शुद्ध रूप से राजनीतिक है याकूब मेमन को फांसी
शुद्ध रूप से राजनीतिक है याकूब मेमन को फांसी
राज्यसत्ता द्वारा याकूब मेमन को फांसी पर लटकाने की जल्दी अनायास नहीं है।
द्वारा - आर जगन्नाथन, अनुवाद – अवनीश कुमार
1993 के बंबई धमाकों में सजा पाए याकूब मेमन की संभावित फांसी के पूरे मामले में एक अजीब सी बू आ रही है। ज्ञात हो कि इन धमाकों की योजना याकूब के भाई टाइगर मेमन ने बनाई थी जो अब फरार है और माना जा रहा है कि इस समय वो पाकिस्तान में कहीं छुपा बैठा है।
धमाकों में याकूब मेमन की भूमिका संभवतः एक सहयोगी की थी। याकूब मुख्य रूप से आपराधिक षड़यंत्र का हिस्सा होने और धमाकों के लिए धन जुटाने के मामलों में अभियुक्त है। उसे अपराधी करार दिया गया है और सुप्रीम कोर्ट द्वारा मौत की सजा निश्चित कर दी गई है। केंद्र ने भी उसकी दया याचिका को खारिज कर दिया है। उसने एक अंतिम प्रयास के तौर पर अपने मृत्युदंड की सजा के खिलाफ एक समीक्षा याचिका दाखिल की है। जिन 11 लोगों को मौत की सजा सुनाई गई थी उनमें से 10 लोगों की सजा को उम्रकैद में बदल दिया गया है और सिर्फ याकूब ही ऐसा है जिसकी जल्लाद का मुंह देखने की तारीख तय की गई है। अगर सुप्रीम कोर्ट इसमें हस्तक्षेप नहीं करता है तो महाराष्ट्र सरकार संभवतः 30 जुलाई को याकूब को फांसी पर लटका देगी।
मेमन की फांसी को रोके जाने की जरूरत है। इस फैसले से जो बू आ रही है वह ये है कि वो कौन सी वजह से जो सिर्फ याकूब के ही मामले में “कानून को अपना काम करने” के लिए प्रोत्साहित कर रही है। ये वजह इसे न्यायिक की बजाए राजनीतिक मामला बना देती है। इसका यह मतलब नहीं है कि उसे फांसी दिए जाने की जरूरत नहीं है- मैं आतंकवाद जैसे मामलों में मृत्युदंड का विरोध नहीं करता – लेकिन इस मामले में अकेले सिर्फ उसे फांसी दिए जाने का मामला इसे एक राजनीतिक फैसला बना देगा।
देखते हैं कि आतंकवाद और राजनीतिक हत्याओं के मामले में फांसी की सजाओं के मामले में अब तक क्या हुआ है -
अजमल कसाब, जो कि मुंबई पर हमला करने वाले दस हत्यारों में से एक था और जिसको 26/11 के मुंबई हमलों में दोषी ठहराया गया था, को नवंबर 2012 में फांसी दे दी गई। इनको पाकिस्तान की आईएसआई और लश्कर-ए-तैय्यबा ने मुंबई में निर्दोष लोगों की हत्याएं करने ने के लिए भेजा था। फांसी के राजनीतिक मकसद का अंदाजा उसके समय से लगाया जा सकता है। गुजरात के चुनाव दिसंबर 2012 में होने थे और गृहमंत्री सुशीलकुमार शिंदे ये दिखाना चाहते थे कि आतंकवाद जैसे मामलों में यूपीए सरकार नरेंद्र मोदी के मुकाबले अधिक कठोरता से पेश आएगी। व्यापक रूप से यह अनुमान लगाया गया था कि अगर मोदी गुजरात में जीत गए तो वे 2014 में कांग्रेस के लिए एक राष्ट्रीय चुनौती बनकर उभरेंगे।
जब कसाब की फांसी कांग्रेस को गुजरात में राजनीतिक रूप से कोई मदद नहीं कर पाई और मोदी के उभार को नहीं रोक पाई तो तीन महीने बाद 2001 में संसद पर हमलों के दोषी अफजल गुरू को फांसी पर लटका दिया गया। इसे एक साहसिक फैसला कहने की बजाए एक कायराना फैसला कहना ज्यादा उचित होगा क्योंकि अफजल को बिना उसके परिवार वालों को सूचित किए ही फांसी पर लटका दिया गया था। आप सच्चे तौर पर साहसी नहीं कहे जा सकते अगर आपमें इतनी भी हिम्मत नहीं है कि अभियुक्त को फांसी देने से पहले उसके घरवालों को सूचना दे सकें। यहां फिर से इस फांसी का मंतव्य मोदी के मुकाबले टफ मैन की तस्वीर कायम करना था। लेकिन इन सब से सिर्फ कांग्रेस की कमजोरी ही उजागर हुई।
लेकिन अन्य आतंकवादी भी हैं जिनके बड़े अपराध के बावजूद अभी तक फांसी पर नहीं लटकाया गया है। उनके अपराध भी कसाब या गुरू जैसे ही भयंकर हैं। बलवंत सिंह राजोआना, जिसे पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या के मामले में फांसी की सजा हुई है, अब भी फांसी के फंदे से दूर है। कारण – पंजाब विधान सभा और प्रशासन ने फांसी को रोकने के लिए राजनीतिक दबाव का इस्तेमाल किया।
राजीव गांधी की हत्या की योजना रचने के तीन अभियुक्त – संथन, मुरुगन और पेरारीवलन- की फांसी की सजा भी तमिलनाडु विधान सभा द्वारा क्षमा किए जाने के अनुरोध के बाद हाईकोर्ट द्वारा रोक लगा दी गई है। सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2014 में इनकी फांसी की सजा को बदलकर उम्रकैद में इस याचिका पर बदल दिया था कि केंद्र ने इनकी दया याचिका को बहुत लंबे संमय तक लटकाए रखा। तमिलनाडु सरकार ने और तत्परता दिखाते हुए अगले ही दिन उन्हें रिहा करने का फैसला ले लिया ताकि उससे राजनीतिक फायदा लिया जा सके। सुप्रीम कोर्ट में फिर से इस राजनीतिक कृत्य को रोकने के लिए याचिका डाली गई।
उन मासूम आंखों के अलावा यह सर्वविदित है कि जहां हत्यारा या आतंकवादी मजबूत राजनीतिक पकड़ रखता है, न ही केंद्र और न ही न्यायपालिका इतना साहस जुटा पाते हैं कि निष्पक्ष न्याय की हिम्मत दिखा पाएं।
अब ध्यान देने की बात है कैसे वही केंद्र, राज्य और अदालतें कानून के पालन के लिए प्रतिबद्ध दिखती हैं जब हत्यारों का एक अन्य वर्ग – अजमल कसाब, अफजल गुरू और अब शायद याकूब मेमन - का मामला आता है। मुसलमानों के मामले में यही लगता है कि राजनीतिक समर्थन के अभाव में ऐसा हो रहा है।
याकूब मेमन मृत्युदंड का भागी हो सकता है पर बलवंत सिंह राजोआना और राजीव गांधी के तीन हत्यारों को फांसी पर लटकाने के पहले नहीं। न्याय तब तक नहीं हो सकता या होते हुए दिख सकता है जब तक कि न्याय की प्रतिमूर्ति यह नहीं देख लेती कि किसे स्वीकोरोक्ति मिलने से पहले ही फांसी पर लटका दिया गया। याकूब मेमन की फांसी भी इसी तर्क पर या तो रोकी जानी चाहिए या फिर बदली जानी चाहिए। मृत्युदंड के अच्छे या बुरे होने का सवाल अभी मुद्दा नहीं है।
Yakub Memon may deserve the death penalty, but not before it is implemented for Balwant Singh Rajaona and Rajiv’s three assassins. Justice cannot be delivered – or seen to be done - if the lady with the scales and blindfold checks to see who is being sentenced before giving the nod. Yakub Memon’s hanging needs to be stayed or commuted for this simple reason. The larger question of whether the death penalty is good or bad is not the issue.
अंग्रेजी में मूल लेख http://www.firstpost.com/india/states-eagerness-hang-yakub-memon-not-quite-pass-smell-test-2345382.html
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