शहीदों की लिस्ट में एक भी बाभन-ठाकुर-बनिया-लाला नहीं !
शहीदों की लिस्ट में एक भी बाभन-ठाकुर-बनिया-लाला नहीं !
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ आजादी के पहले भी देशद्रोहियों का संघ था, जो अभी भी वैसा ही बना हुआ है
दलित हैं, मुसलमान हैं... मरने दो सालों को!!
ये मैं नहीं कह रहा, आपकी महान भारतीय सेना में बैठे बाभन ठाकुर कह और कर दोनों रहे हैं।
जातिवाद और फासीवाद भारतीय सेना में ठूंस-ठूंसकर भरा है। सबूत के तौर पर पिछले छह महीने में सियाचिन में शहीद जवानों की लिस्ट देख लीजिए। ऐसा क्या कारण रहा कि कोई बाभन-ठाकुर-बनिया-लाला शहीद नहीं हो पाया? क्या उनको देश से प्यार नहीं? जवाब साफ है कि उन्हें वाकई देश से प्यार नहीं।
शहीदों की लिस्ट में एक भी बाभन-ठाकुर-बनिया-लाला नहीं है। उनकी मुश्किल जगहों पर ड्यूटी ही नहीं लगाई जाती क्योंकि बड़े साहब की भौहों का आदेश रहता है। यहीं से वीके सिंह जैसे अंधे निकलते हैं जिन्हें सारा देश सीमा पर ही नजर आता है।
जातिवाद और फासीवाद से लबरेज ऐसे लोग आरएसएस की पहली पसंद होते हैं क्योंकि उन्हें दाहिने मुड़ की ट्रेनिंग नहीं देनी पड़ती। उन्हें अलग से नफरत का विष नहीं पिलाना पड़ता। उन्हें राष्ट्रवाद के नाम पर बकासुर नहीं बनाना पड़ता। उन्हें हत्याएं करनी नहीं सिखानी पड़ती। उन्हें चिल्लाना गला फाड़ना नहीं सिखाना पड़ता। ऐसे बैलों को देखकर संघियों की बांछे खिल जाती हैं और जब ऐसे बैल राजनीति में आते हैं तो उन्हें गजेंद्र चौहान जैसे में धर्मराज नजर आता है और रोहित वेमुला में पूरी दुनिया का अधर्म। मजबूरी में मुंह से बाबा साहब बोलते हैं लेकिन घर और पार्टी के अंदर बाबा साहब को क्या बोलते हैं, उसे लिखने का साहस मुझमें नहीं।
राजा और उसकी सेना की पूजा करना पुरानी बात हुई। इसी सेना में अब सैकड़ों ऐसे हैं जो कश्मीर से लेकर नॉर्थ ईस्ट तक हमारे ही टैक्स से खरीदे हथियार बेचते पकड़े जाते हैं। दुश्मन देश की जासूसी करते हैं, अपने ही देश की महिलाओं के साथ रोजाना बलात्कार करते हैं, अपने ही देश के बच्चों को गोली मारते हैं और ये सब करने के बाद आकर संघ में शामिल होकर भारत माता जिंदाबाद करते हैं, रोहित वेमुला मुर्दाबाद करते हैं। छात्रों को बेवजह पीटते हैं और कहते हैं कि दोबारा भी पीटेंगे और पीटने की निंदा कर देंगे।
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ आजादी के पहले भी देशद्रोहियों का संघ था, जो अभी भी वैसा ही बना हुआ है। तिरंगा तो इसलिए उठा लिया क्योंकि उसमें एक रंग भगवा है नहीं तो ये तो हमेशा से तिरंगे पर पेशाब करते आए हैं।
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राहुल पांडेय, युवा पत्रकार हैं। उनकी फेसबुक टाइमलाइन से साभार


