सपा के बबुआ अखिलेश को मिली इन सीटों पर कांग्रेस दिखाएगी अपना दमख़म ? भाजपा और बुआ-बबुआ के झूठ से लड़ना कांग्रेस की चुनौती
सपा के बबुआ अखिलेश को मिली इन सीटों पर कांग्रेस दिखाएगी अपना दमख़म ? भाजपा और बुआ-बबुआ के झूठ से लड़ना कांग्रेस की चुनौती
राज्य मुख्यालय लखनऊ। जाते-जाते साल 2018 कांग्रेस Congressको पाँच राज्यों के विधानसभा चुनावों Assembly elections in five statesमें से तीन हिन्दी भाषी राज्यों Hindi speaking states मध्य प्रदेश , राजस्थान व छत्तीसगढ़ में तो उम्मीद से कही ज़्यादा मिली सफलताओं से उत्साहित कांग्रेस उत्तर प्रदेश में भी वही प्रदर्शन करने के लिए तैयारी कर रही कांग्रेस के आत्मविश्वास में बढ़ोतरी हुई है, इससे इंकार नहीं किया जा सकता है। कांग्रेस का नेतृत्व Congress leadershipमानता है कि कांग्रेस को कमज़ोर मानने वाले बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी में हैं, जिसको हम दूर करके दिखाएँगे, हम यूपी में सपा और बसपा SP and BSP से बेहतर प्रदर्शन करेंगे और जितनी वह दोनों अलग-अलग सीट जीत कर लाएँगे हम उनसे ज़्यादा सीट जीतेंगे अपने दम पर। गठबंधन की सीटें तो यक़ीनन ज़्यादा होंगी लेकिन जितनी उन दोनों की अलग-अलग सीटें आएंगी उनसे हम ज़्यादा जीतेंगे।
कांग्रेस किस हिसाब से गठबंधन होने के बाद भी इतना बड़ा दावा कर रही है यह बात जनता के समझ में नहीं आ रही है, लेकिन जब हम कांग्रेस के इस दावे की समीक्षा करते हैं तो सियासी परिदृश्य में कांग्रेस जिन सीटों पर मज़बूती से लड़ती दिख रही है और गठबंधन में यह सीटें सपा के कोटे में आने की संभावना लग रही है। वैसे अभी गठबंधन की संयुक्त सूची या अलग-अलग सूची आनी बाक़ी है जिसके बाद यह तय होगा कि यहाँ-यहाँ से सपा या बसपा का प्रत्याशी होगा, तब यह बात फ़ाइनल होगी, लेकिन सूत्रों से मिल रही जानकारी के अनुसार गठबंधन की वह सीटें सपा के कोटे में बतायी जा रही हैं जहाँ-जहाँ कांग्रेस दमख़म के साथ चुनाव लड़ रही है। ऐसी सीटें 12-14 के बीच हैं, उसकी यह मज़बूती आज से नहीं बहुत पहले से वहाँ कांग्रेस मज़बूत है, बल्कि 2014 के चुनाव में मिली हार से ही वह वहाँ मज़बूत ही है। जैसे बाराबंकी सीट पर पी एल पुनिया हारकर भी लगातार फ़ील्ड में हैं, वहाँ से एक बार सांसद रहे हैं। जनता उन्हें जानती और पहचानती है। यहाँ से उनके पुत्र तनुज पुनिया के चुनाव लड़ने की संभावना है।
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बनारस (वाराणसी) से अजय राय, प्रतापगढ़ से राजकुमारी रत्ना सिंह, इलाहाबाद से प्रमोद तिवारी, झाँसी से प्रदीप जैन आदित्य, धौरहरा से जितिन प्रसाद, बरेली से प्रवीण ऐरन, रामपुर से बेगम नूरबानो, फ़र्रूख़ाबाद से सलमान ख़ुर्शीद, कानपुर नगर से श्रीप्रकाश जायसवाल, उन्नाव से अनु टण्डन, लखनऊ से राजबब्बर, ये सीट प्रदेश की ऐसी मानी जा रही हैं जहाँ कांग्रेस गठबंधन को पीछे छोड खुद फ़ाईट करती नज़र आ रही है। … और एक सीट सहारनपुर भी है, परन्तु यहाँ एक समस्या है जो प्रत्याशी यहाँ 2014 में चुनाव लड़ा था उसके बिगड़े बोलों से यहीं नहीं बहुत सीटों पर फ़र्क़ पड़ा था, बल्कि गुजरात के विधानसभा के चुनावों में मोदी ने खुद उस नेता के बिगड़े बोलों का इस्तेमाल किया था, नहीं तो ये सीट भी कांग्रेस की जीतने वाली सीटों में शामिल होती। यहाँ का समीकरण ऐसा है कि अगर सारा मुसलमान भी वोट दे तो भी यह सीट जीत नहीं सकते, क्योंकि हिन्दू उसके नाम पर एकजुट हो जाता है। ऐसा भी नहीं है मुसलमान ने कोशिश नहीं की। 2014 के चुनाव में पूरा मुसलमान सुई के नाके में निकलकर देख चुका है, उसके बाद विधानसभा चुनाव में भी प्रयास कर चुका है। पूरा मुसलमान मिल जाता है पर हिन्दू का ध्रुवीकरण भाजपा के पक्ष में हो जाता है और आसपास की सीटें भी हार जाती हैं। नहीं तो कांग्रेस यहाँ भी बढ़िया चुनाव लड़ती, लेकिन अब इस सीट पर गठबंधन का प्रत्याशी जीतने के लिए चुनाव लड़ेगा। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि इस बार मुसलमान गठबंधन के प्रत्याशी को जिताने के लिए वोटिंग करेगा क्योंकि गठबंधन के प्रत्याशी के पास दलित वोट भी होगा। मुसलमान के वोट देने से सहारनपुर की सीट तो गठबंधन जीत जाएगा, इस लिए सहारनपुर को छोड़कर उपरोक्त सीटों पर कांग्रेस बढ़िया फ़ाइटिंग करती दिख रही यही सच है। बाक़ी समीकरण लोकसभा के चुनाव शुरू होने पर बदल सकते हैं, इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।
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चुनावों को रेत की ढाँग कहा जाता है, कुछ पता नहीं लगता क्या हो जाए यह बात भी अपनी जगह है। अगर हम सहारनपुर को छोड भी दें तो सोनिया गांधी और राहुल गांधी को मिलाकर प्रदेश की 80 सीटों में से 14 सीटें हैं जहाँ कांग्रेस को कह सकते हैं कि यहाँ कांग्रेस जीतने में कामयाब हो सकती है। अब यह तो आना वाला समय बताएगा कि कांग्रेस इसमें प्रगति करती है या अवनति होती है।
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2009 के लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस को हल्के में लिया जा रहा था, लेकिन कांग्रेस ने चौंकाने वाले नतीजे दिए थे, परन्तु यह कहना आज की स्थिति में सही नहीं लगता, जब गठबंधन नहीं था और न ही मोदी की भाजपा थी जबकि भाजपा में और आज की मोदी की भाजपा में फ़र्क़ है। मोदी से पहली की भाजपा में साम्प्रदायिकता के आधार पर वोट ज़रूर माँगा जाता था, लेकिन झूठ का सहारा नहीं लिया जाता था। आज तो झूठ चाहे जितना बड़ा बोलना पड़े बस जनता भ्रमित होनी चाहिए। तो उससे मुक़ाबला करना है और फिर गठबंधन से भी लड़ना है। ये चुनौतियाँ कांग्रेस के सामने हैं। तीन राज्यों में मिली जीत वहाँ सिर्फ़ झूठ से मुक़ाबला था यहाँ दो तरफ़ा झूठ है, इसलिए संघर्ष ज़्यादा करना पड़ेगा। फिर भी उपरोक्त 14 सीटों पर बढ़िया चुनाव लड़ेगी इससे इंकार नहीं किया जा सकता।
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