शेर का बच्चा अपनी पहचान पा लेने के बाद कहीं भेड़ के रेवड़ पर तो नहीं झपट रहा ?
शेर का बच्चा अपनी पहचान पा लेने के बाद कहीं भेड़ के रेवड़ पर तो नहीं झपट रहा ?
मोदी और भागवत की जुगलबन्दी
सुन्दर लोहिया
दशहरा के पर्व पर प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने आकाशवाणी पर अपने मन की बातें जनता से साझा करते हुए स्वामी विवेकानन्द के भाषण को उद्धृत करते हुए एक कहानी का उल्लेख किया, जिसमें शेरनी का एक बच्चा अपनी मां से बिछुड़ कर भेड़ के रेवड़ में शामिल हो जाता है। भेड़ उसे अपने बच्चों की तरह दूध पिलाकर पालता है। बड़ा हो जाने पर उसकी आदतें तो भेड़ के बच्चों जैसी हो जाती हैं लेकिन शक्ल शेर की ही रहती है। एक दिन एक शेर ने उसे देखा तो उसे लगा कि तो शेर है जो भेड़ के झुण्ड में रहकर भेड़ जैसा हो गया है। वह उसे बताता है कि ‘ तुम शेर हो लेकिन वह नहीं मानता। लाचार शेर उसे एक तालाब के किनारे ले जाता है और उसके पानी में उसे झांकने के लिए कह कर बताता है कि उन दोनों की शक्ल एक जैसी है इसलिए तुम भी शेर हो। वह असंमजस में था कि दूसरे शेर ने जा़ेर से दहाड़ उठा जिसे सुनकर शेर के बच्चा भी दहाड़ने लगा। इस कहानी को प्रधानमन्त्री ने आत्म विश्वास खो चुके समाज द्वारा उसे फिर से हासिल कर लेने का संदेश देने के लिए किया है।
लेकिन सवाल यह है कि इस तरह से आत्मविश्वास अर्जित करने के बाद वह शेर क्या अपना दूध पिलाने वाली भेड़ के समूह में गया ? क्या उसने उस झुण्ड की भेड़ों का शिकार करना छोड़ दिया ? ये सवाल इस लिए ज़रुरी हैं क्योंकि इसी अवसर पर स्वयंसेवक संघ के प्रमुख भागवत का राष्ट्र के नाम पहले सम्बोधन में देश में रहने वालों को भारत माता की संतान मानते हुए समानता के हकदार बता रहे थे तो उसी समय अखबार में भाजपा शासित मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में एक एंग्लोइण्डियन के साथ हिन्दू लड़की के साथ आर्य समाज मंदिर में विवाह को लेकर संघपरिवार के घटकों द्वारा ‘लवजिहाद ’ के नाम पर बखेड़ा खड़ा किया जा रहा था।
मुझे लगा कि शेर का बच्चा अपनी पहचान पा लेने के बाद कहीं भेड़ के रेवड़ पर तो नहीं झपट रहा ? मोदीजी तो इस कहानी के इस प्रकार के अंत से पता नहीं सहमत हों या न हों लेकिन सुधी पाठक मेरे तिभ्रम को दूर कर सकें तो उनका स्वागत है।


