डॉ. सुनीलम
मुंबई। देश के लोकसभा चुनाव में जन आंदोलन के कई महत्वपूर्ण सामाजिक कार्यकर्ता पहली बार चुनाव मैदान में है। इनमे मेधा पाटकर, दयामनी बारला, सोनी शोरी, लिंगराज, आलोक अग्रवाल, सुभाष वारे, ललित बाबर और सुभाष लोमटे समेत लगभग तीस आन्दोलनकारी आप पार्टी से चुनाव लड़ रहे हैं। इन सभी के प्रचार में जन आंदोलनों की अभियान समिति की तरफ से लोकसभा के सत्रह निर्वाचन क्षेत्रों में हम लोगों ने हिस्सेदारी की। इसकी शुरुआत इसी मुंबई से हुई और आज मुंबई में मतदान के बाद अपनी वापसी भी यही से हुई। इसलिए अभियान की शुरुआत मेधा पाटकर से करते हैं। राजनीति धोखा है, धक्का मारो मौका है, इस नारे को नर्मदा की घाटी में 27 वर्षों से सुनता आ रहा था। अन्ना हजारे की कोर कमेटी के सदस्य रहते हुए बार-बार इंडिया अंगेस्ट करप्शन को राजनीति से दूर रखने का अतिशय आग्रह से भी सामना होता रहा। इस चुनाव में यह सोच रखने वाले साथियों को चुनावी मैदान में खंभ ठोकते देखा, अच्छा लगा। देर आए दुरुस्त आए।
अपने सात चुनाव लड़ने के अनुभव के साथ ही जार्ज फर्नांडीज राम विलास पासवान तथा समाजवादी पार्टी के चुनाव अभियान में सक्रिय भूमिका निभाने के बाद इस बार का अनुभव सबसे अलग और अनूठा रहा। खासकर बस्तर और झारखंड के खूंटी लोकसभा जैसे माओवादी प्रभावित अंचल में जन सभाएं करना बार-बार याद भी आता है। इस आदिवासी अंचल के साथ सभी चुनाव क्षेत्रों में नए नए उत्साही और आदर्शवादी नौजवान भी मिले जो व्यवस्था परिवर्तन के लिए नए रास्तों की तलाश में हैं।
बहरहाल, मेधा पाटकर को चुनाव उम्मीदवार के तौर पर देख कर यह लगा ही नही कि वे पहली बार चुनाव लड़ रही हैं। हालाँकि उनके भाषण संघर्षो के दौरान जैसे सुने थे वैसे ही वे मुद्दों पर ज्यादा केंद्रित थे। दिन में रोज सात घंटे कम से कम पदयात्रा कर जन सम्पर्क करना तो शाम को तीन चार सभाएं करना। रात दो बजे सोकर सुबह छह बजे से फिर क्षेत्र में निकलते हुए उन्हें लगातार देखा। केवल चौदह अप्रैल को संविधान गौरव रैली को मेधा ने दो सौ बौद्ध विहार तथा बाबा साहेब आम्बेडकर की प्रतिमाओं पर जाकर लोगों से संवाद किया। प्रचार के अंतिम दिन रैली में मानफुर्द-शिवाजी नगर के इलाके में सुबह से लेकर पांच बजे तक लगातार लगभग हर छत से पुष्प वर्षा होते देखना एक अलग और सुखद अनुभव था।
आम तौर पर चुनाव जाति, पैसे, शराब और बाहुबल के आधार पर लड़ा जाता है। पर मेधा पाटकर का चुनाव इस सबके परे था। सादगी से लड़ा गया यह चुनाव राजनैतिक जमात के लिए संदेश और सबक भी है। मेधा के इस चुनाव में घर बचाओ घर बनाओ आंदोलन के प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं को दिन-रात एक करते हुए बिना पांच पैसा लिए देखने से लगा कि आज भी बिना अथाह पैसे के कार्यकर्ताओं को जोड़े रखना संभव है।
सभी जानते हैं कि चुनाव बूथ पर लड़ा जाता है। हर चुनाव क्षेत्र में लगभग सत्रह अठारह पोलिंग बूथ होते हैं जिसमें औसतन एक हजार मतदाता वोट करते है। जिसका अर्थ है कि चुनाव के दिन उम्मीदवार के पास दो पोलिंग एजेंट तथा कम से कम दस कार्यकर्ताओं की हर बूथ पर जरूरत होती है अर्थात् लगभग बीस हजार कार्यकर्ताओं की जरुरत पड़ती है। मतदान के दिन पोलिंग बूथ पर लगभग सभी पार्टियाँ पांच हजार से पचास हजार तक पैसा पहुंचाती हैं। कार्यकर्ताओं के भोजन का इंतजाम अलग होता है। पोलिंग एजेंट बैठाने का रेट पांच सौ से दो हजार के बीच होता है। सभी बूथों पर टेबल कुर्सी और छाते का इंतजाम जरूरी होता है। इस तरह चुनाव के महायज्ञ के अंतिम दिन न्यूनतम पचास लाख रुपए की जरुरत पड़ती है। जग जाहिर है कि इस न्यूनतम योग्यता पर जन आंदोलन का कोई भी उम्मीदवार खरा नहीं उतर सका। तो मेधा पाटकर कहाँ से इस कसौटी पर खरी उतरतीं।
मेधा की पूंजी तो समाज के लिए उनके चार दशक का समर्पण, सेवा और जन संघर्ष का इतिहास रहा है। यह पूंजी समाज के खाते में रही है। हालाँकि मैंने यह भी देखा की कुछ लोग उनके पास पैसा लेकर आए पर मेधा ने बिना रसीद और बिना नाम के उस पैसे को लेने से इनकार भी कर दिया। यह सभी जानते हैं कि चुनाव बिना साधन के नहीं लड़ा जाता। अब देखना यह है कि समाज उस पूंजी को किस तरह और कितना लौटता है।
आम आदमी पार्टी यह कहती है कि आम पार्टियाँ मात्र वोट लेने की मशीन बनकर रह गई हैं। जबकि आम आदमी पार्टी ने इस बार भ्रष्टाचार, कारपोरेट लूट और मजहबी कट्टरता के खिलाफ लोगों से अपील की थी। अब देखना है आम आदमी इस कसौटी पर खरा उतरता है। वह भी देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में।
जनादेश न्यूज़ नेटवर्क