विश्व बैंक का गरीब और पर्यावरण विरोधी ड्राफ्ट हुआ लीक
विश्व बैंक का गरीब और पर्यावरण विरोधी ड्राफ्ट हुआ लीक
नयी दिल्ली, 29 जुलाई। वर्ल्ड बैंक के एक लीक हुए मसौदे (पर्यावरणीय एवं सामाजिक सुरक्षा नीति) ने बैंक की उन प्रस्तावित नीतियों को उजागर किया है। आरोप है कि यह मसौदा गरीबों के हित और पर्यावरण को न सिर्फ अनदेखा करती हैं बल्कि उनके खिलाफ भी हैं, और सिर्फ एक जरिया हैं बैंक को अपने ही द्वारा फंडेड प्रोजेक्टों से हो रहे विनाश की जिम्मेदारी और जवाबदेही से बचने का। बैंक के प्रेसिडेंट जिम याँग किम द्वारा दिए गए आश्वासन, कि भूमि अधिकारों को मजबूत किया जाएगा, को झूठा दिखाते हुए, इस मसौदे ने उन सभी प्रयासों कि अवहेलना कि है जो पिछले दो सालों से सिविल सोसाइटी एवं बैंक के बीच चल रहे थे ताकि बेहतर नीतियाँ बनायीं जा सके। इसके बजाय, ऐसी नीतियाँ और बदलाव प्रस्तावित किये हैं जो लोगों के भूमि अधिकार, रहने और घर के अधिकार और आजीविका को खतरे में डालेंगे। मालूम हो की पिछले वर्ष जुलाई के महीने में बैंक के द्वारा बुलाई गयी परामर्श मीटिंगों का दिल्ली, बैंगलोर और भुवनेश्वर तीनों जगहों पर विरोध किया गया था।
एनएपीएम ने कहा है कि दुर्भाग्यपूर्ण रूप से इस मसौदे में एक 'ऑप्ट आउट' विकल्प रखा गया है जो उन सरकारों के लिए है जो आदिवासियों और परंपरागत जातियों को सामुदायिक हक एवं भूमि और प्राकृतिक संसाधनों का अधिकार नहीं देना नहीं देना चाहती। ऐसा करना विश्वव्यापी मानवाधिकार क़ानून का उल्लंघन होगा।
जन-आन्दोलनों का राष्ट्रीय समन्वय-एनएपीएम की एक विज्ञप्ति में कहा गया है कि विस्थापन के मुद्दे पर प्रस्तावित नीतिया एवं बदलाव और भी ज्यादा प्रतिगामी हैं। कोशिश यह की जा रही है वह सारे नियम और प्रतिबद्धता जो अब तक बैंक विस्थापन के मुद्दे पर लेता आया है, जैसे कि जब तक विस्थापन को रोकने या काम करने के लिए और पुनर्वास और आजीविका के लिए कदम नहीं लिए जाते तब तक बैंक प्रोजेक्ट को फण्ड नहीं करेगा, ऐसे सारे नियम को हटा दिया जाए। इसी प्रकार, फण्ड लेने वाली सरकारों या बैंकों को यह भी छूट देने कि बात कही गयी है कि जो अपने ही द्वारा निर्धारित मानकों से प्रभाव आकलन, मुआवजा और पुर्नवास तय करें। अब यह समझना कठिन नहीं है इन महत्वपूर्ण नियमों के बिना गरीब, छोटे किसानों, मछुवारों एवं अन्य लोगों कि जमीन और आजीविका का क्या होगा। इसके अतिरिक्त, दुनिया भर में हड़पी जा रही जमीनों और उसके लिए प्रयोग हो रहे बैंक के फण्ड का न तो ज़िक्र है और न ही उसे रोकने के लिए को कदम लिया गया है इस मसौदे में। भारत में विश्व बैंक के द्वारा शुरू की गयी परियोजनों के अति दूरगामी परिणाम रहे हैं, जैसे सरदार सरोवर बाँध, सिंगरौली में ताप विद्युत् गृह आदि। आज भी इन सभी परियोजनों में लोगों को सही तरीके से पुनर्वासित नहीं किया गया है।
जन-आन्दोलनों का राष्ट्रीय समन्वय ने गरीबों और पर्यावरण के लिए जरूरी नियमों और नीतियों को कमजोर करने कि इस कोशिश के खिलाफ कड़ा विरोध प्रदर्शित करते हुए बैंक के भारतीय कार्यकारी निदेशक को लिखे गए पत्र में, इस मसौदे के अंदर भूमि अधिग्रहण और विस्थापन के मुद्दे पर जो पहलू हैं, उन नीतियों को बदलने से रोकने की मांग की है। एनएपीएम ने मांग की है की इन नीतियों को यथावत रहने दिया जाए बजाये इसके कि और कमजोर किया जाये। दो साल से यह प्रक्रिया चल रही है और बेहतर होगा अगर इन नीतियों को लोगों के हकों को सुरक्षित और मजबूत करने के लिए बदला जाए।


