इमरान रिज़वी
किसी बड़ी क्रिकेट प्रतियोगिता में अगर कोई विदेशी अम्पायर हमारे किसी खिलाड़ी को गलत ढंग से आउट करार दे दे तो देश भर में क्रिकेट प्रेमियों की प्रतिक्रिया देखने लायक होगी। कई जगह उस अम्पायर के पुतले फूँके जायेंगे, विरोध प्रदर्शन होंगे, बीसीसीआई की नज़र टेढ़ी हो गयी तो अम्पायर के कैरियर पर भी ग्रहण लग सकता है।
मुझे याद है एक बार किसी टूर्नामेंट में रनिंग बिटवीन दा विकेट में सचिन के सामने रज़्ज़ाक गलती से आ गया था जिसके कारण सचिन को रन आउट होना पड़ा था, तब भारतीय दर्शकों ने स्टेडियम में ही रज्जाक के ऊपर पानी की बोतलें फेंकना शुरू कर दीं थी और सचिन को खुद शांति की अपील करना पड़ी थी....
लेकिन देश को ओलम्पिक में पदक दिलाने की क्षमता रखने वाली खिलाड़ी सरिता देवी को जब गलत ढंग से रेफरी द्वारा केवल कांस्य पदक तक सीमित कर दिया जाता है तब देशवासियों की तरफ से कोई बड़ी प्रतिक्रिया नहीं आती। वहां मौजूद भारतीय दल के सदस्य भी अपनी खिलाड़ी का कोई सहयोग नहीं करते और तिस पर हालत यह की हमारे खेल मंत्रालय ने भी उल्टा सरिता देवी को ही दोषी ठहराने की ठान ली और रेफरी के निर्णय के खिलाफ जाने से इनकार कर दिया।
इस सब घटनाओं को देख कर भारत में अन्य खेलों की खराब स्थिति का सहज ही अंदाज़ा हो जाता है।
हमारे जो उँगलियों पर गिन सकने लायक खिलाड़ी अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक पदक जीत पाते हैं उसमें भी हमारे खेल विभाग का क्या योगदान रहता होगा जब यह गलत फैसलों के शिकार खिलाड़ियों का साथ तक नहीं दे सकते ?
ज़ाहिर है यह गिने चुने पदक भी उन्हीं खिलाड़ियों की असीम प्रतिभा की ही बदौलत आ पाते होंगे जिसमें सरकार का अथवा इन नाम मात्र के खेल विभागों कोई योगदान नहीं होता है।