इन्कलाब की धार विचारों की सान पर ही तेज होती है
मधुवन दत्त चतुर्वेदी
भगत सिंह भारत की राष्ट्रीय क्रांति के ऐसे दैदीप्यमान नायक हैं जिनसे हमारे देश के नौजवान सतत प्रेरित होते रहेंगे। स्वतंत्रता के लिए वीरता पूर्वक संघर्ष करते हुए उन्होंने मातृ-भूमि पर अपना उत्सर्ग कर दिया। इसके लिए उन्हें नौजवान बस पूजते रहें और स्वयं को उनकी क्रन्तिकारी विचारधारा एवं आदर्शों से दूर रखें,यह प्रयास आज़ादी के बाद से ही उन शक्तियों का रहा है, जो वर्गीय शोषण को बनाये रखना चाहती हैं। चूँकि इस समय ऐसी शक्तियां अपने विद्रूपतम स्वरूप में देश की सत्ता पर काबिज हैं, भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लाल किले से अपने संबोधन में देश के नौजवानों को भगत सिंह की तरह का क्रान्ति मार्ग न अपनाने की सलाह देने का दुस्साहस कर दिया।
आरएसएस-बीजेपी और उनके आनुषांगिक संगठन भगत सिंह की अनदेखी करके तो देश के नौजवानों को संबोधित कर ही नहीं सकते। इसलिए वे भगत सिंह की पूजा करने का पाखण्ड करते हैं और उनके विचारों से नौजवानों को परिचित नहीं होने देते। अनीश्वरवाद और समाजवादी-क्रांति के प्रबल पक्षधर भगत सिंह उनके धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद के संकीर्ण और शोषण-कारी व्यवस्था के पोषक विचारों के साथ फिट हो ही नहीं सकते, वे यह जानते हैं। इस लिए भगत सिंह को नमन या पूजन की ऐसी हर बात जो उनकी विचारधारा पर चर्चा किये बिना की जा रही हो, उसी षड्यंत्र का चाहे अनचाहे हिस्सा है। खुद भगत सिंह के शब्दों में -"इन्कलाब की धार विचारों की सान पर ही तेज होती है।"