विमुद्रीकरण - आर्थिक आधार पर व्याख्या के दौर में लेफ्ट
विमुद्रीकरण - आर्थिक आधार पर व्याख्या के दौर में लेफ्ट
विमुद्रीकरण - आर्थिक आधार पर व्याख्या के दौर में लेफ्ट
संजीव ‘मजदूर’ झा
वर्तमान परिदृश्य में राष्ट्रवाद, राष्ट्रद्रोह, आर्थिक-सर्जिकल-स्ट्राइक, ब्लैक-मनी आदि मसलों पर वाम-संगठनों की समझदारी कितनी गहराई से है या नहीं है, इसपर प्रश्न-चिन्ह नहीं लगाया जा सकता. इस बात से सभी पक्ष-विपक्ष हमेशा से सहमत रहे हैं कि वाम-दलों की समझदारी पर प्रश्न नहीं किया जा सकता है .
इस आधार पर हम यदि आज की परिस्थिति को देखें तो इसके मूल में जो राजनैतिक-सामाजिक प्रतिबद्धता में खामियों को छुपाने के कारण 500-1000 रूपये के नोट पर पाबंदी और उसके साथ 2000 के नोट की शुरुआत से जो देश भर की स्थितियां बिगड़ी है, उससे वाम-दल अनजान हो यह भी नहीं कहा जा सकता.
यह पूरा का पूरा मामला किस प्रकार से पूंजीपतियों को राहत और आम नागरिक के जीवन को नरक बना रहा है,
इसे समझने में वाम-पंथियों को किसी प्रकार की दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा होगा, यह भी स्वीकार योग्य बातें नहीं हैं.
कुल मिलाकर देखें तो यह कहने में कोई हर्ज नहीं होना चाहिए कि वामपंथियों को इस सन्दर्भ में यह कहना कि—इससे महंगाई और बढ़ेगी, आम जन-जीवन और नर्क हो जायेगा, भविष्य में भ्रष्टाचार और अधिक बढेगा, इससे बड़े-बड़े घोटालेबाजों का कोई नुक्सान नहीं हो रहा है आदि बातें समझाना ठीक वैसा ही है जैसे सूरज को चिराग दिखाना.
बावजूद इसके यह घोर आश्चर्य है कि लेफ्ट संगठन तब चुप्पी साधे हुए है जब आर्थिक रूप से समूचे देश को परिभाषित किया जा रहा है जबकि आर्थिक आधार पर समाज का मूल्याङ्कन लेफ्ट के अतिरिक्त कोई भी संगठन ठीक-ठीक कर पाए, इसमें संदेह ही है.
इस समय लेफ्ट की भूमिका स्वतः महत्वपूर्ण हो जाती है.
ऐसा नहीं है कि वामपंथी इन घटनायों का जिक्र नहीं कर रहे हैं. वे सोशल-मीडिया से लेकर बैठक-उठक तक में लिख-बोल भी रहे हैं, बावजूद इसके राष्ट्रीय-स्तर पर प्रभावित करने योग्य कोई नेतृत्व तैयार नहीं हो रहा है जिससे भारतीय जनता को यह बताया जा सके कि वास्तव में इन घटनाओं के पीछे किस प्रकार की असफलताओं को छिपाने का प्रयास किया जा रहा है.
इन तमाम घटनाओं के बावजूद यदि भारतीय राजनैतिक परिस्थितियों का गंभीरता पूर्वक अध्ययन किया जाय तो स्पष्ट रूप से कुछ ऐसे सन्दर्भ निकाले जा सकते हैं जिससे यह साबित होता है कि जनता की समस्याओं के बावजूद मोदी-सरकार यह जताने में सफल हो सकती है कि उसने जो कुछ भी किया है, वही सही था और उसका विरोध करना ही राष्ट्र का विरोध करना है.
यहाँ २-३ बातों का ध्यान अधिक जरुरी है.
मोदी-सरकार के इस निर्णय से खुद मोदी-सरकार और कुछेक अंध-भक्ति करने वाले संगठनों को छोड़ दिया जाय तो लगभग सभी राजनैतिक पार्टियां जानती हैं कि—इस खेल के पीछे का आखिर सच क्या है?
सच्चाई को जानने के बावजूद विरोध न कर पाने की जो सबसे बड़ी समस्या है वो यह कि उनके विरोध को आसानी से मोदी-सरकार इस रूप में व्याख्यायित कर सकती है कि –‘इन पार्टियों के पास काला धन है इसलिए ये इस निर्णय का विरोध कर रही हैं’. और ऐसा हो भी रहा है.
राहुल गाँधी के विरोध को आसानी से दबा भी दिया गया और ऐसा करना इसलिए भी मोदी-सरकार के लिए आसान है क्योंकि प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से लगभग सभी राजनैतिक संगठन किसी न किसी रूप में भ्रष्टाचार में लिप्त हैं.
इसीलिए मायावती हों या अखिलेश हों किसी की भी जुबान से तालें नहीं खुल रहे हैं कि वो इतनी बड़े त्रासदी जहाँ बच्चें इलाज के बिना मर रहे हैं, लोग हत्याएं कर रहे हैं, शादियाँ टूट रही हैं, छोटे-छोटे दुकानदार बेरोजगार हो रहे हैं, गरीब भूखे मर रहे हैं, जैसी घटनाओं पर खुलकर विरोध दर्ज करा सकें.
इसी का फायदा उठाकर मोदी लोगों के बीच में जा-जाकर अपने विरोध को दबाने का खेल खेल रहे हैं. क्योंकि वहां मोदी को काउंटर करने वाला कोई नहीं है.
इसका सबसे बड़ा फायदा मोदी को यह मिलेगा कि इतनी बड़ी मूर्खता के बावजूद वह अपना जन-समर्थन खोने से खुद को बचा लेगा. और ठीक ऐसा ही हो रहा है.
लेकिन जिन कारणों से विपक्षी लगभग सभी दल शांत बैठे हैं वो कारण लेफ्ट के सन्दर्भ में नहीं है.
देश भर में तमाम तरह की आलोचनाओं के बावजूद लेफ्ट पर आर्थिक-घोटालों का मामला नहीं बनता है. यही लेफ्ट का वह मजबूत पक्ष है जिसपर विरोधियों ने भी कभी ऊँगली नहीं उठाया.
ऐसी परिस्थिति में लेफ्ट इकलौता संगठन है जो यदि मोदी के इस रथ-यात्रा के रास्ते आ जाए तो उसका यह खेल बिगड़ सकता है. क्योंकि जिन आरोपों के दम पर दूसरे संगठन नहीं टिक पा रहे हैं वो आरोप लेफ्ट पर नहीं चल सकते हैं.
लेफ्ट यदि अपनी इस शक्ति का उपयोग जनता के हित में करती है तो सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि—-जनता को हाशिये पर जिस निर्णय के कारण रखा गया है वह जनता मोदी के ख़िलाफ होने में वक़्त नहीं लगाएगी और यदि इसमें चूक हुई तो मोदी इस बात को मनवाने में सफल हो जायेंगे कि इस निर्णय से उन्होंने देश-हित का कार्य किया है.
भारत के सभी वामपंथी दल यदि एक होकर इस मुद्दे पर जनता की समस्या को उठाते हुए राष्ट्रीय स्तर पर एक होकर मुखर होती है तो निश्चित रूप से भविष्य में इस तरह के सरकार से भारतीय समाज को मुक्ति मिल सकेगी अन्यथा यह भी तय है कि जिस तरह से मनगढंत रूप में स्थूलता को ही बार-बार झूठ बोलकर यह सरकार परिवर्तन और राष्ट्रीय हित का नाम दे पाने में सफलता हासिल कर रही है, इसका नाजायज फायदा उठाने से इसे रोक पाना लगभग असंभव होगा. ऐसा इसलिए भी है क्योंकि जहाँ एक ओर आम जनता परेशानियों के कारण गुस्से में आती है वही दूसरी ओर उसके गुस्से को बलिदान का रूप देने में मोदी सरकार लगातार काम कर रही है.
यह समय जनता को यह समझाने का समय है कि—-
जिसे बलिदान कहा जा रहा है वह बलिदान के नाम पर मोदी सरकार का हित है, नाकामी को छुपाने का राष्ट्रीय स्तर का ड्रामा है और इस ड्रामे से नकाब यदि कोई संगठन उठा सकता है तो वह लेफ्ट-यूनिटी ही है.
इसलिए लेफ्ट-यूनिटी को चाहिए कि अपने सभी केन्द्रीय स्तर से लेकर छात्र स्तर तक को एकजुट कर इस मुद्दे पर राष्ट्रव्यापी आन्दोलन छेड़े ताकि इस समाज के हाशिये पर धकेले गए आम लोगों की समस्यायों को सही रूप में आवाज दिया जा सके.


