विचारहीनता के दलदल में बदलाव कैसे
विचारहीनता के दलदल में बदलाव कैसे
मनोज कुमार झा
आज समाज में विचारहीनता का बोलबाला बढ़ता जा रहा है। ऐसी ताकतें काफी मजबूत हो गई हैं जो तर्कपरकता, वैज्ञानिक सोच और बुद्धिवाद पर लगातार हमले कर रही हैं।
लगता है, यह सब संगठित और योजनाबद्ध तरीके से किया जा रहा है।
भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आने के बाद विचार और विचारधारा पर हमले में तेजी आई है। कई विद्वानों, संस्कृतिकर्मियों और लेखकों पर हमले किए गए, उनकी हत्या की गई और आज भी उन्हें सत्ता पक्ष से जुड़े व्यक्तियों और संगठनों द्वारा धमकियां दी जा रही हैं। वैचारिक रूप से प्रगतिशील तबके पर हर जगह खतरा मंडरा रहा है, लेकिन इसके प्रतिकार का कोई कारगर प्रयास नजर नहीं रहा।
विघटनकारी ताकतें खुल कर नंगा नाच दिखाने को तैयार
ऐसा लगता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेतृत्व में साम्प्रदायिक और विघटनकारी ताकतें खुल कर नंगा नाच दिखाने को तैयार हैं। सत्ता हासिल करने के लिए ये फासीवादी संगठन किस हद तक जा सकते हैं, यह हमने इतिहास में देखा है और अभी भी देख रहे हैं।
ये संगठन खासकर, किशोरों और युवा वर्ग को प्रभावित कर अपने पाले में लाने की कोशिश करते हैं और उनके दिलोदिमाग में घृणा का जहर बो देते हैं। ये उन्हें तर्कबुद्धिवाद और वैज्ञानिक विचारों से दूर करने की कोशिश करते हैं। यह काम ये बरसों से कर रहे हैं और अब देश की सत्ता हासिल कर लेने के बाद इनकी विघटनकारी गतिविधियों में तेजी आई है।
खासकर, चुनाव के मौकों पर ये ऐसे मुद्दे उभारने की कोशिश करते हैं जिनसे अलग-अलग धार्मिक समुदायों के बीच घृणा का प्रसार हो सके और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण कर वे चुनाव जीत पाने में सफल हो सकें। इस प्रयास में उन्हें अपेक्षित सफलता भी मिल रही है। पहले भी इन्हें सफलता ऐसे ही मिली है और आगे भी मिलेगी, यह इन्हें पता है। इतिहास, संस्कृति, धर्म, दर्शन आदि की गलत व्याख्या कर युवा पीढ़ी को गुमराह करना इनका लक्ष्य है। भूलना नहीं होगा कि वोट देने वालों में अधिक संख्या आज युवाओं की ही है।
भाजपा जब भी केंद्र की सत्ता में आई, उसने सबसे पहले पाठ्यक्रम में बदलाव करने की कोशिश की।
वैज्ञानिक तथ्यों को हटा कर इतिहास के नाम पर गल्प और झूठी कहानियां परोसने की कोशिश की। महान साहित्यकारों की रचनाओं को पाठ्यक्रम से हटा कर उनकी जगह औसत घटिया दर्जे के साहित्यकारों की रचनाएं सिर्फ इसलिए लगा दी कि वे आरएसएस की विचारधारा में यकीन करते हैं। गुजरात जैसे राज्य में जहां काफी पहले से भाजपा यानी आरएसएस सत्ता में है, स्कूली पाठ्यक्रम में पूरी तरह जहर घोल दिया गया है। बहुत ही अवैज्ञानिक किस्म की बातें पढ़ाई जा रही हैं और मानसिक रूप से विकलांग पीढ़ियां सामने आ रही हैं। संघ शुरू से ही इतिहास का इस्तेमाल लोगों में साम्प्रदायिक विद्वेष की भावना भड़काने के लिए करता आ रहा है। इसके इतिहासकारों, विचारकों, साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों की अलग मंडली है, जिन्हें पहले तो कोई नहीं पूछता था, पर अब नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद ये शहजोर हो गए हैं और वैज्ञानिक विचारधारा पर कुठाराघात करने का कोई मौका नहीं चूकते।
देश के बड़े-बड़े शोध संस्थानों, साहित्य-कला अकादमियों, विश्वविद्यालयों एवं राष्ट्रीय महत्त्व के अन्य संस्थानों में भगवा बुद्धिजीवियों को बैठा दिया गया है जो आरएसएस के एजेंडे को लागू करने की पुरजोर कोशिश में लगे हैं। जाहिर है, जब तक इनकी सत्ता रहेगी, ये ऐसा करते ही रहेंगे। फिलहाल, इनके सामने कोई चुनौती भी नहीं है।
संकीर्ण और जहरीली विचारधारा
दूसरी महत्त्वपूर्ण बात है कि भाजपा सत्ता में रहे या नहीं, आरएसएस के संगठन शिक्षा एवं संस्कृति के क्षेत्र में लगातार योजनाबद्ध ढंग से काम करते रहे हैं। लंबे समय से देश के नौनिहालों के दिमाग में ये जहरीली साम्प्रदायिक विचारधारा भरते रहे हैं। शिशु शिक्षा मंदिर से लेकर शिक्षा भारती एवं अन्य कई संगठन हैं जो अखिल भारतीय स्तर पर फैले हैं। इनसे शिक्षा हासिल कर जो निकलते हैं, उनकी सोच संकीर्ण और विचारधारा जहरीली होती है।
देश में भाजपा और संघ परिवार के मुस्लिम विरोधी अभियान का समर्थन कर साम्प्रदायिक माहौल बनाने वालों में ऐसे ही लोगों की संख्या सबसे ज्यादा होती है। ऐसे लोग शिक्षा, प्रशासन, प्रौद्योगिकी और वैज्ञानिक संस्थाओं में भारी तादाद में हैं और आबादी के अन्य तबकों पर भी अपना असर डालने में कामयाब होते हैं। गरीब और अनपढ़ आबादी इनकी बातों को चुपचाप स्वीकार कर लेती है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता। इससे भी इनकार किया जाना संभव नहीं है कि आरएसएस की विचारधारा के प्रभाव में देश की अच्छी-खासी आबादी है। इसमें नवजवानों की संख्या ज्यादा है जिनमें विचारहीनता और विवेकशून्यता हाल के दिनों में काफी बढ़ी है।
निम्न मध्यवर्गीय बेरोजगार युवाओं पर भी आरएसएस की विचारधारा का अच्छा-खासा प्रभाव है, जो लंपट तत्व में तब्दील हो गए हैं। साम्प्रदायिक दंगों, लूटपाट, आगजनी और बलात्कार में इनकी भूमिका बढ़-चढ़ कर रहती है। अफवाहें फैलाने में भी यह वर्ग सबसे आगे रहता है।
फासीवाद के उभार के लिए जमीन पूरी तरह तैयार
दुखद है कि देश में ऐसे विचारहीन तत्वों का असर बढ़ता ही चला जा रहा है और इनकी काट के लिए किसी तरह का कोई संगठित प्रयास दिखाई नहीं पड़ रहा। ऐसे में, देश में फासीवाद के उभार के लिए जमीन पूरी तरह तैयार दिख रही है। कांग्रेस एवं अन्य मध्यमार्गी तथाकथित सेक्युलर दल वास्तव में जातिवादी राजनीति करने वाले दल हैं और आरएसएस की साम्प्रदायिक विचारधारा की चुनौती का सामना कर पाने में असमर्थ हैं। इसकी वजह ये है कि इनका भी सामाजिक आधार वही है जो आरएसएस का है। इन दलों को पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष नहीं कहा जा सकता, क्योंकि ये हिंदू साम्प्रदायिकता की जगह अल्पसंख्यक साम्प्रदायिकता का सहारा लेते हैं।
जनता दल, राजद, सपा, बसपा और अन्य दल खुल कर जातिवाद और अल्पसंख्यकवाद का सहारा चुनाव जीतने के लिए लेते रहे हैं और अपेक्षित सफलता भी प्राप्त करते रहे हैं। जहां तक कांग्रेस का सवाल है, यह एक ऐसी पार्टी रही है जो मौके के अनुसार अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता का सहारा लेती रही है, यद्यपि अब इसका अल्पसंख्यक वोट बैंक पूरी तरह खत्म हो चुका है और पार्टी अस्तित्व के संकट से जूझ रही है।
अल्पसंख्यक साम्प्रदायिकता और बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता एक ही सिक्के के दो पहलू
देश में साम्प्रदायिकता की समस्या के प्रमुख अध्येता प्रो. हरबंस मुखिया ने कहा था कि अल्पसंख्यक साम्प्रदायिकता और बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। एक के बिना दूसरे का अस्तित्व नहीं हो सकता। दुर्भाग्य से देश में वामपंथी दलों ने भी इस बात को समझने की जरूरत महसूस नहीं की। वामपंथी पार्टियां भी अन्य दलों की भांति जाति और छुपे तौर पर धर्म के मुद्दे को भुनाने से बाज नहीं आईं। साम्प्रदायिकता के प्रश्न पर भी इन्होंने अनैतिहासिक दृष्टिकोण अपनाया, जो धर्म के नाम पर देश-विभाजन का समर्थन करने, उर्दू को मुसलमानों की भाषा मानने और प्रगतिशील लेखक संघ में हिंदी और उर्दू का अलग-अलग संगठन बनाने में दिखाई पड़ता है।
चुनान लड़ने के अलावा, वामपंथी दलों ने शिक्षा, संस्कृति एवं अन्य सामाजिक क्षेत्रों में कुछ भी रचनात्मक प्रयास करने की जरूरत नहीं समझी। अगर इन्होंने भी गाँव-गाँव, शहर-शहर में अपने स्कूल खोले होते, पुस्तकालय और सांस्कृतिक केंद्रों की स्थापना की होती, जिसके लिए इनके पास संसाधनों की कमी नहीं थी, तो आज आरएसएस की जहरीली विचारधारा को चुनौती देने के लिए विचारशील और प्रबुद्ध नौजवानों की भी एक पीढ़ी मौजूद होती।
सामाजिक बदलाव सिर्फ राजनीतिक गतिविधियों और चुनाव से नहीं होते।
इसके लिए जनचेतना में सकारात्मक बदलाव जरूरी है। जनचेतना में बदलाव के लिए सामाजिक-सांस्कृतिक आन्दोलनों की जरूरत है। इन आन्दोलनों से ही वह वैचारिक जन जागरण संभव है, जिसके आधार पर व्यवस्थागत परिवर्तन के लिए संघर्ष शुरू हो सकेगा।


