विमान की सवारी कर कुरुक्षेत्र की लड़ाई लड़ेगी माकपा
विमान की सवारी कर कुरुक्षेत्र की लड़ाई लड़ेगी माकपा
एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास
माकपा राज्य नेतृत्व में अन्दरूनी दबाव के बावजूद किसी बहुत बड़े फेरबदल की सम्भावना कतई नहीं है। माकपा राज्य सचिव की कुर्सी सुरक्षित है सिर्फ जिला स्तर पर कुछ फेरबदल हो सकते हैं। पंचायत चुनावों के बाद बारह पालिकाओं के चुनाव में भी पार्टी के सामने कड़ी शिकस्त का खतरा मँडरा रहा है। राज्य सरकार के खिलाफ जंगी आन्दोलन छेड़ने के आसार भी कम है। घटक दल इसके लिये तैयार नहीं है। खोये हुये जनाधार के मद्देनजर माकपा अब घटक दलों की राय को दरकिनार करके अकेले ही आन्दोलन की हालत में कतई नहीं है।
दूसरी ओर,संगठन के मौजूदा हालत में जनप्रिय माँग के मुताबिक माकपा, राज्य शीर्ष नेतृत्व में बड़ा परिवर्तन करके पार्टी में अन्तर्कलह तेज होने का जोखिम उठाने की हालत में भी नहीं है। जबकि सच तो यही है कि बंगाल में माकपा के लिये सांगठनिक संकट के बजाय ममता के मुकाबले खड़े हो पाने नेतृत्व का संकट ज्यादा प्रबल है। इस समस्या का कोई समाधान फिलहाल माकपा के पास नहीं है। जैसे विधानसभा चुनावों में माकपा को मजबूरन बुद्धदेव को सिपाहसालार बनाकर लड़ना पड़ा, वैसे ही माकपा में अब विमान बसु को भीष्म पितामह की तरह सेनापति बनाकर कुरुक्षेत्र की लड़ाई लड़ने की मजबूरी है।
पंचायत चुनावों के कम से कम दस जिलों में माकपा उम्मीदवार भी खड़ा करने की हालत में नहीं थी। विधानसभा चुनाव, पंचायत चुनाव और अब पालिका चुनाव में भी माकपा का सत्तादल के सामने एकतरफा आत्मसमर्पण है। जमीनी स्तर से नेतृत्व में बदलाव की माँग बहुत तेज हो गयी है जिसके मद्देनजर कुछ जिलों में सचिव बदलना मजबूरी हो गयी है। लेकिन राज्य स्तर पर वैकल्पिक नेतृत्व तैयार नहीं हुआ है, कोई विकल्प ही नहीं है माकपा के पास।
जाहिर है कि माकपा सांगठनिक कवायद में बुरी तरह फेल है। विधानसभा चुनावों से पहले भी तृणमूल कांग्रेस के पास कोई संगठन नहीं था। माकपा का संगठन तब भी दुर्भेद्य लग रहा था। लेकिन जनाधार कटाव इतना तेज हो गया कि अपने अजेय किलों में भी माकपा का नामलेवा कोई नहीं दिख रहा है। पुराने लोग ही रहे नहीं, नये लोग आ नहीं रहे हैं तो परिवर्तन काहे का। राज्य कमेटी और वर्द्धित राज्य कमेटियों की बैठकों में घनघोर माथापच्ची करने के बावजूद कोई रास्ता नहीं खुल रहा है।
केवल राज्य स्तर पर ही नहीं, बल्कि जिला स्तर पर भी माकपा की सांगठनिक शक्ति का इतना ह्रास हुआ है कि जिन जिलों में सबसे खराब नतीजे आये हैं और जहाँ कार्यकर्ता नेतृत्व परिवर्तन की माँग सबसे ज्यादा बुलन्द आवाज में उठा रहे हैं, माकपा वहाँ भी परिवर्तन करने की हिम्मत नहीं कर पा रही है। क्या पता कि परिवर्तन करने से हालत और पतली न हो जाये।
सत्ता में रहते हुये पार्टी नेतृत्व को कोई चुनौती देने की हिम्मत ही नहीं कर सकता था। अब हालात बदल गये हैं। हाथी को भी चींटी की लात हजम करनी पड़ रही है। सत्ता में रहते हुये सांगठनिक कवायद और नेतृत्व परिवर्तन की जरूरत सिरे से समझी ही नहीं गयी जबकि तब यह सब निर्विरोध सम्भव है। जैसे अब तृणमूल कांग्रेस में तमाम विवाद के बावजूद नेतृत्व के सवाल पर पूरी पार्टी एकजुट है। माकपा के लिये स्थिति इसकी उलट है। सामने खड़ा होकर जनसमर्थन माँगने वाला नेता या जनान्दोलन की अगुवाई करने वाला कोई नेता माकपा के पास अब नहीं है। चिड़िया चुग गयी खेत, अब पछताये क्या होत है।
समझा जा रहा है कि महज परिवर्तन की औपचारिकता पूरी करने की गरज से कोलकाता,पूर्व मेदिनीपुर और पश्चिम मेदिनीपुर जिलों के सचिव बदलने पर सहमति बनाने की कोशिश हो रही है। अन्यत्र परिवर्तन असम्भव है। पश्चिम मेदिनीपुर में मौजूदा सचिव दीपक सरकार हैं की कभी तूती बोलती थी अब उन्हीं पर गाज गिरने की आशंका है। लेकिन उनको आखिर कैसे हटाया जाये, यह भी भारी समस्या है। जितना भी संगठन इस जिले में बचा है, उस पर दीपक बाबू की पकड़ है। उन्हें जिले से हटाकर पार्टी मुख्यालय में लाने के विकल्प पर सोचा जा रहा है।
बुद्धदेव भट्टाचार्य अस्वस्थ हैं, वे कोई जिम्मेवारी ले नहीं सकते। इसी तरह श्यामल चक्रवर्ती भी बहुत बूढ़े हो चुके हैं। हालाँकि विमानदा भी खुद जवान नहीं हैं। जिलों में जैसे पूर्व मेदिनीपुर में जिला सचिव अस्वस्थ और बूढ़े हैं जिन्हें पदमुक्त करने पर शायद वे ही सबसे ज्यादा खुश हों। गनीमत है कि पूर्व मेदिनीपुर में ऐसा किया जा रहा है। लेकिन अन्यत्र बूढ़े शेरों को आजमाते रहने के अलावा माकपा के पास को कोई दूसरा चारा नहीं है।
जैसे कोलकाता के सचिव रघुनाथ कुशारी अपनी बढ़ती उम्र की वजह से अब और काम करने की जिम्मेदारी उठाने को इच्छुक नहीं है और पार्टी से उन्हें छुट्टी नहीं मिल रही है। अब उन्हीं को पदमुक्त करके परिवर्तन की औपचारिकता निभाने की तैयारी है। लेकिन कोलकाता जिले में पार्टी की बागडोर किसे दी जाये यह गुत्थी अभी नहीं सुलझी है।
राज्य नेतृत्व सांगठनिक सुविधा के मद्देनजर वर्दमान जिले के दो हिस्सों में बाँटने के पक्ष में है लेकिन जिला नेतृत्व इसके पक्ष में नहीं है। जाहिर है कि वर्दमान में भी कोई परिवर्तन नहीं हो रहा है।
उत्तर और दक्षिण 24 परगना में क्षत्रप इतने मजबूत हैं कि अब पार्टी नेतृत्व को उनकी मर्जी के खिलाफ चूँ तक करने की हिम्मत नहीं है। इसी तरह उत्तर बंगाल में भी पार्टी राज्य नेतृत्व का कोई नियन्त्रण नहीं है और वहाँ भी परिवर्तन असम्भव है।


