“Why do I feel that some of ‘us’ are fighting between ourselves? We all know our ‘biggest enemy’. Can we all please concentrate on that?” – Gauri Lankesh.

संजीव ‘मजदूर’ झा.

हत्या जब संस्कृति का रूप धारण कर ले तो उसे सिर्फ विकृति कह कर टालना खतरनाक हो जाता है. गौरी लंकेश की हत्या न कोई पहली हत्या है और न आखिरी. हम सभी इस बात को जानते हुए भी सिर्फ निंदा करने के अलावा कोई ठोस कदम उठाने की स्थिति में नहीं हैं. चौकाने वाली बात यह है कि इस हत्या को सेलिब्रेट किया जा रहा है और उससे भी चौंकाने वाली बात है कि उन लोगों पर आश्चर्य व्यक्त किया जा रहा है जो इस प्रकरण में सेलिब्रेशन कर रहे हैं. यह आश्चर्य करना हमारे इतिहास बोध की फूहड़ता को भी दर्शाता है और इसके साथ ही हमारे अकर्मण्यता को भी.

सवाल यह है कि संघ द्वारा प्रशिक्षित और गुजरात दंगा तथा सोहराबुद्दीन मसले में फंसी मोदी सरकार से भारतीयों को यह अपेक्षा क्यों और कैसे बनी की हमने उन्हें अपना मुखिया चुन लिया? अब जब हमने ही चुना या आसानी से चुनने दिया तब इतना रोना-धोना क्यों?

इस व्यवस्था के समर्थकों से जब संवाद स्थापित करने की कोशिश होती है तब इस बात का आसानी से पता चल जाता है कि किसी खास अबूझ उम्र में कुछ ऐसा रसायन पिलाया गया है जिसका असर इनके अंदर से मिटता नहीं है.

अब हम जरा शाखा में जाने वाले लोगों के उम्र को देखें तो पता चल जाता है कि जिस उम्र में वे संघी बना दिए जाते हैं उस उम्र में प्रगतिशील नहीं बना जा सकता है. मसलन प्रगतिशीलता एक मानवीय पूंजी है जिसे हम स्वयं कमाते हैं, वहीं दूसरी ओर संघी होना एक विकृति है जिसे एक परंपरा के तहत हमारे अंदर पैदा होने के साथ ही इंजेक्ट किया जाता है. और यही कारण है कि देखते-देखते संघ की सोच हत्या को संस्कृति का रूप दे देती है. लेकिन यह भी कम आलोचना का विषय नहीं कि यह सब तब प्रगतिशील झुंड के होते हुए भी संभव हो जाता है.

स्वाभाविक सी बात है कि हार और जीत के इस राजनैतिक खेल में संघ की सोच और प्रगतिशीलता दोनों एक दूसरे को प्रभावित करती है. इसलिए प्रतिरोधी संगठनें जवाबी हमलों में उन्हीं तौर-तरीकों का इस्तेमाल करने लग जाते हैं जो तरीके संघ के कोख से पैदा हुई हैं.

कई लोग विरोध के स्वरुप को ठीक से पहचाने वगैर भी विरोध करते हैं और ऐसी स्थिति में वे स्वयं भी फासीवादी मूल्यों की भेंट चढ़ जाते हैं. ऐसे में सबसे प्रचलित अस्त्र का इस्तेमाल किया जाता है जिसमें सभी को संघी होने का सर्टिफिकेट धड़ल्ले से दिया जाने लगता है. उन्हें यह भी मालूम नहीं कि ऐसा करने से वे संघ विरोधी मानसिकता के संगठित होने की सारी संभावनाओं की हत्या कर देते हैं. इसलिए गौरी की हत्या सिर्फ़ संघ के विचार से नहीं बल्कि हमारी रूढ़ प्रवृति के कारणों से भी होती है.

मैं ऐसे कई लोगों को जानता हूँ जिसने कलम उठाया तो संघ के विरोध में उठाया, जिसने भाषण दिया तो संघ के विरोध में दिया, जिसने कोई कार्यक्रम किया तो जान जोखिम में डाल कर संघ के विरोध में किया, लेकिन अचानक कोई उठता है और एक झूठ-मूठ की भीड़ को इकठ्ठा कर उसे संघी होने का प्रमाण-पत्र घोषित रूप में दे देता है. अब तक जो अपने साहस मात्र की पूंजी से प्रतिरोध कर रहा था उसका साहस टूट जाता है और उस टूटे साहस को देखकर नए नस्लों की एक बड़ी आबादी का हौसला टूट जाता है. इसलिए संगठित होने की संभावनाएं टूट जाती है और यही कारण है कि कोई उठता है तो पनसारे, कलबुर्गी तथा गौरी की हत्या कर आसानी से निकल जाता है. रह जाता है तो सिर्फ हमारे पास फेसबुकिया विलाप जिसकी मात्र उपयोगिता इतनी भर रह गई है कि वह हमें अतीत की हत्या से ध्यान हटाकर नई हत्याओं पर संघी का प्रमाण-पत्र बांटने का अवसर भर देता है.

संवादहीनता के इस जड़ समाज में विश्वविद्यालयी विद्वानों ने तो अपनी प्रासंगिकता भी खो दी है और साथ ही उनकी जद में नए नस्लों की बड़ी तादाद वाले छात्रों की सोच को अलोकतांत्रिक बना कर रख दिया है. इतनी खतरनाक समस्या में हमारा विश्वविद्यालयी जमात फ़ेक आई. डी. के सहारे एक दूसरे को संघी घोषित करने में ही अपनी भूमिका जायज मानता है. ध्यान रहे अलोकतांत्रिक हथियारों का विरोध अलोकतांत्रिक व्यवस्था से नहीं किया जा सकता है.

हम गौरी की हत्या से भीतर तक दहले हैं और उससे भी अधिक दहले हैं उन मूर्खों से, जिनकी मूर्खता ने इन हत्याओं के विरोध की जमीन को तैयार होने से रोका हुआ है. लेकिन ये यह भूल गए हैं कि जब इतिहास इनसे पूछेगा कि—‘अरे मूर्ख, जब तुम्हारे पास योजना बनाने की ताकत थी तब तो तुमने अपनी सारी उर्जा अपने व्यक्तिगत लड़ाइयों में झोंक दिया फिर अब क्यों झूठा शोक मनाता है’? तब इनके पास कुछ नहीं होगा सिवाय मूक और अवाक होने के. इसलिए हे प्रतिरोधी संगठनों, रोज-रोज होने वाले इस हत्या के विरोध में लोगों को संगठित करना शुरू करो और ठीक से अध्ययन करो कि जिसकी हत्या हुई है उसने दुश्मनों से लड़ने के मद में क्या नसीहतें दी है.

तुम्हारा अध्ययन बता देगा कि तुम उस ओर तो नहीं हो, जहाँ से लड़ाईयाँ मजबूत होती हैं. इसलिए उनका अध्ययन करो वरना रहना तैयार तुम भी इतिहास-सम्मुख हत्यारों के बगल में चुप्पी साधे.