हम सबके हिस्से का दर्द
रेहान अशरफ
मेरे मामू राज मिस्त्री थे, हमको फख्र से बताते थे कि लाला राधेश्याम का पूरा मकान उन्होंने बनाया है और लाला जी उनके अलावा किसी से काम नहीं करवाते हैं। वो जोहर और असर की नमाज़ मे जो वक्त लगता है उस की भरपाई एक घंटा ज्यादा काम करके करते हैं। लाला जी कहते भी हैं कि हाफ़िज़ साहब टाइम से ही निकल जाया करो, लेकिन मैं कभी नहीं आता क्योंकि मुझे अपनी रोज़ी हलाल ही रखनी है!
समाज का ये ताना-बाना बिखरा, माहौल भी खराब होता गया और लाला जी भी गुज़र गए और उनके बच्चों ने मेरे मामू से कोई काम नहीं करवाया। मामू ने इस बारे मे राय दी कि उनकी उम्र बढ़ने की वजह से ऐसा हुआ, जबकि वो तंदरुस्त ही थे।
विडंबना ये है कि भेदभावपूर्ण राजनीति के दौर के चलते जो क्वालिटी मेरे मामू में लाला जी को नज़र आती थी, वहीँ मज़हबी संस्कार एक खूबी से बदलकर डर, शक और घृणा का पर्याय बन गए, एक परस्पर मेल मिलाप वाला समाज बर्बाद हो गया!
सोचने वाली बात ये भी है कि क्या वो ईमानदार किरदार भी हम जिंदा रख पाये जो हमारी सामाजिक पहचान थे ? वैश्विक नफरत के इस

दौर मे हमें बहुत कुछ सोचना है।
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रेहान अशरफ की फेसबुक वॉल से साभार