सत्ता को नियंत्रित करने वाली खबरें अब भी गायब हैं
सत्ता को नियंत्रित करने वाली खबरें अब भी गायब हैं
जॉन पिलगर एक पत्रकार, फिल्म-निर्माता और स्तंभकार हैं। जिन्होंने पिछले तीन दशकों से वैश्विक घटनाओं को कवर किया है। इन्होंने साठ और सत्तर के दशक में वियतनाम, कम्बोडिया और पूर्वी तिमोर में अमेरिकी राजनीति को कवर किया है। और जो वंचितों के अधिकारों के प्रबल पक्षधर हैं। अभी हाल ही में वे भारत आए, अपनी नई डॉक्यूमेन्ट्री ‘द वार यू डॉन्ट सी’ के साथ, ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की सीमा चिश्ती ने उनका ई-मेर्ल इंटरव्यू लिया था, जिसका अनुवाद प्रस्तुत है। अनुवादक- राकेश कुमार मिश्रा
1.सवाल- द्वितीय विश्वयुद्ध तक चलने वाले आर्थिक असमानताओ और वर्तमान स्थितियों के बीच में तुलना की जा चुकी है। पारम्परिक रूप से देखा व समझा जाने वाला ‘‘तृतीय विश्वयुद्ध’’ अब तक सामने नहीं आया है, लेकिन क्या हम दूसरे तरह के युद्धों की तैयारी कर रहे हैं, जो आर्थिक संकटों के बीच में कुलबुलाते हुए सामने आ जाते हैं ?
जवाब- शीत युद्ध ही तृतीय विश्वयुद्ध था। जो यू.एस. और उसके निकट सहयोगियों जैसे यू.के.-द्वारा दूसरे साधनों व तरीकों द्वारा लगातार जारी है। वर्तमान समय के सारे हमलें व पेशें तृतीय विश्वयुद्ध के हिस्से हैं। यू.एस. के पूर्व-राष्ट्रपति, डिक चेनी ने भविष्यवाणी किया था कि ‘‘वो 50 साल या उससे अधिक टिके रहेगें।’’ अगर आप पेन्टागॉन से जुड़े साहित्य पर नज़र डाले तो पायेंगें कि निरन्तर युद्धों को अब प्रत्यक्ष युद्धों के रूप में देखा जा रहा है। लिबिया से लेकर संभावित आक्रमण ईरान तक तृतीय विश्वयुद्ध लगातार जारी है। संयुक्त राष्ट्र के अर्थव्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण भाग युद्ध और शस्त्र उद्योग हैं। दुश्मन अब भी दुराग्राही बना हुआ हैं, लेकिन मुद्दा ये नहीं हैं, उनके लक्ष्य संसाधन हैं और उनके लक्ष्य हैं अपने नए प्रतिद्वन्दी चीन के खिलाफ युद्धनीति बनाना। साथ ही, यू.एस. (और यू.के. में भी) युद्ध और शस्त्र उद्योग अत्यन्त शक्तिशाली हैं, ज़रा यूरोपियन देशों पर नज़र डालिए- यूरोपियन लगातार अपने फाईटर-बॉमबर को गल्फ देशों को बेचने के होड़ में लगे है। और अपनी प्रभावशीलता को विज्ञापित करने के लिए वे लिबियन शहरों और जीवन को खत्म कर रहे हैं। जी 20 को भूल जाईए, दुबई आर्म फेयर में हुए षड़यन्त्रों को देखिए। यू.एस. में, पेन्टागन अब प्रभावशाली रूप से विदेशी नीतियों को संचालित कर रहा है।
2.सवाल- आपकी महत्वपूर्ण किताब ‘‘हिडेन एजेन्डास’’, ‘‘धीमी रप्तार की खबरों वाले दिनों’’ का संतुलित मूल्यांकन है। वो दिन जब सरकार का उद्देश्य न्यूज़रूम्स को भरना नहीं था बल्कि पत्रकारों को जोड़ देकर खबरों के लिए बाहर भेजना था। क्या ये सालों बाद बदल गया ? अगर हॉ, तो ये ठीक है या गलत ?
जवाब- ‘‘धीमी रफ्तार की खबरें’’ कॉरपोरेट मीडिया के काम करने का एक तरीका है। धीमी खबरों का अर्थ है अनाचरण द्वारा आधिपत्य। अधिकांश छपने और प्रसारित होने वाली खबरें सत्ता द्वारा नियंत्रित की जाती है, विभिन्न रूपों में । धीमी खबरें सत्ता को चुनौती देती है। तभी ये खत्म हो रही हैं। कुछ नहीं बदला है।
3.सवाल- आपने लिखा, रेडियो के लिए काम किया और डॉक्यूमेन्ट्री भी बनाई। काम का कौन सा रूप आपके लिए सबसे अच्छा है, जो कि सबसे प्रभावशाली है ?
जवाब- रेडियो सबसे ईमानदार माध्यम है। लोग जो चाहते हैं उसके बारें में कह सकते हैं। जिसके लिए सामान्यतः सेन्सरशिप की ज़रूरत नहीं है, जो चीज़ हमारे लिए सबसे जरूरी है, वो है इच्छा और हिम्मत। टेलिविजन सबसे प्रभावशाली माध्यम है। गतिशील चित्रों व शब्दों का जबरदस्त सन्तुलन अब भी सबसे प्रभावशाली है, यह अधिकतर लोगों के लिए सूचना प्राप्ति का मुख्य साधन है।
4.सवाल- जहॉ तक न्यूज़ मीडिया का संबंध है, सैटेलाईट टी.वी. कई देशों में बड़े बदलाव का कारण बना है और प्रिंट मीडिया और रेडियो पर यह दबाव है कि वह इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से मिलने वाले चुनौती को किस रूप में ले ? क्या इसने समाचार के पूरे माहौल को बदल दिया है ?
जवाब- तथाकथित 24 घण्टे वाले खबरिया चैनल कभी न खत्म होने वाली गतिशील, अस्पष्ट, घिसे-पिटे असम्बद्ध चित्रों का समूह हो गया है। ये समाचार से ज्यादा श्अपेनंस बीमूपदह हनउश् हैं।
5.सवाल- संचार के माध्यम के रूप में लिखित पाठ या लिखित शब्द कहॉ ठहरते हैं ?
जवाब- लिखित शब्द समाचार पत्रों और डॉक्यूमेन्ट्री में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और इंटरनेट के दुनिया में भी और किताब जैसे अद्भुत गैजेंट्स के रूप में भी। बेहतरीन रिपोर्टिंग और लेखन आज भी कई लोगों को जटिल स्थितियों को समझने व समझ विकसित करने में मदद करती है। खबरों की समझ विकसित करना एक ऐसा काम है जो हम पत्रकारों को करना चाहिए, इससे ज्यादा पेशेवर और महत्वपूर्ण दूसरा कुछ नहीं हो सकता।
6.सवाल- पश्चिम एशिया में बहुत कुछ हो रहा है, पश्चिमी मीडिया ने उन घटनाओं को कैसे देखा उसका मूल्यांकन आप कैसे करेंगें, विशेषरूप से जब एक बड़ी घटना (मिस्र क्रांति) खत्म हो चुकी हैं। सैनिक नियंत्रण के बाद मिस्र का कवरेज कितना संतोषजनक या अर्थभेदक है ?
जवाब- पश्चिमी सरकारों की तरह, परिश्चम मीडिया भी तुनिसिया और मिस्र में हुए बदलाव को लेकर अचरज में था। पश्चिम मीडिया ने जल्द ही मिस्र के क्रांति को तमाशा के रूप में लिया, लंबे समय तक इस तथ्य से इन्कार करते रहे कि इस क्रांति मंे सेना की शक्ति शामिल है और आज जो उसके नियंत्रण में है। साथ ही इसने लिबियन आक्रमण को एक सही कदम बताया उस गुप्त क्रांति के लिए। अतः कवरेजों का अंतर करना बहुत मुश्किल है, साधारणतः ये कमजोर ही थे।
7.सवाल- पश्चिम में ‘द अकूपाई वॉल स्ट्रीट’, विरोध या ‘टी पार्टी’ विरोध ये महत्वपूर्ण आन्दोलन है जो किसी राजनीतिक पार्टी या व्यवस्था के हिस्से नही हैं। क्या पत्ऱकार किसी पार्टी के तरफ से होने वाले विरोधों को कवर करने की तरह, इन घटनाओं को भी कवर करने में सक्षम और हुनरमंद हैं ? क्या उनके लिए चीजा़ें को समझने के लिए एक कठिन समय है ?
जवाब- पत्रकारों के लिए यह एक कठिन समय है-दुनियाभर में होनेवाली तमाम उठापटक को समझने के लिए क्योंकि ये उठापटक किसी खास खांचे में फिट नहीं बैठते। असल में घेराव आन्दोलन लैटिन अमेरिका में पहले शुरू हुए थे- जैसे- बौलोपिया और अर्जेन्टीना जहां वे सफल हुए।
8.सवाल- पिछली बार पूंजीवाद पर संकट सन् 1930 में आया था, उस समय केनेसियन विचार के मदद से ये उबर पाया था। इस समय, क्या आप इन विचारों के बुलबुलों को कहीं देख रहे हैं, जो नई अर्थ-संचालित पूंजीवाद को बचा सके या नया रूप दे।
जवाब- कई सारे नए विचार हैं। जैसा कि मैंने बताया, एक नये विचार ने लैटिन अमेरिका के बोलिविया में जल के निजीकरण को खत्म किया, अर्जेन्टीना से आई.एम.एफ. को बाहर किया। असल में महाद्वीप से भी बाहर किया। लेकिन मुद्दा ये है, जो यू.एस. और यूरोप के कई सारे पाठक और दर्शक नहीं जानते और वो है- स्लो न्यूज़।
अनुवादक- राकेश कुमार मिश्रा, अनुवाद एवं निर्वचन विद्यापीठ, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, मानस मंदिर पोष्ट आफिस- पंचटीला, उमरी वर्धा पिन कोड- 442001 (महाराष्ट्र),
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