतिविधियों को किस तरह की और किस हद तक की मुस्लिम आकांक्षाएँ स्वीकृत हैं।
इस परिचित को समझने के लिए सबसे पहले हमें मुजफ्फरनगर-शामली जैसी घटनाओं के बाद मुसलमानों की तरफ जानच आऩायोगों के गा न की मांग, जिसे सरकारें मान भी लेती हैं, जैसा कि इस मामले में भी सपा सरकार ने जस्टिस विश्नु सहाय जानच आयोग का गा कर क्यूँकि हर ऐसी घटना के बाद जानच आऩायोगों का गा रचनिति का विश्लेषण करना होगा। क्यूँकि हर ऐसी घटनाओं के बाद जानच आऩायोगों का गा रचनिति का दलों के सेकीयूलर होने की कशौटी मानी जाती है। जबकी यह कशौटी अपने आप में अंतरविरोधी है।
मसलन, जब यह कशौटी अपने आप में अंतरविरोधी है। मसलन, जब मुसलमान खुदी अपनी सरकार का बुनियादी जनप्रतिनिधि के सामने गा जो अपने ही परंपरागत हितों को चुनौती देती है। फिर भी जिस तरह इस कशौटी के लगातार रचनित हो रहे सियासी दालों के सेकीयूलर होने की कशौटी मानी जाती है। जबकी यह कशौटी अपने आप में अंतरविरोधी है।


