सत्ता की गुलाम मीडिया के चारण और भाटों से सावधान रहने की जरूरत
सत्ता की गुलाम मीडिया के चारण और भाटों से सावधान रहने की जरूरत
उत्तर प्रदेश की जनता को सत्ता की गुलाम मीडिया के चारण और भाटों से सावधान रहने की जरूरत है
जनतंत्र में मीडिया की भूमिका सिर्फ सत्तापक्षीय क्यों होती जा रही है,
जनता को कारपोरेट छल-छद्म में फंसाने का काम मीडिया क्यों करता है
शैलेन्द्र कुमार शुक्ल
नेपोलियन बोनापार्ट ने एक मजे की बात कही थी कि “हजार छुरों की तुलना में चार विरोधी अखबारों से अधिक डरना चाहिए”। लेकिन यह इससे भी मजे की बात है कि जब ज्यादातर अखबार और मीडिया के दूसरे घराने केवल सत्ता-पक्ष में चारण-भाटगिरी कर रहे हों तो जनता को सबसे अधिक सचेत होना चाहिए।
इस मजे की बात की ओर अब तक देश की जनता का ध्यान न गया था। 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद जनता यह सोचने को मजबूर जरूर हुई है कि आखिर मीडिया के साथ जनतंत्र का कैसा संबंध है। जनतंत्र में मीडिया की भूमिका सिर्फ सत्तापक्षीय क्यों होती जा रही है, जनता को कारपोरेट छल-छद्म में फंसाने का काम मीडिया क्यों करता है, इसका जनविरोधी चरित्र क्यों होता जा रहा है, यह सब मीडिया पर हमारे उचित और संजीदा सवाल हैं। जनता इस पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित जरूर हुई है। 14 के बाद देश की जनता एक सुगबुगाहट जरूर महसूस कर रही है, और कई राज्यों के चुनाव परिणाम इसकी जायज पुष्टि भी करते रहे हैं।
आज वैकल्पिक मीडिया से देश को बड़ी उम्मीदें हैं। उम्मीदें इस लिए भी कि परिणाम जनता के सरोकार से सीधे जुड़ रहे हैं। सोशल मीडिया पर जहां एक ओर भय और झूठ के जंगल लहलहा रहे हैं वहीं कुछ निर्भीक और जनतांत्रिक सोच वाले लोग गंभीरता से समाज को सही दिशा भी दे रहे हैं। समाज और जनतंत्र से सरोकार रखने वाले लोग सोशल मीडिया के बहाने जनता में अपनी पैठ भी बना रहे हैं।
यह समय कई तरह के आक्रांताओं से निपटने का है, देश की जनता को भावुकता से बचते हुये बुद्धि और विवेक से समाज की दिशा और दशा के बारे में सोचना और समझना ही नहीं सटीक निर्णय भी लेना होगा।
हमें पिछले चुनावी वादों का विश्लेषण करते हुये, कई-कई बार चीजें समझनी होंगी कि आखिर विकल्पों के सीमित दायरे में रह कर हमें क्या करना चाहिए।
अब उत्तर प्रदेश के चुनाव सर पर हैं, सत्ता के लोलुप काइयाँ लोग प्रदेश की जानता को ठगने के लिए तरह तरह के इमोस्नल भय दिखा रहे हैं और सांप्रदायिकता की आग जलाने के लिए भरसक प्रयत्न कर रहे हैं। यह कितना भयावह है कि सांप्रदायिक दंगे भड़का कर वोट की राजनीति करना।
हमें यह सोचना चाहिए हम कितने पिछड़े हुये शासकों के अधीन एक दागी जनतंत्र को भोग रहे हैं। आखिर क्या वोट की राजनीति इतनी पिछड़ी हुई और अमानवीय है। हमारा प्रदेश वोट की फसल के लिए आज भी दंगों की खेती करता है। गोरख पाण्डेय की यह पंक्तियाँ आज भी ताजा लगती हैं- “इस बार दंगा बहुत बड़ा था / खूब हुई थी/ खून कि बारिश/ अगले साल अच्छी होगी/ फसल मतदान की”।
यह बहुत ही शर्म का विषय है। इस शर्म को उत्तर प्रदेश की जनता को राजकीय स्तर पर उत्तर देना होगा। प्रदेश की जनता को जितना खतरा सत्ताधारी धर्मधुरंधरों से है उससे ज्यादा खतरा इनके चाटुकार चारण और भाटों से है। मीडिया के चैनलबाजों से उत्तर प्रदेश की जनता को सबसे ज्यादा सावधान रहने की जरूरत है।
आखिर में मुझे यकीन है कि यूपी की जनता गलतियों से सीख लेते हुये वही करेगी याने धूमिल के शब्दों में कहूँ तो, बुरे से बुरे के बीच कम बुरे को चुनना हमारी मजबूरी है।


