शिक्षा - 70 वर्ष में चले ढाई कोस
शिक्षा - 70 वर्ष में चले ढाई कोस
मानव विकास सूचकांक में भारत 130 वें स्थान पर है।
जब मानव विकास की बात होती है तो मूलभूत तत्व के रूप में शिक्षा को देखा जाता है। लेकिन 70 वर्ष में शिक्षा के क्षेत्र में भारत कहा तक पंहुचा जब इसपर चर्चा होती है तो काफी दुखद चित्र उभर कर सामने आता है। भारत के साथ ही 1948 में आजाद हुआ चीन और इस्लाइल हमसे कोसो आगे दिखता है। ऐसा नहीं है कि हमनें प्रयास नहीं किया है, लेकिन लाल फीताशाही, सामाजिक आर्थिक विविधता और समुचित नीतियों के आभाव में हम अपने मंजिल तक नहीं पहुच सके।
बुनियादी शिक्षा को मज़बूत बनाने और उसको तालीम से जोड़ने का सपना राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का था सरकार ने प्रथम पंचवर्षीय योजना में ही देश के कई हिस्सों में बुनियादी विद्यालय की स्थापना भी की लेकिन समय के साथ अंक पिपासु शिक्षा पद्धति ने इसकी प्रासंगिकता को काफी कम कर दिया शिक्षा में एक साथ दो प्रवृत्तियां देखने को मिल रहीं हैं।
एक तरफ शानदार नंबर लानेवाले छात्रों की संख्या बढ़ रही है, दूसरी ओर पढ़ाई का स्तर गिर रहा है।
परीक्षाओं में 100 फीसद नंबर लानेवालों की संख्या बढ़ती जा रही है. यह भ्रम 2012 के पीसा टेस्ट में टूट गया।
विकसित देशों की संस्था ओइसीडी हर साल प्रोग्राम फॉर इंटरनेशनल स्टूडेंट असेसमेंट (पीसा) के नाम से एक परीक्षण करती है. दो घंटे की इस परीक्षा में दुनियाभर के देशों के तकरीबन पांच लाख बच्चे शामिल होते हैं. 2012 में भारत और चीन के शंघाई प्रांत के बच्चे इस परीक्षा में पहली बार शामिल हुए. चीनी बच्चे पढ़ाई, गणित और विज्ञान तीनों परीक्षणों में नंबर एक पर रहे और भारत के बच्चे 72वें स्थान पर रहे, जबकि कुल 73 देश ही उसमें शामिल हुए थे.
शिक्षा-केंद्रित भारतीय एनजीओ ‘प्रथम’ की सालाना रिपोर्ट ‘असर’ से पता लगता है कि शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीइ) लागू होने के बाद स्कूलों की संख्या और उनमें दाखिले में वृद्धि हुई है, पर पढ़ाई-लिखाई की गुणवत्ता गिरी है.
सर्वे के अनुसार सरकारी स्कूलों पर आम जनता का विश्वास घट रहा है.
आरटीइ का सकारात्मक असर है कि 6-14 वर्ष उम्र वर्ग के बच्चों के स्कूल में दाखिले में भारी इजाफा हुआ है, पर बच्चे स्कूलों में साधारण कौशल भी नहीं सीख पा रहे हैं.
जरूरी है कि पहले हम अपनी वर्तमान शिक्षा नीति के दोषों पर विचार करें, फिर आगे बढ़ें.
दुनिया भर की बातों पर लोग खूब बोलते हैं. शिक्षा पर बोलनेवाला कोई नहीं है. जबकि, सामाजिक बदलाव का सबसे बड़ा जरिया शिक्षा है और सामाजिक भेदभाव का बड़ा जरिया भी शिक्षा ही है. हमें इस पर बात करनी चाहिए.
उच्च शिक्षा में भारत की हालत और भी दुखद जान पड़ती है द टाइम्स विश्व यूनिवर्सिटीज़ रैंकिंग (2013) के अनुसार अमरीका का केलिफ़ोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नॉलॉजी चोटी पर है जबकि भारत के पंजाब विश्वविद्यालय का स्थान विश्व में 226 वाँ है.
कभी-कभी तथ्य अपनी कहानी ख़ुद कहती हैं. इसलिए तथ्यों की ही बात की जाए.
बीबीसी के रिपोर्ट के अनुसार स्कूल की पढ़ाई करने वाले नौ छात्रों में से एक ही कॉलेज पहुँच पाता है. भारत में उच्च शिक्षा के लिए रजिस्ट्रेशन कराने वाले छात्रों का अनुपात दुनिया में सबसे कम यानी सिर्फ़ 11 फ़ीसदी है. अमरीका में ये अनुपात 83 फ़ीसदी है. इस अनुपात को 15 फ़ीसदी तक ले जाने के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए भारत को 2,26,410 करोड़ रुपए का निवेश करना होगा जबकि 11वीं योजना में इसके लिए सिर्फ़ 77,933 करोड़ रुपए का ही प्रावधान किया गया था.
हाल ही में नैसकॉम और मैकिन्से के शोध के अनुसार मानविकी में 10 में से एक और इंजीनियरिंग में डिग्री ले चुके चार में से एक भारतीय छात्र ही नौकरी पाने के योग्य हैं.
भारत के पास दुनिया की सबसे बड़े तकनीकी और वैज्ञानिक मानव शक्ति का ज़ख़ीरा है इस दावे की यहीं हवा निकल जाती है.
राष्ट्रीय मूल्यांकन और प्रत्यायन परिषद का शोध बताता है कि भारत के 90 फ़ीसदी कॉलेजों और 70 फ़ीसदी विश्वविद्यालयों का स्तर बहुत कमज़ोर है.
आईआईटी मुंबई जैसे शिक्षण संस्थान भी वैश्विक स्तर पर जगह नहीं बना पाते.
भारतीय शिक्षण संस्थाओं में शिक्षकों की कमी का आलम ये है कि आईआईटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में भी 15 से 25 फ़ीसदी शिक्षकों की कमी है.
भारतीय विश्वविद्यालय औसतन हर पांचवें से दसवें वर्ष में अपना पाठ्यक्रम बदलते हैं लेकिन तब भी ये मूल उद्देश्य को पूरा करने में विफल रहते हैं.
अच्छे शिक्षण संस्थानों की कमी की वजह से अच्छे कॉलेजों में प्रवेश पाने के लिए कट ऑफ़ प्रतिशत असामान्य हद तक बढ़ जाता है.
इस साल श्रीराम कॉलेज ऑफ़ कामर्स के बी कॉम ऑनर्स कोर्स में दाखिला लेने के लिए कट ऑफ़ 99 फ़ीसदी था.
अध्ययन बताता है कि सेकेंड्री स्कूल में अच्छे अंक लाने के दबाव से छात्रों में आत्महत्या करने की प्रवृत्ति बहुत तेज़ी से बढ़ रही है.
भारतीय छात्र विदेशी विश्वविद्यालयों में पढ़ने के लिए हर साल सात अरब डॉलर यानी करीब 43 हज़ार करोड़ रुपए ख़र्च करते हैं क्योंकि भारतीय विश्वविद्यालयों में पढ़ाई का स्तर घटिया है।
15 साल पहले मैनेजमेंट गुरु पीटर ड्रकर ने एलान किया था, "आने वाले दिनों में ज्ञान का समाज दुनिया के किसी भी समाज से ज़्यादा प्रतिस्पर्धात्मक समाज बन जाएगा. दुनिया में गरीब देश शायद समाप्त हो जाएं लेकिन किसी देश की समृद्धि का स्तर इस बात से आंका जाएगा कि वहाँ की शिक्षा का स्तर किस तरह का है."
भारत में शिक्षा क्षेत्र की बड़ी शख़्सियत और ज्ञान आयोग के प्रमुख सैम पित्रोदा का भी कहना है, "आजकल वैश्विक अर्थव्यवस्था, विकास, धन उत्पत्ति और संपन्नता की संचालक शक्ति सिर्फ़ शिक्षा को ही कहा जा सकता है."
इंफ़ोसिस के प्रमुख नारायण मूर्ति ध्यान दिलाते हैं कि अपनी शिक्षा प्रणाली की बदौलत ही अमरीका ने सेमी कंडक्टर, सूचना तकनीक और बायोटेक्नॉलॉजी के क्षेत्र में इतनी तरक्की की है. इस सबके पीछे वहाँ के विश्वविद्यालयों में किए गए शोध का बहुत बड़ा हाथ है.
दुनिया भर में विज्ञान और इंजीनियरिंग के क्षेत्र में हुए शोध में से एक तिहाई अमरीका में होते हैं. इसके ठीक विपरीत भारत से सिर्फ़ 3 फ़ीसदी शोध पत्र ही प्रकाशित हो पाते हैं.
भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण के प्रमुख नंदन नीलेकणी कहते हैं कि भारत को अपने डेमोग्राफ़िक लाभांश का फ़ायदा उठाना चाहिए.
मुद्दा यह है कि तमाम समस्याओं के बीच सुधार की प्रकिया क्या हो सकती है, निःसंदेह शिक्षा के बजट को वरीयता देनी होगी,अगर संभब हो तो अलग शिक्षा बजट का भी प्रावधान करने का प्रयास होना चाहिये, साथ ही साथ उसके खर्च की मॉनिटरिंग करनी होगी, गुणवक्ता के व्यापकता के मर्म को समझना होगा, शिक्षकों के नियुक्ति प्रक्रिया को पेचीदा ना बना कर उनके योग्यता को आधार बनाना होगा। सरकारी शिक्षण संस्थानों के प्रमुख की नियुक्ती प्रक्रिया से राजनीतिक सोच को दूर रखना होगा।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग जैसे स्वायत्त संस्थानों के कार्य का लेखा- जोखा प्रतिवर्ष जनता के सामने रखने की बाध्यता बनानी होगी।
भारत में 1968 और 1986 में शिक्षा नीति आयी उसके भी सभी पहलुओं को अब तक नहीं लागू किया जा सका है।
जरूरी है तमाम विषमताओं को ध्यान में रखकर एक स्वीकार्य नीति बनाने की जिसमे प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक के वैश्विक माप- दंड पर खड़े होने लायक गुण हो और उसे सख्ती के साथ पालन की जानी चाहिये। भारत प्राचीन काल से रिसर्च का केंद्र रहा है वर्तमान व्यवस्था में भी इसको बढ़ाने की जरुरत है।
21वीं सदी की उच्च शिक्षा को तब तक स्तरीय नहीं बनाया जा सकता जब तक भारत की स्कूली शिक्षा 19वीं सदी में विचरण कर रही हो.
सचिन झा शेखर
छात्र भारतीय जनसंचार संस्थान
नई दिल्ली


