संजय रावत
( सामान्यत: मै कवि नहीं हूँ, पर अपने सम्पादकों और मालिकों से इतना त्रस्त था कि दिल की भड़ास मई दिवस 2011 को कुछ यूँ ही निकली जो कविता के रूप मे संग्रहित कर ली

-संजय रावत)

सलाम सम्पादक / मालिक !
तुम ज्ञानी हो, वाचक हो, अंन्तर्यामी, युगदृष्टा और पथप्रदर्शक भी।
तुम्हारे सम्पादन से जायज, नाजायज और प्रजातन्त्र परिभाषित होते हैं।
तुम दुनिया देखने का बेहतर नजरिया पेश करते हो।
लेकिन, हमारी संकुचित जुबान और फैले हुये कान बहुत कुछ वह देख लेते हैं।
जिसे तुम सम्पादित करने से हमेशा बचते हो
क्या तुम नहीं जानते...
कि हमारे बच्चों की आँखों के बीच पड़े स्याह गड्ढे
तुम्हारे बच्चों के गालों में सुर्खियाँ भरते हैं!
क्या तुम नहीं महसूसते...
कि एक अखबार से खड़े तुम्हारे सैंकड़ों कारोबारों से

हमारे पसीने की बू आती है !
दरअसल,
तुम ‘अर्थशास्त्र’ को विज्ञान और अपनी आस्थाओं को ‘दर्शन’ समझने लगे हो।
तुम देखना नहीं चाहते!
जिन सीढ़ियों को लाँघकर तुम शिखर तक पहुँचने की जुगत में हो।
वे हमारे कन्धों में गहरी धँस चुकी हैं।
लेकिन याद रखो सम्पादक...
पहाड़ पर रहने वाले अच्छी तरह जानते हैं कि
शिखर के बाद ढलान शुरू होती है....
तो संभलो सम्पादक, आगे ढलान है!