विवादों से परे रखो थलसेना प्रमुख के पद को
विवादों से परे रखो थलसेना प्रमुख के पद को
ओंकारेश्वर पांडेय
अभी भारत के मौजूदा थलसेना अध्यक्ष की जन्मतिथि को लेकर चल रहा विवाद थमा भी नहीं है कि देश के अगले सेना प्रमुख को लेकर विवाद शुरु हो गया है. करीब 11 लाख तीस हज़ार सक्रिय सैनिकों एवं बारह लाख आरक्षित सैन्य कर्मियों से युक्त विश्व की दूसरी सबसे बड़ी सेना भारतीय थलसेना की प्रतिष्ठा के लिए यह विवाद खासा नुकसानदायी हो सकता है.
मौजूदा जनरल वी.के. सिंह की जन्म तिथि को लेकर चला विवाद रक्षा मंत्रालय के फैसले के तुरंत बाद समाप्त हो जाना चाहिए. पर इसमें अभी संदेह है और उधर नये प्रमुख के नाम पर भी विवाद उठने लगा है.
आखिर जन्मतिथि से जुड़ी बातें किसी वरिष्ठ सैन्य अधिकारी के जीवन के आखिरी पड़ाव पर आयी ही क्यों? सरकार को इसे बहुत पहले सुलझा लेना चाहिए था. और अगर मसला आ भी गया था तो जनरल वीके सिंह को भी कुछ मर्यादा का पालन जरूर करना चाहिए था. बहरहाल उनके कार्यकाल का समापन जल्द हो जाएगा. पर दुर्भाग्य से वे जब भी याद किये जाएंगे, उनके जन्म तिथि से जुड़ा विवाद भी सामने आएगा और उनका ये दुर्भाग्यपूर्ण बयान भी कि रक्षा मंत्रालय मेरे साथ ऎसा व्यवहार कर रहा है जैसे कि वे पाकिस्तानी सेना के प्रमुख हों. इससे ज्यादा पीड़ादायक बयान नहीं हो सकता. रक्षा सचिव शशिकांत शर्मा के सामने जब उन्होंने ये बात कही होगी तो उन्हें कैसा लगा होगा, ये अंदाजा लगाया जा सकता है. पर इस बयान से दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी फौज के दिल पर क्या गुजरी और समूचे देश की जनता को कितना ठेस पहुंचा, क्या उसे जनरल वी के सिंह समझते हैं?
बात इतनी भर ही है न कि आपकी जन्मतिथि 10 मई 1950 है या 1951. अपने पूरे करियर में आपने ये विवाद नहीं निपटाया और जब रिटायरमेंट का वक्त आया तो आप अचानक इतने भावुक होने लग गये. ताकि कुछ माह और थलसेनाध्यक्ष पद पर बने रहने का अवसर मिल जाये. अच्छा होता कि आप इस पर रक्षा मंत्रालय के फैसले को स्वीकार कर लेते या स्वीकार नहीं था तो गरिमामय तरीके से इस्तीफा दे देते. पर आपने नहीं स्वीकारा और बार बार कोशिश करते रहे. इससे अच्छा संदेश नहीं जाता है. कोई और राष्ट्रहित या सैन्य हित से जुड़ा मुद्दा होता और आपने इसी तरह कड़ा रूख अख्तियार कर सरकार से लोहा लिया होता तो आपके प्रति सेना और देश में आदर का भाव आता. पर ये तो निहायत निजी मामला है.
रक्षा मंत्रालय को भी इस मामले से सीख लेनी चाहिए. खबरें हैं कि मनमोहन सरकार में नंबर दो माने जाने वाले वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी जनरल सिंह से मुलाकात कर उन्हें समझाने की कोशिश कर चुके हैं. क्योंकि कहीं न कहीं सरकार को लगा कि जनरल सिंह इस जन्मतिथि विवाद को लेकर कोर्ट में न चले जाएं. अब अगर जनरल सिंह इस मामले को कोर्ट में ले गये तो इससे सिवाय सरकार और सेना प्रमुख के बीच एक सीधे टकराव के कोई फायदा नहीं होगा. और नुकसान सेना और देश के मनोबल को होगा. खबर ये भी आयी कि इस मामले में पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने भी रक्षा मंत्री को पत्र लिखा था, जिस पर जनरल सिंह के समर्थन में पंजाब के 8 लाख रिटायर्ड सैन्य अघिकारियों व जवानों के दस्तखत भी थे. इस तरह के राजनीतिक कदमों से सैन्य प्रमुख के पद को अलग ही रखना बेहतर होगा. अच्छा हुआ कि कांग्रेस पार्टी ने कैप्टेन के इस कदम से खुद को समय रहते अलग कर लिया. वरना इस पर पक्ष-विपक्ष में राजनीति शुरु हो जाती.
पर अब ये सिलसिला आगे रुकना चाहिए. अगले थलसेना प्रमुख का नाम अभी तय नहीं है, पर विवाद सामने आने लगा है. भारतीय सेना की पूर्वी कमान के मुखिया लेफ्टिनेंट जनरल बिक्रम सिंह इस समय सेना में जनरल वीके सिंह के बाद सबसे वरिष्ठ हैं. उनके लगभग आसपास ही लेफ्टिनेंट जनरल केटी परनायक का नाम भी आता है. नया सेना प्रमुख या तो जनरल बिक्रम सिंह को नियुक्त किया जायेगा या ले. जनरल केटी परनायक को. सेना की पूर्वी कमान के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल बिक्रम सिंह वरिष्ठतम तो हैं, पर उनके नाम पर उठे विवाद के पीछे मुख्य कारण उनके कार्यकाल में जम्मू-कश्मीर में हुए एक मुठभेड़ तथा संयुक्त राष्ट्र शांति सेना में कुछ अनुशासनहीनता के अलावा एक गंभीर सवाल उनकी बहू की नागरिकता से जुड़ा भी है. सवाल ये उठाया जा रहा है कि क्या लेफ्टिनेंट जनरल बिक्रम सिंह के दुबई में काम करने वाले लड़के की पत्नी पाकिस्तान की नागरिक हैं ?
यह सवाल निश्चय ही गंभीर है. सेना में यह सख्त नियम है कि अगर कोई व्यक्ति जो भारतीय सेना में है, वह या उसका परिवार किसी विदेशी नागरिक से शादी करता है तो उसे इसकी सूचना देनी होगी. लेकिन क्या सूचना देना भर काफी होगा ? ये सरकार को तय करना है.
और अगर सरकार इस बिना पर ले. जनरल बिक्रम सिंह को सेनाध्यक्ष नहीं बनाने का फैसला करे तो जाहिरा तौर पर दूसरे प्रबल उम्मीदवार लेफ्टिनेंट जनरल के टी परनायक का नाम सेनाध्यक्ष पद के लिए सामने आएगा. उत्तरी कमान के मुखिया केटी परनायक मराठी हैं. सेना में उनका नाम एक ईमानदार और बहादुर अ़फसर के रूप में लिया जाता हैं. परनायक के अनुभव भी बिक्रम सिंह से कम नहीं. और वरिष्ठता क्रम में भी मामूली अंतर ही है. तय सरकार को करना है. और सेना को विवाद से बचाना भी उसे ही है. प्रयास करना चाहिए कि देश की सेना के प्रमुख का पद विवादों के परे रहे. हालांकि ये आसान नहीं है.
"द संडे इंडियन"


