आज की कथित प्रगतिशीलता वास्तव में वैचारिक खाप पंचायत है, यह कहना है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समर्थक स्वतंत्र पत्रकार आशीष कुमार अंशु का। जुलाई 31 की शाम एवाने गालिब के सभागार में ‘राजनीति की सांस्कृतिक चेतना’ विषय पर हुई संगोष्ठी में भाजपा नेता तरुण विजय के साथ हुए व्यवहार से व्यथित आशीष कुमार अंशु की यह टिप्पणी
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पत्रकार मिलन के एक कार्यक्रम में मनोज रघुवंशी ने सर संघचालक के संबंध में एक टिप्पणी कर दी और यह बात वहां मौजूद कुछ प्रचारकों को पसंद नहीं आई, और उन्होंने मनोज रघुवंशी को अपनी बात पूरी नहीं करने दी। इस घटना की जानकारी जब एक मित्र से मिली तो आरएसएस को लेकर मेरी राय यही बनी कि यहां अपनी बात कहने की आजादी नहीं है। उन दिनों मैं सोचता था कि वामपंथ में इसकी गुंजाइश है। वे उदार लोग हैं और यदि आप उनकी आलोचना भी करो तो वे सुनते हैं। लेकिन बाद के कई अनुभव ऐसे सामने आए जिससे यह स्पष्ट हुआ कि मैं गलत था।
आज की कथित प्रगतिशीलता वास्तव में वैचारिक खाप पंचायत है। जहां यदि आप ऐसी कोई बात करें जो उनके एजेन्डे के खिलाफ जाती हो तो फौरन वे आपको घर निकाला दे देंगे। इस वैचारिक असहिष्णुता का एक उदाहरण जुलाई 31 की शाम एवाने गालिब के सभागार में ‘राजनीति की सांस्कृतिक चेतना’ विषय पर हुई संगोष्ठी में नजर आया। जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक और राज्य सभा सदस्य तरूण विजय पर हर तरफ से शाब्दिक हमले हो रहे थे लेकिन उन्हें अपनी बात रखने का अवसर नहीं दिया जा रहा था। जबकि आयोजकों को इस बात का विशेष तौर ख्याल रखना चाहिए था कि पूरे आयोजन में मंच पर अपनी विचारधारा के वे अकेले प्रतिनिधि थे। इस तरह वे सभागार में वैचारिक अल्पसंख्यक हुए। ऐसे में अल्पसंख्यकों के हक में बड़ी बड़ी तकरीर करने वाले विद्वानों को अपनी बात कहने का उन्हें अवसर उपलब्ध कराना ही चाहिए था।
दो साल पहले तक हर साल 31 जुलाई की तारीख दिल्ली में साहित्य प्रेमियों के लिए एक विशेष तारिख हुआ करती थी क्योंकि इस दिन ऐवाने गालिब में राजेन्द्र यादव मिलते थे। उनकी प्रवेश द्वार के पास वाली जगह अब खाली थी क्योंकि उनकी जगह कोई और नहीं ले सकता। राजेन्द्र यादव में यह खास बात थी कि वे आलोचक थे तो वे दूसरों की आलोचना सुनते भी थे। हंस का दरियागंज स्थित दफ्तर यादवजी के रहने तक इसलिए मेरे लिए खास हुआ करता था क्योंकि वहां राजेन्द्र यादव थे। अब जो राजेन्द्र यादव की परंपरा के वारीश हैं, वे उनकी परंपरा को बचा नहीं पाए।
निमंत्रण पत्र में जिन संजीव कुमार का नाम संचालक के तौर पर छपा था, वे मंच पर चढ़ कर लठैत की भूमिका में आ गए थे। संचालक किसी कार्यक्रम में सूत्रधार होता है लेकिन संजीव सूत्रधार कम वहां लाठी अधिक भांज रहे थे। अपने संचालन को प्रारंभ करते हुए उन्होंने कहा था कि सभागार मंे सिर्फ मुझसे ही लोग परिचित नहीं होंगे। बाकि सभी वक्ताआंे को परिचय की आवश्यकता नहीं है। लेकिन आयोजन खत्म होते-होते उन्होंने अपना परिचय दे दिया।
संजीव ने प्रश्न आमंत्रित किया। लेखिका रमणिक गुप्ता ने मंच पर चढ़कर सवाल की जगह तरुण विजय के वक्तव्य पर टिप्पणी की। उसके बाद कायदे से तरूण विजय को मौका मिलना चाहिए था, जवाब देने का। तरुण विजय वहां वक्ता के तौर पर बुलाए गए थे और अपनी विचारधारा के अकेले प्रतिनिधि थे। तरुण विजय रमणिकाजी के सवाल का जवाब देना चाहते थे लेकिन संजीव ने कहा कि यहां कौन टिप्पणी करेगा, कौन सवाल पूछेगा और कौन जवाब देगा, यह मैं तय करूंगा। मतलब साफ था कि संजीव वहां समन्वयक की जगह अपने विचारधारा के एक तानाशाह सिपाही की भूमिका में आ गए थे, जिन्हें लग रहा था कि उनकी विचारधारा खतरे में है। संगोष्ठी में अशोक वाजपेयी, पवन के वर्मा, एम के रैना, सुभाषिनी अली बोलीं। किसी के बोलने पर शोर नहीं हुआ लेकिन तरूण विजय के आते ही हर तरफ फुसफुसाहट तेज हो गई। कुछ लोग उनके वक्तव्य के बीच में हंस रहे थे, जिसे शिष्टता तो नहीं कहा जा सकता।
यदि आपने अपने बीच दूसरे विचार के व्यक्ति को बुलाया है तो उसे सुनने का संयम भी रखिए।
दूसरे वक्ताओं की बात करें तो अशोक वाजपेयी कुछ गम्भीर सवाल अपने वक्तव्य के पीछे छोड़ गए। कायदे से उनका जवाब तरूण विजय की तरफ से आना था, जो नहीं आया। पवन के वर्मा जदयू के प्रतिनिधि के नाते ही मानों आए हों। उनका भाषण वैचारिक से अधिक राजनीतिक था। एमके रैना जो तैयारी करके आए थे, वह नहीं बोले। उसकी जगह वे ना जाने क्या बोले? जो भी बोले उसका विषय से अधिक सरोकार ना था। सुभाषिणी अली को सुनना अच्छा लगा। उन्होंने इस बात के लिए अपने पूर्व वक्ताओं से असहमति जताई कि उन्होंने राजनीति और संस्कृति को बेहद संकुचित अर्थों में प्रस्तुत किया। सुभाषिणी ने गुलाब बाई के दही वाले नाटक की चर्चा की। किस प्रकार वे अपने नाटकों से समाज में अंग्रेजों के खिलाफ माहौल बनाती थी।
कुल मिलाकर हंस का यह आयोजन गलत संचालन की भेंट चढ़ गया। संजीव जैसे संचालकों को समझना चाहिए कि जिनसे वे सहमत हैं, उन्हें वे रोज सुनते हैं और उनके हां में हां मिलाते हैं। कभी कभी उन्हें भी सुनना चाहिए, जिनसे आप बिल्कुल सहमत नहीं हैं। यदि खिड़की दरवाजे खुले नहीं रखेंगे तो घर के अंदर की बदबू से आपका ही दम घुटेगा।
आशीष कुमार 'अंशु'