शहर में छत नहीं मन टपकता है
शहर में छत नहीं मन टपकता है
डा . आशीष वशिष्ट
दिनों-दिन बढ़ता शहरीकरण और उससे जुड़ी दूसरी अनेक समस्याएं चैबीस घंटे में चाहे एक ही बार अपने गांव, खेत-खलिहान, खुली आबोहवा की ओर लौटने के लिए अंदर ही अंदर जोर मारती है, लेकिन मजबूरियां और जरूरतें गांव वापिसी की लिए व्याकुल मन के पैरों में जंजीरें डाल देती हैं। रोजी-रोटी, षिक्षा, स्वास्थ्य और तमाम दूसरी जरूरतों की पूर्ति के लिए एकबारशहर की ओर बढ़े कदम अपने गांव की तरफ वापिस जाना तो चाहते हैं लेकिन चाहकर भी वापिस लौट नहीं पाते हैं। गांव की खुला वातावरण, साफ-सुथरी आबोहवा, हरे-भरे खेत, अनाज से भरे खलिहान, कुएं से पानी भरने का मधुर स्वर, चिडि़यों की चहचहाट, जुगनुओं की जगमगाहट, मेंढक की टर्र-टर्र और बारिश में भीगती और टपकती घास-फूस की छत एक ऐसे दृष्य का निर्माण करते हैं कि हजारों फिल्मकार, चित्रकार और लेखक भी मिलकर वैसी तस्वीर बना पाने में सक्षम नहीं हैं। लेकिन शहर की भागदौड़ और भागम-भाग में गांव और उसके अदभुत दृष्य कोसों दूर छूट गए हैं। शहर में न तो जुगनू की जगमगाहट हैं और न ही चिडि़यों की चहचहाट यहां तो बिजली के बल्ब हैं और गाडि़यों की टें-टें और पें-पें। शहर में बरसात मजा कम मुसीबत ज्यादा लगती है। शहर में छत नहीं मन टपकता है। पीने को न तो साफ पानी है और न ही खुली और शुद्व हवा। लेकिन मजबूरियांे की डोर में बंधा प्राणी लाख जतन और चाहत के बाद भी इस कांक्रीट और बनावटी दुनिया से निकल नहीं पाता है। गांव से रोजी-रोटी और अन्य सुख-सुविधाआंे की चाहत शहर ले तो आई लेकिन हमने और आपने शहर आकर गांव-देहात से ऐसा मुंह मोड़ा की दुबारा घूमकर पीछे यह नहीं देखा कि पीछे कोई मर रहा है या जी रहा है। शहरी की चकाचैंध और अनगिनत सहूलियतों ने शहर के मोहपाश में ऐस उलझाया कि जिस मिट्टी में पैदा हुए थे उसी मातृभूमि से हमें बदबू आने लगी और शहर में पक्की ईंटों और पक्के फर्ष के बने मकानों में हम संवेदना, प्रेम और खुशबू को ढूंढने लगे अर्थात कागज के फूलों से हमने ताजगी, खुशबू और प्रेम की उम्मीद कर ली।
गांव और शहर दोनों का अपना-अपना चरित्र है। शहरों की बुनियाद गांव की कच्ची नीवं पर ही खड़ी हुई है। गांवों ने अपना बलिदान और कुर्बानी देकर शहरों को जन्म दिया है। लेकिन विंडबना यह है कि हम आज गांवों की कुर्बानी, शहादत को भूला बैठे हैं। ये कटु सत्य है कि अगर गांव न होते तो शहर भी न होते लेकिन आज शहर की मौज-मस्ती और रंगीनी में हम ये भूल चुके हैं कि सारा विष्व पहले एक गांव ही था। लेेकिन आज की युवा पीढ़ी इस बात से परहेज करती है कि कोई उनको गावं वाला कहे या फिर उनका संबंध किसी गांव से निकाले। हम सभी गर्व से अपने आपको शहरी बताने, जताने और समझाने में गर्व महसूस करते हैं और ऐसे बातचीत व व्यवहार करते हैं कि जैसे हम शहरी हैं और हमारा गांव से दूर-दराज का कोई नाता ही नहीं है। गांव अषिक्षित, बीमार, बेरोजगार, मैला-कुचैला और अंधेरे में डूबा जरूर हो सकता है लेकिन मन और चेतना से अज्ञानी और अंधकारी कदापि नहीं है। गांव से ही षहर का जन्म हुआ है और गांव ने ही हर मौके पर देश को दशा और दिशा दिखाई है। ऐसा नहीं है कि शहर में केवल कमियां और दोष ही हैं। शहर और गांव दोनों में जन्मजात और व्यवस्थागत गुण और दोष व्याप्त हैं और दोनों की अपनी सीमाएं, मर्यादाएं और अनुशासन है। हां गांव के जीवन में जो स्वच्छदंता, खुलापन, मस्ती और अपनापन है वो शहर से नदारद है। गांव में हर एक का पता सबके पास होता है और शहर में आप अपना पता भूलने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। गांव में जहां सन्नाटा और कम भीड़ भाड़ है वहीं शहर में भीड़-भडक्का और आशान्ति का वातावरण है। कहने का भाव यह है कि गांव और शहर की तुलना किसी भी स्तर नहीं की जा सकती है लेकिन जो मौज-मस्ती और खुलापन गांव में था वो शहरी जीवन में नहीं है, इस तथ्य को झुठलाया नहीं जा सकता है।
गांव की छाती पर आज षहरों का निर्माण बड़ी तेजी से हो रहा है। अनियोजित विकास की जो रूपरेखा देशभर मंे खींची जा रही है, वो संपूर्ण मानवजाति को विनाश के रास्ते पर धकेल रही है। शहर ने हमें और आपको जहां अनगिनत सुख-सुविधाएं और आधुनिक साधन उपलब्ध करवाएं हैं वहीं अनेक जटिल सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और पर्यावरण से जुड़ी अनेक समस्याआंे का तोहफा भी मुंहदिखाई में दिया है। गांव में हरे-भरे पेड़ों और लहलहाते खेतों का जंगल था तो शहर में कांक्रीट का जंगल चारों ओर दिखाई देता है। खेत-खलिहानों को रौंदकर शहर के शहर सजाए और बनाए जा रहे हैं लेकिन किस कीमत पर इसका ध्यान किसी को नहीं है। सरकार के पास नीति तो हैं लेकिन कोई नया और सकारात्मक काम करने की नीयत का सर्वथा अभाव है। गांव के प्रति हमारी आपकी बेरूखी की प्रवृत्ति और आदत को भांपकर व्यवस्था ने भी गांव से मुंह मोड़ लिया है। गांवों में वैसे तो विद्यालय ही नहीं है अगर गनीमत से विद्यालय खुल भी गया तो षिक्षक ही वहां झांकने नहीं जाएंगे। विद्यालय की भांति प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र और अन्य जनसुविधाओं का हाल है। व्यवस्था के साथ ही साथ हम और आप भी कम दोषी नहीं है। जब एकबार गांव से निकलने के बाद हम दुबारा गांव झांकने ही नहीं जाएंगे और छोटी-मोटी जरूरतों के लिए शहर का मुंह तांकेंगे तो सरकार और सरकारी अमला वहां झांकने की जहमत क्यों उठाएगा। सरकार का पता है कि जागरूक और पढ़ा-लिखा तबका या यूं कहा जाए कि अपने अधिकार की आवाज उठाने वाला कोई गाँव में है ही नहीं तो फिर किस का डर। शहर में सुविधाओं का जमावड़ा होने को एक बड़ा कारण यह है कि शहर की आबादी अपने अधिकारों के प्रति जागरूक है और थोड़ी सी असुविधा और परेशानी आने पर अपने अधिकारों के लिए सड़क पर संघर्ष के लिए उतर आती है तो व्यवस्था हिलने लगती है और आनन-फानन में सारी सुविधाएं मुहैया करवा दी जाती हैं। वहीं गांव देहात में जात-पात की ओछी और घटिया राजनीति, नषे की बढ़ती प्रवृत्ति और अपराध की ओर बढ़ते कदमों ने गांवों को बदनाम कर दिया है। ऐसा नहीं है कि गांवों में प्रतिभा, ज्ञान, कौशल और नेतृत्व का अभाव है लेकिन चालाक, भ्रष्ट और बेईमान तथाकथित नेता भोले-भाले ग्रामीणों को बहला-फुसलाकर अपना स्वार्थ सिद्व कर लेते हैं। हम सब ने मिलकर गांव का पोषण किया है। गांव का दर्जा मां के बराबर है क्योंकि इस धरती पर एक मां ही है जो सब कुछ लुटाकर और सहकर भी अपने बच्चों की भलाई और कल्याण के लिए ही सोचती रहती है। एक करूणामयी और प्रेम से भरी मां की भांति गांव ने शहरों को पैदा किया है, उन्हें पाला-पोसा है और उसकी अनगिनत कमियों को अपने में समेटकर आगे बढ़ने और फैलने का अवसर प्रदान किया है।
पिछले लगभग दो दशकों में देश में शहरीकरण की प्रवृत्ति ने जोर पकड़ा है। महानगरों और नगरों के आस-पास दस या बीस किलोमीटर के दायरे में आने वाले गांव शहरी विकास की भेंट चढ़ चुके हैं। देश में गांवों की संख्या लगातार गिर रही है और शहरों की संख्या में इजाफा हो रहा है। प्रथम जनगणना 1951 के समय देश में दस लाख से अधिक आबादी वाले नगरों की संख्या 4 थी जो 2001 की जनगणना के समय बढ़कर 35 हो गई थी। फिलाहल 2011 की जनगणना के विस्तृत आंकड़ें प्रकाषित नहीं हुए हैं अनुमान के अनुसार दस लाख से अधिक आबादी वाले नगरों की संख्या एक सौ का आंकड़ा पार कर गई होगी। भारत के शहरों का आकार बढ़ता जा रहा है। आज विश्व में शहरी आबादी की दृष्टि से भारत का चैथा स्थान है। संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के अनुसार वर्ष 2000 में विश्व व की पूरी जनसंख्या के 47 प्रतिशत लोग शहरों में रहते थे, एशिया की शहरी जनसंख्या प्रतिशत 36.7 प्रतिशत था। भारत एशिया का महत्वूपर्ण व आबादी के हिसाब से बड़ा देश है। कहां से आएंगे इतनी आबादी के लिए आवास और परिवहन के इतने साधन ? कहां से ला पाएंगे हम प्रचुर मात्रा में पेयजल? जनसंख्या के आंकड़ें प्रदर्षित करते हैं कि प्रथम श्रेणी के शहरों में दशकीय वृद्वि पिछली सदी से लगभग 9 गुना पाई गई जबकि उनकी संख्या में वृद्वि 13 गुना हुई और जनसंख्या का भाग लगभग 2.6 गुना हो गया। अन्य विकासशील राष्ट्रों की तरह भारत भी वृहद् नगरीकरण के दौर से गुजर रहा है। गत शताब्दी के प्रथम चार दशकों में नगरीय जनसंख्या का प्रतिशत 12 प्रतिषत से कम था तब से नगरीकरण का स्तर उत्तरोत्तर बढ़ा हैं। 1951 में 17.2 प्रतिशत से बढ़कर यह 2001 में 25.72 हो गया हैं वास्तव में नगरीय जनसंख्या सर्वाधिक 1961 से 2001 के मध्य बढ़ी हैं। इस मध्य नगरीय जनसंख्या 790 लाख से 2171.8 लाख हो गई है, जो कि विश्व में सर्वाधिक हैं।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से बड़े शहरों का बहुत ज्यादा विस्तार हुआ है। इसका कारण है जनसंख्या का बड़े पैमाने पर गांवों से शहरों की ओर पलायन। बीसवीं शताब्दी के आरंभ में भारत की आबादी करीब 23 करोड़ 84 लाख थी जो बढ़कर इक्कीसवीं शताब्दी में एक अरब 2 करोड़ 80 लाख पहंुच गई है। परिणाम यह हुआ कि शहरी आबादी में वृद्धि का परिणाम यह हुआ कि 1951 में जहां देश में दस लाख से अधिक आबादी वाले शहरों की संख्या मात्र 4 थी, वहीं 2001 में ऐसे नगरों की संख्या 35 हो गई। शहरी प्रशासन की हमारी एक प्रमुख विफलता यह रही कि हम पेयजल सप्लाई, सफाई, आवास और समाज सेवा जैसी बुनियादी सेवाओं की उपलब्धता पर ध्यान नहीं दे पाए और शहरी आबादी के बढ़ रहे भाग को ये सुविधाएं उपलब्ध नहीं करा पाए। मोटरगाडि़यों की निरंतर बढ़ रही संख्या को देखते हुए सड़के छोटी पड़ गई और उनकी गुणवत्ता नाकाफी हो गई। भारत के शहरों का विकास चीन सहित दुनिया के सभी देशो के शहरों के मुकाबले बहुत तेजी से हो रहा है। उदाहरणार्थ 1951 में मुंबई की जनसंख्या 28 लाख थी और यह 17वां सबसे बड़ा शहर था। आज यह दुनिया का छठा सबसे बड़ा शहर है और उसकी आबादी 1.22 करोड़ है। अगले 10 वर्षों मंे इसके टोकियों के बाद दुनिया के सबसे बड़े शहर का दर्जा प्राप्त कर लेने की संभावना है। साथ ही 2015 तक भारत के तीन और शहर कोलकात्ता, दिल्ली और हैदराबाद के दुनिया के 30 सबसे अधिक आबादी वाले शहर बन जाने की उम्मीद हैं मुंबई, कोलकत्ता और दिल्ली बड़े 12 शहरो में शामिल हो जाएंगे।
किसी जमाने में दुनियाभर में भारत की पहचान गांवों के देश मंे रूप में होती थी। और ये कहा जाता था कि भारत की आत्मा गांवों में बसती है। शायद देश की आत्मा तो आज भी गांवों में ही मंडराती है लेकिन शरीर से वो शहर के रंग-ढंग में ढल चुकी है। बड़ी तेजी से गांव शहर की चमक-दमक में गुम हुए जा रहे हंै। गांव और शहर दोनों में गुण और दोष का मिलाजुला स्वरूप देखने को मिलता है लेकिन जो आनंद, स्वच्छंदता, खुलापन, अपनापन और सौंधापन गांव के वातावरण और गांव में हो वो शहर में सैंकड़ों यत्न और लाखों खर्च करने पर भी आपको मिलेगा हीं। शहर से किसी को परहेज नहीं है लेकिन गांव की कब्र खोदकर शहरों का विस्तार और विकास किसी भी कीमत पर बर्दाषत नहीं किया जा सकता है। जिस तेजी से देश में शहरों का विस्तार और नये शहरों की पैदाईश हो रही है वो देश की आत्मा अर्थात गांव के प्राण लील रहा है। और जब आत्मा ही पेश नहीं रहेगी तो काया मिट्टी मंे बदल जाएगी। शहरों में रचने-बसने मंे कोई बुराई नहीं है लेकिन अपनी मिट्टी और गांव से परहेज भी ठीक नहीं है........और ऐसा भी नहीं है कि गांव की मिट्टी आपको अपनी ओर खींचती नहीं है लेकिन गवई मन पर शहरी दिल भारी पड़ जाता है।


