नई दिल्ली। जापान यात्रा के दौरान चीन के ऊपर की गई अप्रत्यक्ष टिप्पणी को चीन ने काफी हल्के में लेते हुए इसे मीडिया हाइप के लिए दिया गया वक्तव्य करार दिया है। चीन के प्रमुख अखबार ग्लोबल टाइम्स ने भारत-चीन-जापान संबंधों पर टिप्पणी करते हुए लिखा है- जापानी और पश्चिमी जनता की राय में मोदी का साफ इशारा चीन की तरफ था, हालांकि उन्होंने अपने संबोधन में उन्होंने चीन का नाम नहीं लिया। मोदी के वक्तव्य का ऐसा निहितार्थ इसलिए निकला क्योंकि मोदी भावनात्मक रूप से टोक्यो के अधिक निकट हैं। इसलिए शायद एक सच्चाई है कि उन्होंने चीन के खिलाफ कुछ राष्ट्रवादी भावनाओं को गले लगा लिया है।

अखबार लिखता है लेकिन एक बड़े देश की समझदारी, नीति और रणनीति उसके अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप बनती हैं। भारत के राष्ट्रीय हितों के रक्षक के रूप में, मोदी ने मीडिया प्रचार के लिए कुछ टिप्पणियां की हैं उन्होंने सीधे चीन का नाम लेने से परहेज किया है। अखबार आगे लिखता है कि चीन का जीडीपी भारत के जीडीपी से पाँच गुना है। उत्तर से सामरिक दबाव का सामना कर रहे बीजिंग और नई दिल्ली के बीच आपसी विश्वास को, बहाल करना एकत समस्या है क्योंकि दोनों के बीच एक अनसुलझे सीमा विवाद है। लेकिन भारत ने साबित कर दिया है कि वह एक स्वतंत्र विदेश नीति को प्रदर्शित करने वाला एक तर्कसंगत देश है। सीमा मुदों को द्विपक्षीय संबंधों पर अधिक तरजीह न देने के कारण भारत-चीन संबंध और मजबूत हुए हैं। भारत और चीन के बीच सकारात्मक संबंधों ने भारत और पाकिस्तान के बीच भी तालमेल के लिए स्थितियां पैदा कर दी हैं।

ग्लोबल टाइम्स के मुताबिक टोक्यो और नई दिल्ली के बीच बढ़ती घनिष्ठता दोनों देशों के लिए ज्यादा से ज्यादा मनोवैज्ञानिक आराम लाएगी। “क्या मोदी और आबे के बीच व्यक्तिगत मधुर संबंध भारत और चीन के बीच संबंधों पर असर डालेंगे?” पर अखबार लिखता है कुल मिलाकर जापान भारत से बहुत दूर है। आबे की इंडो प्रशांत अवधारणा भारतीयों को सहज बनाती है। यह दक्षिण एशिया है, जहां भारत को अपनी उपस्थिति दर्ज करानी है। चीन भारत का एक पड़ोसी है और शिंजो-मोदी संबंध इसे दूर नहीं कर सकते। भारत चीन संबंधों को जापान भारत दोस्ती से काउंटर बैलेंस नहीं किया जा सकता।

अखबार का कहना है कि चीन और भारत दोनों नए उभरते देश हैं और दोनों ब्रिक्स के सदस्य हैं और दोनों के हित बहुत आम हैं। कम से कम वर्तमान में भू राजनीतिक प्रतिस्पर्धा, दोनों देशों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात नहीं है। अखबार लिखता है चीन और भारत के संबंधों को स्थिर रहे हैं। चीनी राष्ट्रपति जी जिंगपिंग अगले महीने भारत की यात्रा पर जा रहे हैं और निकट भविष्य में चीनी नेता किसी राष्ट्र की यात्रा नहीं करेंगे तो वह जापान है। यदि जापान भारत पर केंद्रित एक संयुक्त मोर्चा बनाने का प्रयास करता है, यह बढ़ते बीजिंग का सामना करने की टोक्यो की चिंता से उत्पन्न एक पागल कल्पना होगी।

एक अन्य चीनी विश्लेषक लियु ज़ोंगई (Liu Zongyi) का कहना है कि आबे के मोदी के साथ निजी संबंध है और दोनों देशों में एक लोकतांत्रिक प्रणाली है। हालांकि, मोदी एक चतुर व्यापारी और राजनेता हैं। वह जानते हैं कि भारत के सबसे बड़े हित सुरक्षित करने के लिए क्या करना है।

उधर चीन की रेलवे व निर्माण क्षेत्र की बड़ी कंपनी तीस्जू सिविल इंजीनियरिंग कंपनी China Tiesiju Civil Engineering Group Co., Ltd., ने कहा है कि वह इंफ्रास्ट्रक्चर व बुलेट ट्रेन निर्माण में जापान से ज्यादा विशेषज्ञ हैं। कंपनी ने आशा व्यक्त की है कि वह इस क्षेत्र में प्रधानमंत्री मोदी के साथ कार्य करेगी।

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We are very confident that we are stronger than them (Japan) in field of railways: Zhou Fangyuan pic.twitter.com/wGkrlwg8C6

— ANI (@ANI_news) September 2, 2014
Chinese Govt views India as a close neighbor, want to work together: Zhou Fangyuan (Internatnl Dir., China railway no.4, engineering group)

— ANI (@ANI_news) September 2, 2014