वेटिंग ही रह जाएंगे नरेंद्र मोदी भी
वेटिंग ही रह जाएंगे नरेंद्र मोदी भी
कैसे पूरा होगा 272 प्लस का आंकड़ा
तौसीफ कुरैशी
इस बार भाजपा ने अपने लोगों को राम मंदिर जैसे नारे न दे कर 272 प्लस यानी भाजपा को बहुमत में लाने का नारा दिया है। अब भाजपा इतने उत्साह में है कि 272 के स्थान पर 300 लोकसभा सीट जिताने की बात मतदाताओं से कह रही है। सवाल यह पैदा होता है कि क्या भाजपा जो लगभग आधे भारत में है ही नहीं वह इतनी सीटें कहां से ले आएगी। 2009 के लोकसभा चुनाव पर जब नज़र डालते हैं तो पता चलता है कि आंध्र प्रदेश, हरियाणा, जम्मू कश्मीर, मिजोरम, उड़ीसा, सिक्किम, तमिलनाडु, त्रिपुरा, उत्तराखंड, दिल्ली के अतिरिक्त चंडीगढ़, लक्ष्यद्वीप और पांडेचरी में भाजपा के पास एक भी सीट नहीं थी। इस के अतिरिक्त पंजाब और पश्चिमी बंगाल से उसे केवल एक एक सीट पर ही संतोष करना पड़ा था। अब जहां तक मौजूदा चुनाव की बात है तो भाजपा दिल्ली, उत्तराखंड और हरियाणा में फिर से पांव जमा सकती है मगर यहां भी उस की राह में कांग्रेस के साथ आम आदमी पार्टी और हजकां रोड़े अटका रही हैं। भाजपा इस बार भले ही मोदी-मोदी का शोर मचा रही है तथा मोदी को सारी समस्याओं का हल बता कर प्रचार कर रही है मगर मोदी की यह आंधी केवल अखबारों और खबरिया चैनलों तक ही सीमित है। भाजपा के पक्ष में राम मंदिर जैसा माहौल नहीं है और न ही भाजपा कोई ऐसा करिश्मा दिखा रही है जो मतदाता उस की ओर आकर्षित हो सके।
एक बार को यह भी मान लें कि भाजपा अपने द्वारा शासित राज्यों में कुछ बढ़त ले सकती है तो फिर भी 272 के आंकड़े से दूर ही दिख रही है। एक तथ्य यह भी दिख रहा है कि पिछले लोकसभा चुनाव में कर्नाटक आदि राज्यों में भाजपा को बढ़त मिली थी इस बार वह नहीं मिलने जा रही है। कर्नाटक में येदियरप्पा की वापसी भाजपा को लाभ के स्थान पर हानि अधिक पहुंचा रही है।
यह माना जा रहा है कि इस बार कांग्रेस की हालत खराब है तथा वह काफी घाटे में जा रही है। अगर ऐसा है तो कांग्रेस के इस घाटे का पूरा लाभ भाजपा को मिल जाएगा ऐसा कोई सबूत सामने नहीं है। दिल्ली उत्तराखंड और हरियाणा को ही लें जहां पिछले चुनाव में भाजपा जीरो पर थी इस बार इन तीनों राज्यों में आम आदमी पार्टी भाजपा और कांग्रेस के सामने चुनौती बन कर उभरी है और दिल्ली विधानसभा के चुनाव ने यह साबित भी कर दिया है जहां मोदी की ताबड़ तोड़ रैलियों के बाद भी भाजपा सत्ता से दूर ही रही। इस से यह भी साबित हो गया कि नरेंद्र मोदी के बारे में जो करिश्मा पैदा करने का प्रयास किया जा रहा है, वैसा है नहीं।... अगर होता तो दिल्ली विधानसभा के चुनाव में भाजपा की दुगर्ति न होती। उत्तराखंड और हरियाणा पर इस बार भाजपा ने काफी उम्मीदें टिका रखी हैं मगर इन दोनों राज्यों में भाजपा की राह आसान नहीं दिख रही।
इस बार भाजपा का धयान उत्तर प्रदेश पर कुछ खास है। भाजपा दावा कर रही है कि उत्तर प्रदेश में इस बार वह कम से कम 50 सीटों पर अपनी जीत दर्ज कराएगी। उत्तर प्रदेश में भाजपा के इस दावे को मुंगेरी लाल का हसीन सपना ही कहा जाएगा। माना यहां कांग्रेस की हालत पहले जैसी नहीं है मगर सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी की साख बनी हुई है तथा मतदाता अभी उसे पसंद कर रहे हैं। इस के अतिरिक्त बसपा भी इन चुनावों में अपना पूरा दम खम लगा रही है। अगर भाजपा की आंधी भी होती तो भी पचास सीटों तक भाजपा नहीं पहुंच पाती। दूसरे इस राज्य में भाजपा का पुराना रिकार्ड इतना खराब है कि भाजपा उस में कोई सुधार नहीं कर सकी है दूसरे नरेंद्र मोदी भी उत्तर प्रदेश में कोई प्रभाव नहीं डाल पा रहे हैं। नरेंद्र मोदी की लखनऊ रैली ने भाजपा के इस भ्रम को दूर कर दिया होगा कि राज्य में मोदी लहर चल रही है। इस के अतिरिक्त राज्य में भाजपा की गुटबंदी और आपसी सिर फुटौवल भी भाजपा को राज्य में पीछे धकेल रही है। राज्य में भाजपा की खस्ताहाली का अनुमान इस से लगाया जा सकता है कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के साथ-साथ कई बड़े नेता अपना चुनाव क्षेत्र बदलने के चक्कर में हैं। बनारस में मोदी और जोशी समर्थकों की सिर फुटौवल बता रही है कि राज्य में भाजपा की राह आसान नहीं है।
अब राजनीति में जातीय समीकरणों की बात करें तो ये भी भाजपा के पक्ष में नहीं दिख रहे हैं। दलित भाजपा का साथ बहुत पहले ही छोड़ चुके हैं और अब भाजपा के साथ उन के आने का कोई चांस भी नहीं दिख रहा। मुसलमान भाजपा के साथ कभी नहीं रहे और जो इक्का दुक्का मुसलमान भाजपा के साथ था भी, वह नरेंद्र मोदी के चलते भाजपा से दूर हो गया है। इस प्रकार मतदाताओं के दो बड़े वर्ग जिस दल के साथ नहीं हैं वह 272 प्लस सीट जीतने का दावा अगर करता है तो इसे उस का दिवास्वप्न ही कहा जाएगा।
नरेंद्र मोदी जो अपने का राष्ट्रवादी हिंदू कहते थे अब वह अपनी हर रैली में बता रहे हैं कि वह पिछड़े वर्ग से हैं मगर मोदी का यह दांव उत्तर भारत में कोई काम नहीं कर रहा है चूंकि यहां यूपी में मुलायम सिंह यादव जैसे पिछड़े वर्ग के कद्दावर नेता मौजूद हैं वहां मोदी को कोई भाव नहीं दे रहा है।
इन सब बातों के चलते आज भाजपा एक ओर तो मुसलमानों से माफी मांगने का ढोंग कर रही है तो दूसरी ओर राजग का कुनबा बढ़ाने के लिाए जमीन आसमान एक किए हुए है और कुनबा है कि बढ़ नहीं रहा है। बिहार में रामविलास पासवान से गठबंधान करना और महाराष्ट्र में मनसे को अपने पाले में लाने का प्रयास करना भाजपा की इस छटपटाहट का ही सबूत हैं। भाजपा को पता है कि वह जो सोच रही है वैसा होने नहीं जा रहा है इस लिए वह 272 प्लस की बात कर रही हैं। इन सारे हालात को देख कर यही लग रहा है कि जिस प्रकार पिछले लोकसभा चुनाव में अंधाधुंध प्रचार के बाद भी लाल कृष्ण आडवाणी वेटिंग ही रह गए थे इस बार नरेंद्र मोदी भी प्रधानमंत्री पद के दावेदार ही रह जाएंगे।


