संविधान के खिलाफ युद्ध- संघ इसको किसी भी कीमत पर जीतना चाहता है
संविधान के खिलाफ युद्ध- संघ इसको किसी भी कीमत पर जीतना चाहता है
संविधान के खिलाफ युद्ध- संघ इसको किसी भी कीमत पर जीतना चाहता है
महेंद्र मिश्र
हिटलर के मंसूबों को मजबूत करने में तुष्टीकरण नीति की बड़ी भूमिका मानी जाती है।
यूरोप में शांति की स्थापना और दुनिया को युद्ध में जाने से बचाने के लिए ब्रिटिश पीएम चैम्बरलेन समेत यूरोप के दूसरे शासक शुरुआत में इसी का सहारा लिए थे। जिसके तहत यूरोप के ये नेता हिटलर के सामने कई बार झुकने के लिए मजबूर भी हुए।
इस कड़ी में ये लोग चेकोसल्वाक़िया के एक हिस्से को हिटलर को सौंपने तक के लिए राजी हो गए। नतीजतन 30 सितम्बर 1938 के म्युनिख समझौते के तहत चेकोसल्वाक़िया के सदेनलैंड इलाके को जर्मनी के हवाले कर दिया गया।
इसके बाद भी हिटलर की भूख शांत होने की जगह और बढ़ती गई। फिर उसने चेकोसल्वाक़िया के दूसरे हिस्सों को भी बारी-बारी से अपने कब्जे में ले लिया।
इस बीच यूरोप के नेता उसकी भूख के शांत होने का इंतजार करते रहे। लेकिन जिसने पूरी दुनिया को अपनी मुट्ठी में करने का सपना पाला हो, भला वो कहां रुकने वाला था। फिर जब उसने पोलैंड पर हमला कर दिया, तब यूरोप के नेताओं को अपनी गलती का अहसास हुआ। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
...और उसके बाद ही दूसरे विश्वयुद्ध की शुरुआत हो गई।
क्या आपको नहीं लगता कि भारत में भी आरएसएस और मोदी के प्रति विपक्ष का रवैया कुछ यूरोपीय नेताओं जैसा ही है ?
देश में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर साम्प्रदायिकता फ़ैलाने का मसला हो या फिर पाक के खिलाफ युद्धोन्माद का माहौल। ...या सर्वोच्च संवैधानिक संस्थाओं में धार्मिक व्यक्तियों के प्रवचन का मसला। विपक्ष हर जगह पर समर्पण करता दिख रहा है।
यह एक किस्म का तुष्टीकरण ही है। जिसमें बालू में सिर गड़ाकर तूफ़ान के गुजर जाने की गलतफहमी पाल ली गई है। यही कारण है कि हरियाणा विधानसभा में जैन मुनि तरुण सागर के प्रवचन का विरोध करने की जगह पूरे विपक्ष ने उसमें हिस्सा लिया।
यह अपने किस्म का म्यूनिख समझौता ही था।
लेकिन इससे बीजेपी-संघ की संविधान पर कब्जे की जंग नहीं खत्म होने जा रही है। उनका लक्ष्य साफ़ है। पहले लोकतान्त्रिक संस्थाओं को कमजोर करना है, फिर पूरे संविधान को पंगु बना देना है।
यह संविधान के खिलाफ एक किस्म का युद्ध है। और संघ इसको किसी भी कीमत पर जीतना चाहता है। ऐसा होने के बाद फिर हिन्दू राष्ट्र की स्थापना से लेकर ब्राह्मणवादी व्यवस्था के तहत समाज के संचालन का रास्ता साफ हो जाएगा। लेकिन इस पूरी कड़ी में विपक्ष उसके खिलाफ कहीं भी सीधा मोर्चा लेने का साहस नहीं कर पा रहा है। वह पूरी तरह से भयभीत है। कांग्रेस और आप समेत सभी क्षेत्रीय पार्टियां उसके सामने नतमस्तक हैं। और नतीजतन वैचारिक मोर्चे पर पिछलग्गू की भूमिका में हैं।
दरअसल इनके पास न तो कोई वैकल्पिक विचार है। और न ही उसकी कोई रणनीति।
ऐसे में किसी भी वैचारिक हमले पर ये थर-थर कांपने लग रहे हैं। लेफ्ट के पास जरूर इसका विकल्प है। और उसकी अपनी सोच और जमीन भी है। लेकिन नेतृत्व की कमजोरियां उसे उस ऐतिहासिक भूमिका से वंचित कर रही हैं। जिसकी इस समय दरकार है। लेकिन संघ भी इस बात को जनता है कि लेफ्ट के पास ही वह वैचारिक और राजनैतिक हथियार है जिससे उसे चुनौती मिल सकती है।
अनायास नहीं ताकत में छोटा होने के बावजूद लेफ्ट हमेशा संघ के निशाने पर होता है।
इतिहास भी इस बात का गवाह है कि रूस के द्वितीय युद्ध में न जाने की इच्छा के बावजूद आखिर में उसे शामिल होना पड़ा था। और फिर हिटलर को रूसी सेना के आगे धूल चाटनी पड़ी थी। और अंत में विश्व को जीतने का सपना पालने वाले हिटलर को ख़ुदकुशी का रास्ता अख्तियार करना पड़ा।
ये बात सत्य है कि इतिहास खुद को उसी रूप में नहीं दोहराता। लेकिन उससे भी बड़ा सत्य यह है कि बर्बर ताकतों की उम्र लंबी नहीं होती है। लेफ्ट नहीं तो कोई और सही। समय अपना विकल्प पैदा कर लेगा।


