सदी बदली, सत्ता बदली, नहीं बदली उमा
सदी बदली, सत्ता बदली, नहीं बदली उमा
शिशिर सिंह
आधे दशक से अधिक समय तक भाजपा से दूर रही साध्वी बिल्कुल नहीं बदली राहुल गाँधी ने जरा कड़वा(सत्य) क्या बोला, साध्वीजी तिलमिला गईं। राहुल के बाहरी कहने से इतना अधिक गुस्सा आया कि वो सीधी उनके माँ तक पहुंच गई और भाजपाईयों की चिर-परिचित आदत के मुताबिक सीधे व्यक्तिगत छींटाकशी शुरू कर दी। आरएसएस, भाजपा और उनके साथी संगठनों की यह पुरानी आदत रही है कि वो व्यक्ति को नीचे दिखाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। यही कारण था कि इसी राजनीतिक माहौल में पली बढ़ी उमा सोनिया गाँधी, राजीव गाँधी से लेकर इन्दिरा गाँधी तक पहुँच गईं।
दरअसल भाजपा-उत्तर प्रदेश और उमा दोनों का दर्द कमोबेश एक सा ही है। कभी सत्ता के खेल के प्रमुख खिलाड़ी रहे दोनों को अब कोई भी गंभीरता से नहीं लेता और उन्हे दौड़ से बाहर ही मानता है। उत्तर प्रदेश चुनाव के बहाने दोनों ही किनारे फंस चुकी अपनी नाव को बीच नदीं में लाना चाहते हैं ताकि लोगों की नजर से गायब न हो जायें। अपनी इस मंशा के प्रति पार्टी की गंभीरता साफतौर पर समझी जा सकती है इसके लिए उन्हें किसी भी कदम से गुरेज नहीं है चाहे वो बसपा की जूठन बन चुके बाबूसिंह कुशवाह और बादशाह सिंह को पार्टी में शामिल करने का मामला हो या दागी अवधेश कुमार वर्मा, छत्रपाल सिंह और साक्षी महाराज को टिकट देने का भाजपा हर वो रास्ता अपनाना चाहती है जो उसे कुर्सी तक पहुँचा सके। यह बात अलग है कि हिन्दू धर्म के प्रति काफी संवेदनशील रही पार्टी खुद को गंगा मानकर, दोनों की पवित्रता पर प्रश्नचिन्ह खडा कर रही है।
वहीं दूसरी और उमा पिछले 6 वर्षो में अपने आभामंडल का आभास कर चुकी हैं। मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री रह चुकी उमा भाजपा से बेदखल होने के बाद न पार्टी बचा सकीं और ना ही अपनी सीट। शायद उन्हें भी आभास हो गया होगा कि जनता उन्हें बस एक ओजस्वी और भाषण कला में निपुण वक्ता मानती है, जिसका भाषण सुनने से उबासी नहीं आती और रगों में गर्मी दौड़ जाती है। इसलिए काफी विचार-विमर्श करने के बाद उन्होंने ऐसी सीट का चुनाव किया जहाँ उनकी जाति के वोट उन्हें मिल सकें। राजनीति की मंझी और अनुभवी खिलाड़ी उमा जानती हैं कि छोटा और सरल रास्ता क्या है। जब वोट मजहब और जाति के नाम पर मिल सकते हैं तो विकास की बात करना सरासर बेवकूफी है और कुछ नहीं।
चरखारी सीट से चुनाव लड़ रहीं उमा भारती के विधानसभा क्षेत्र में लोधी जाति सबसे ज्यादा संख्या में है। यहां के लगभग तीन लाख मतदाताओं में से 63 हजार वोट लोध जाति के मतदाताओं के हैं। वैसे भी साध्वी का गढ़ और जन्मभूमि बुन्देलखण्ड में उनका खासा प्रभाव है यही कारण है कि चाहे मध्य प्रदेश चुनाव हो या उत्तर प्रदेश ये इलाका साध्वी की पसंदीदा रहा है।
जानकारी के लिए बता दें कि फैसले से पहले उमा ने चरखारी के साथ-साथ बबीना और मुरमरा विधानसभा क्षेत्र का भी सर्वेक्षण कराया था। ये तीनों विधानसभा क्षेत्र लोध बहुल वाले हैं, लेकिन उमा को लगा कि चरखारी उनके लिए सबसे बेहतर सीट रहेगी।
वैसे उत्तर प्रदेश में आने वाले बुन्देलखण्ड की बात करें तो तो यहाँ विधानसभा की उन्नीस सीटें हैं। इनमें पाँच अनसूचित जाति आरक्षित और 14 सामान्य हैं। बुन्देलखण्ड की गिनती देश के सबसे पिछड़े इलाकों में होती है। बुन्देलखण्ड किसी एक जाति का प्रभुत्व वाला इलाका नहीं है। कभी बुन्देलों और चन्देलों की रियासत रहा बुन्देलखण्ड में क्षत्रियों के बजाय अन्य जातियों जैसे- बाह्ममण, यादव, पिछड़ों आदि को ज्यादा सफलता मिली है। पिछड़ा इलाका, विकास मुद्दों के प्रति संजीदगी की कमी, जाति और धर्म खासकर जाति के नाम पर वोटों का आसानी से होना वाला ध्रुवीकरण के कारण सभी पार्टियों के लिए यह एक दुधारू इलाका साबित होता है। पिछली सरकारों और बुन्देलखण्ड के प्रत्याशियों पर गौर करें तो यह बात निकल कर सामने आती है कि सरकार बनाने वाले दल को सीट दिलवाने में इस क्षेत्र की खासी भूमिका रही है। मायावती सरकार में मंत्री रहे बाबूसिंह कुशवाहा, बादशाह सिंह नसीमुद्दीन, रतनलाल अहिरवार आदि बुन्देलखण्ड से ही आते हैं। इसले अलावा कई और बसपा विधायक है जो बुन्देलखण्ड से हैं।
... और अंत में शीलेन्द्र कुमार की पंक्तियाँ....
राजा बदला,
मंत्री बदले,
बदली राज सभा
ढंग न बदला
राजकाज का
तो फिर क्या बदला?


