पुण्य प्रसून बाजपेयी

क्या देश में पहली बार संसदीय राजनीति चूक रही है। क्या पहली बार सामाजिक आंदोलन की पीठ पर सवार होकर संसदीय राजनीति अपनी महत्ता तलाश रही है। क्या प्रधानमंत्री महत्ता बनाने के रास्ते टटोल रहे हैं। क्या विपक्ष को इन्हीं आंदोलनो से सत्ता की खुशबू आने लगी है। क्या संसदीय सियासत और राजनेताओ से लोगो का भरोसा उठने लगा है।

अगर सरकार के निर्देश के बाद जंतर मंतर की जगह राजघाट का रास्ता पकड़ें और अन्ना हजारे के साथ खड़े लोगों को देखें तो यकीनन यह सवाल बड़ा होता दिखायी देता है कि संसदीय राजनीतिक व्यवस्था कहीं खतरे में तो नहीं है। राजघाट पर अन्ना के साथ खड़े शहरी मध्यम वर्ग और उसमें पढे-लिखे युवा वर्ग के छौंक ने पहली बार यह सवाल खड़े किये कि क्या सरकार थानेदार की भूमिका में आ चुकी है। जहां वह सिविल सोसायटी से तो सवाल पूछती है कि रैली के लिये उसके पास कहां से पैसा आया, कहां खर्च किया। लेकिन अपने जमा-खाते पर खामोश रहती है।

क्या इस दौर में ईमानदारी इतनी महंगी हो चुकी है कि अन्ना का फक्कड होना और बाबा रामदेव में साधु तत्व ही ईमानदार आंदोलन के प्रतीक बन गये हैं। जाहिर है यह सारे ऐसे सवाल हैं, जिसने इस दौर में कांग्रेस से लेकर बीजेपी और सामाजिक संगठनो से लेकर सुप्रीम कोर्ट हीं नहीं बल्कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से लेकर लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज तक को ऐसी हरकत में ला खड़ा किया, जहां लोकतंत्र भी शर्मसार हो जाये। संयोग से जिस दिन सुप्रीम कोर्ट ने रामलीला मैदान पर पुलिसिया कार्रवाई पर सवालिया निशान लगाया, उसी दिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पुलिसिया कार्रवाई को जायज ठहराया और उसी दिन सुषमा स्वराज ने राजघाट पर ठुमके लगाने से परहेज भी नहीं किया। लेकिन देश की आम अवाम के लिये यह तीनों पहल कितना मायने रखती हैं जबकि अन्ना से लेकर बाबा रामदेव के उठाये सवालो का अगर वाकई समाधान निकल जाये तो देश के 120 करोड़ लोग जरुर राहत से सांस ले सकते हैं। हां , बाकि एक करोड़ के लिये जरुर मुश्किल वक्त की शुरुआत हो सकती है। तो क्या देश एक करोड़ लोगों के लिये ऐसे रास्ते पर आ खड़ा हुआ है, जहां आजादी के 64 बरस बाद लोकतंत्र का हर स्तम्भ दागदार हो गया है। संविधान महज एक दस्तावेजी सच बनकर रह गया है। संसदीय प्रणाली में आम आदमी अपने आप को जुड़ा हुआ महसूस भी नहीं कर पा रहा है। अगर राजनेताओ की फौज से लेकर अलग अलग संस्थानों तले सत्ता संभाले वीवीआईपी समूहो को परखे तो वाकई यह तादाद एक करोड़ लोगों से द्या नहीं होगी । जबकि भ्र्रष्टाचार से लेकर कालेधन के मुद्दे पर अन्ना से लेकर बाबा रामदेव से जुडे देश भर के लोगों के समूहों को देखें तो कोई भी ना तो सत्ता का प्रतीक लगा और ना ही लोकतंत्र के संवैधानिक पहरुओं की कतार का नजर आया । तो क्या इस देश में नया संघर्ष सत्ता का नहीं व्यवस्था परिवर्तन का है। और जिसमें वह शब्द छोटे पड़ रहे हैं जिन्हें आजादी के बाद सत्ता संभालने वालो ने गढ़ा।

हो सकता है यह ना भी हो। लेकिन इस दौर में जो नजर आ रहा है उसके पीछे कौन सी हकीकत ऐस परिस्थितियों की गवाह है, इसे जानना जरुरी है। आंदोलन की पीठ पर सवाल राजनीतिक दलो को सत्ता मिलेगी या नहीं या फिर आंदोलन ही वक्त बीतने के साथ राजनीतिक आवरण ओढ़ लेंगे,, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी। लेकिन किसी भी राजनीतिक दल या राजनेता की ऐसी हैसियत क्यों नहीं है, उसके उठाए मुद्दो पर भरोसा कर देश में सहमति बन जाये। संसद में भ्र्रष्टाचार का भी मुद्दा उठ चुका है और कालेधन का भी। लेकिन संसद के गलियारे के बाहर सिर्फ मीडिया ने ही उसे तरजीह दी। और एक वक्त के बाद वह भी बंद कर दिया। यानी संसद के गलियारे में गूंजते मुद्दों का असर आम जनता पर जूं रेगने से भी कम हुआ। तो क्या लोगो का भरोसा संसद पर नहीं रहा या राजनेताओ ने अपनी जरुरत तले संसद की महत्ता को भी अपने मुनाफे तले दबा दिया। माना कुछ भी जा सकता है लेकिन इस वक्त संसद के भीतर 90 से ज्यादा सांसद ऐसे है जिनके खिलाफ भ्र्रष्टाचार के मामले दर्ज हैं। इसी संसद में देश के 180 से ज्यादा सांसदो के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं। पढ़-लिखकर नवाब बनने की चाह में बने देश के 375 से ज्यादा आईएएस अधिकारियो के खिलाफ भ्र्रष्टाचार के मामले दर्ज हैं। 425 से ज्यादा आईपीएस अधिकारियो के खिलाफ भ्रष्टाचार और आपराधिक मामले दर्ज हैं। दर्जन भर ज्यादा जजो पर इस दौर में भ्र्रष्टाचार के आरोप लगे । यह फेरहिस्त हर संसथान को लेकर खींची जा सकती है। और इसका एक बेहतरीन प्रतीक दिल्ली का तिहाड जेल है। जहां राजनीति,नौकरशाही और कारपोरेट का वीवीआईपी काकटेल भ्र्रष्टाचार के आरोप में बंद है ।

बड़ा सवाल यहीं से शुरु होता है कि देश को जिनके भरोसे छोड़ा गया है या फिर देश के लिये जिन संस्थानों को गूथ कर एक समूची व्यवस्था बनायी गयी अगर वही अंदर से खोखला हो चुका है तो फिर रास्ता क्या है। बाबा रामदेव के रामलीला मैदान के पंडाल में ग्रामीण भारत की महक थी। और जंतर-मंतर पर अन्ना हजारे के सत्याग्रह में शहरी मध्य वर्ग की खुशबू थी। बाबा की भीड में बाबा पर भरोसा था तो अन्ना के साथ जुटे समूह में सरकार या सत्ता पर कानून की नकेल कसने का सवाल था। बाबा के सवाल उस ग्रामीण मानसिकता में हिलोरे पैदा कर रहे थे जिसके लिये सरकार-सत्ता का कोई मतलब नहीं है। उसके लिये राष्ट्रवाद तले सबकुछ न्योछावर करना ही पुण्य है। वहीं अन्ना हजारे के साथ खडा तबका बेईमान सत्ताधारियो से गुस्से में था। उसी अपनी शिक्षा का सही मूल्य भी चाहिये और इमानदार व्यवस्था भी। वह राजनीतिक व्यवस्था तले लोकतंत्र के नारों से परेशान है। यानी बाबा रामदेव जहां बिना रास्ता निकाले समाज के भीतर आक्रोश के सैलाब को एक मंच पर लाना चाहते हैं, वही अन्ना हजारे उसी आक्रोष के लिये एक रास्ता निकालने पर भिड़े हैं। लेकिन दोनो के हाथ खाली हैं, क्योंकि दोनो की सीमा जहां खत्म होती है, उसी जगह से संसदीय सत्ता शुरु होती है। और इस सत्ता का मतलब कांग्रेस या बीजेपी सरीखे राजनीतिक दल भी है और सत्ता के लिये हिचकोले खाते मुलायम,, मायावती, ममता बनर्जी या शरद पवार सरीखे नेता भी है। जिन्हे पता है कि मुद्दे ना सिर्फ सियासत डगमगा सकते है बल्कि सियासी समझ को भी बदल सकते है और उनकी जरुरत पर भी सवालिया निशान लगा सकते है। लेकिन मुद्दो को ही अगर राजनीतिक रंग में रंग दिया जाये तो फिर मुद्दे बिना सियासी चाल के आगे बढ़ नहीं सकते। इसलिये चंद हथेलियो का कालाधन देश में लाना जरुरी है या बाबा रामदेव के पीछे संघ परिवार है, इसे समझना जरुरी है। भ्रष्टाचार पर नकेल कसने के लिये जन-लोकपाल कानून बना कर उसके दायरे में प्रधानमंत्री से लेकर जजो को लाना जरुरी है या फिर अन्ना हजारे के रिश्ते बीजेपी या आरएसएस से है इसका पता लगाना जरुरी है। भ्र्रष्टाचार से लेकर महंगाई में डूबे देश को इनसे निजात दिलाने की जरुरत है या फिर मनमोहन सिंह की दूसरी पारी में मुश्किल क्यो आयी और यही मुद्दे यूपीए-एक के वक्त क्यो नहीं उभरे, इसका आकलन जरुरी है। बाबा रामदेव से सरकार के चार मंत्री क्यों मिलने गये और फिर उसी सरकार ने रामदेव अण्णा टकराव लेकर आंदोलन को तहस-नहस कर दिया यह समझन जरुरी है या फिर मनमोहन सिंह के नये ट्रबल -शूटर वकीलो की तिकडी कपिल सिब्बल, पी चिदबंरम और पवन बंसल काग्रेस के पुराने ट्रबल शूटर गुलाम नबी आजाद, कमलनाथ,अंबिका सोनी पर भारी क्यों पड रहे हैं, इसे समझना जरुरी है।

सोनिया गांधी क्यों सरकार से इतर अपनी एक आम-लोगों के साथ खड़ी छवि बरकरार रखने में लगी है या फिर विपक्ष में सुषमा-जेटली के झगडे में बार-बार चूके आडवाणी से इतर कोई नेता कुछ दिखायी क्यों नही दिखायी देता है। क्या संघ परिवार जेपी आंदोलन के 37 बरस बाद अन्ना या रामदेव तले अपनी बिसात बिछाकर बीजेपी को ही हाशिये पर ढकेलने की तैयारी में है। यह सारे सवाल देश की आम आवाम के लिये कितने मौजूं हैं, यह सोचना उतना ही रोमानीपन है, जितना यह समझना कि आंदोलन से उठे मुद्दों पर आखिरकार वही राजनीति सक्रिय होगी और वही सरकार कानून बनायेगी, जिसकी जरुरतो ने यह मुद्दे पैदा किये।

जाहिर है यह सोच का टकराव भी है और आम लोगों के सामने सवाल भी है कि कैसे सरकार प्रधानमंत्री, सांसदों या नौकरशाहो को उसी लोकपाल के घेरे में लाने को तैयार हो जायेगी जिसपर उनका बस ना चले। और कैसे संसदीय व्यवस्था अपनी भ्रष्ट ताकत को बांधने के लिये कानून बनाने पर राजी हो जायेगी। अगर यह संभव नहीं है तो फिर आंदोलनों की महत्ता है क्या और अगर यह संभव है तो रामलीला मैदान पर सोये आम मासूमों से सरकार डरकर क्यों हिंसक हो गयी। फिर कानून के रास्ते भ्र्रष्टाचार रोकने की अन्ना की नयी पहल अगर सरकार की नीयत पर रामदेव को लेकर सवाल खडा करती है तो फिर सरकार भी अन्ना की तर्ज पर ही बिना सिविल सोसायटी के लोकपाल बिल ड्राफ्ट करने की धमकी क्यों देती है। यानी देश के सामने अब बड़ी चुनौती राजनीतिक सौदेबाजी को खत्म करना है। या फिर जनवादी मुद्दो से लेकर जन-आंदोलन तक को कानूनी और राजनीतिक मान्यता दिलाना है । इसके तरीके क्या होंगे और व्यवस्था का खांका कौन खींचेगा या फिर अन्ना या रामदेव से कोई नयी लकीर भी निकलेगी जो सियासी समझ को भी बदलेगी या साठ बरस की संसदीय राजनीति ने जो पूंजी बनायी है, उसको बचाने के लिये कही ज्यादा तीखे स्तर पर रामलीला मैदान सरीखा महाभारत देश में कई जगहों पर खेला जायेगा। यह तो इतिहास के गर्भ में है लेकिन इस दौर में इकसे संकेत मिलने लगे है कि सत्ता के लिये विपक्ष अपनी राजनीति को आंदोलन की शक्ल भी देगा और एक वक्त के बाद संसदीय चुनावी राजनीति करने वाली सभी पार्टियों को एक मंच पर भी लायेगा और पहली बार हर आंदोलन के अक्स में संसदीय प्रणाली को टक्कर देती परिस्थितियां भी उभरेगी। यह समूचे समाज को अपने हद में इसलिये लेंगी क्योंकि पहली बार संघर्ष में सरोकार की खुशबू है जबकि सत्ता सरोकार को छोड़ हिंसक हो रही है।