संघ के मंच पर प्रणब मुखर्जी ने दी संघ को नसीहत, नहीं चलेगी हिंदू राष्ट्र की विघटनकारी अवधारणा, उनके भाषण की कुछ बड़ी बातें

नई दिल्ली, 08 जून। गुरुवार 7 जून की शाम को संघ के मंच पर पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने जो भाषण दिया उसका हर कोई अपने-अपने हिसाब से अर्थ निकाल रहा है। लेकिन सही अर्थों में प्रणब मुखर्जी ने संघ को जादू की झप्पी देते हुए नसीहत दी कि उसकी हिंदू राष्ट्र की विघटनकारी अवधारणा अस्वीकार्य है, भारत बहुलतावादी संस्कृति वाला देश है, यहां कोई भी अलगाववादी विचार जनता स्वीकार नहीं करेगी

आइए जानिए डॉ. प्रणब मुखर्जी के भाषण की कुछ बड़ी बातें, जो संघ के खिलाफ जाती हैं।


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हिंदू राष्ट्र की अवधारणा को अपनी विचारधारा का केंद्र मानने वाले संघ के मंच पर पूर्व राष्ट्रपति ने सरल शब्दों में भारत की बहुलतावादी संस्कृति का गुणगान किया।

आरएसएस स्वयंसेवकों को बताया कि राष्ट्र की आत्मा बहुलवाद और धर्मनिरपेक्षता में बसती है। प्रणब मुखर्जी ने प्रतिस्पर्धी हितों में संतुलन बनाने के लिए बातचीत का मार्ग अपनाने की जरूरत बताई।

उन्होंने साफ तौर पर कहा कि घृणा से राष्ट्रवाद कमजोर होता है और असहिष्णुता से राष्ट्र की पहचान क्षीण पड़ जाएगीष

उन्होंने कहा, 'सार्वजनिक संवाद में भिन्न मतों को स्वीकार किया जाना चाहिए।'

भारत एक अहिंसक समाज बने, तभी इसमें समाज के सभी तबकों की भूमिका को सुनिश्चित किया जा सकता है। इसमें शारीरिक और मौखिक, किसी भी प्रकार की हिंसा के लिये कोई जगह नहीं हो सकती है।

सांसद व प्रशासक के रूप में 50 साल के अपने राजनीतिक जीवन की कुछ सच्चाइयों को साझा करते हुए प्रणब ने कहा, 'मैंने महसूस किया है कि भारत बहुलतावाद और सहिष्णुता में बसता है।'

उन्होंने कहा, 'हमारे समाज की यह बहुलता सदियों से पैदा हुए विचारों से घुलमिल बनी है। धर्मनिरपेक्षता और समावेशन हमारे लिए विश्वास का विषय है। यह हमारी मिश्रित संस्कृति है जिससे हमारा एक राष्ट्र बना है।'

महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल के दर्शनों की याद दिलाते हुए पूर्व राष्ट्रपति ने कहा कि राष्ट्रीयता एक भाषा, एक धर्म और एक शत्रु का बोध नहीं कराती है।

पूर्व राष्ट्रपति ने कहा कि यह 1.3 अरब लोगों के शाश्वत एक सार्वभौमिकतावाद है जो अपने दैनिक जीवन में 122 भाषाओं और 1,600 बोलियों का इस्तेमाल करते हैं।


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वे सात प्रमुख धर्मो का पालन करते हैं और तीन प्रमुख नस्लों से आते हैं और एक व्यवस्था से जुड़े हैं।

उनका एक झंडा है। साथ ही भारतीयता उनकी एक पहचान है और उनका कोई शत्रु नहीं है। यही भारत को विविधता में एकता की पहचान दिलाता है।

(इनपुट्स मीडिया रिपोर्ट्स से)