शहादते हुसैन और आज के मुसलमान
शहादते हुसैन और आज के मुसलमान
पैग़ामे करबला जुलेखा जुबीन मोहहर्रम का महिना शुरू हो चुका है। हिन्दोस्तानी मुसलमान पूरे जोशो खरोश के साथ मुहर्रम का जश्न मनाने में जुटे हुए हैं। कहीं तक़रीरों का इंतज़ाम है तो कहीं क़ुरआन ख़्वानी, दुरूदख़्वानी जारी है। कहीं लंगरे आम है तो कहीं 40 दिनों का मातम। कहीं ढोल ताशों की धमार्चौकड़ी के साथ मुहहर्रम का जश्न मनाने में जुटे हुए हैं।
लगातार तरक्की कर रहे भारतीय समाज में मज़हबी हाकिमों की जकड़बंदी के साथ ही उनकी गिरफ़्त में पहुँच रहे लोगों की तादाद लगातार बढ़ती जा रही है। और इसके साथ ही सियासत में ज़ाहिलों (अज्ञानियों) और जुर्मपसंद ताकतों का दाखिल भी बढ़ता जा रहा है। छोटे से छोटे मौकों पर भी मज़हबी ताकत का भारी मुज़ाहिरा (प्रदर्शन) करने का चलन बढ़ता जा रहा है। जिससे गुंडागर्दी फलने फूलने लगी है और वोट के लालच में राजनैतिक पार्टियाँ (सरकारें) इन गै़र कानूनियों, गै़र इंसानों की तरफ़ से अपनी आँखें मूँदने को मजबूर हैं।
ऐसे वक्त में ये जानना ज़रूरी है कि 1434 बरस पहले घटित करबला की जंग का मकसद क्या था? वे कौन से हालात थे जिनके ऐवज़ करबला की तपती धरा पे तीन दिनों के भूखे प्यासी 72 लोग जन बच्चो समेत कत्ल किए गए, जबकि उनमें औरतें और बच्चे बड़ी तादाद में थे?
ये सब जानते हैं कि करबला में कत्ल किए गए हुए...


